बजट के कागज पर लिखी बातें धरातल पर कब उतरेंगी? शिवराज सिंह के जिले में किसानों को इस बार बड़ी उम्मीदें

इस बार बजट से किसानों को बड़ी उम्मीदें हैं. उनका कहना है कि सरकार बजट के कागजों पर तो बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन यह दावे धरातल पर क्यों नहीं उतरते? सीहोर में किसानों ने इस बार अपनी कई मांगें भी रखी हैं.

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1 फरवरी को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल का दूसरा बजट पेश करेंगी. दिल्ली में बजट की फाइलें खुल रही हैं और गांवों में उम्मीदें. खासकर मध्य प्रदेश के किसान इस इंतजार में हैं कि इस बार बजट में कागज पर लिखी बातें जमीन तक पहुंचें. इसी सिलसिले में हम पहुंचे मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में- वहीं से जहां से देश के कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान आते हैं—यह जानने कि किसानों की उम्मीदें क्या हैं और उनकी पीड़ा क्या?

सीहोर के खेतों में इस समय शरबती गेहूं की बालियां हवा से बात कर रही हैं. इस गेहूं “द गोल्डन ग्रेन” कहा जाता है, लेकिन किसानों की सबसे बड़ी पहचान यह गेहूं अब सबसे बड़ी चिंता भी बन गया है.

सीहोर के किसानों की मांगें साफ और एक सुर में हैं, यहां जानिएं-

  • शरबती गेहूं सहित सभी फसलों की एमएसपी में बढ़ोतरी.
  • फसल बीमा की समय पर और पर्याप्त राशि
  • केसीसी ऋण सीमा बढ़ाने की व्यवस्था
  • फसल भंडारण के लिए गोदामों का निर्माण
  • एमएसपी पर खरीद की गारंटी
  • किसान सम्मान निधि की राशि में इजाफा

खेतों से उठती आवाज

उलझावन गांव में रूप सिंह और देव सिंह जैसे किसान कहते हैं कि खेती अब मां जैसी नहीं रही, जो बिना सवाल सब कुछ दे दे. अब खेती रोज़ इम्तिहान लेती है. प्याज की फसल दाम न मिलने से खेतों में ही सड़ गई, लागत निकलना तो दूर की बात है. किसानों का कहना है कि बीमा का प्रीमियम तो समय पर कट जाता है, लेकिन नुकसान के वक्त भुगतान नहीं मिलता.

रूपसिंह कृषि मंत्री शिवराज सिंह से मांग करते हैं कि किसानों को उनकी फसक का सही हक मिलना चाहिए. जैसे गेंहू 4000-3500 प्रति क्विंटल और सोयाबीन 5-6000 रुपये से ज्यादा प्रति क्विंटल हो. आजकल खेती महंगी हो गई है और अच्छा पैसा नहीं मिलने पर तो प्याज फेंकना पड़ गया. किसान देवसिंह भी मामा (शिवराज सिंह) से मांग कर रहे हैं कि भावांतर में किसान का पैसा समय से मिले.

चौपाल में बैठे किसानों के सवाल

अगर बारिश या ओलावृष्टि से फसल नष्ट होती है तो मुआवजा समय पर क्यों नहीं मिलता? सहकारी बैंकों से मिलने वाली केसीसी की लिमिट आज की बढ़ती लागत के मुकाबले नाकाफी क्यों है?

छोटे किसानों की बड़ी चिंता

चंदेरी और पीपल्या मीरा जैसे इलाकों में छोटे और सीमांत किसान बताते हैं कि खाद, बीज, दवा और मजदूरी की लागत कई गुना बढ़ चुकी है. मेथी पांच रुपये गड्डी बिक रही है, सोयाबीन और प्याज में भारी नुकसान हुआ है. कुछ किसानों को तो लाखों की लागत के बाद सिर्फ बीस-तीस हजार ही हाथ आए.

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प्रेमसिंह ने बताया कि वह 5 एकड़ में खेती करते हैं. बारिश में सोयाबीन की फसल खराब हो गई और मुआवजा भी नहीं मिला. उन्होंने एमएसपी बढ़ाने की मांग की, साथ ही कहा कि बीमा मिलने के लिए भी सरकार को कुछ करना चाहिए. उधर, गेंदालाल युवा किसान डेढ़ एकड़ में खेती करते हैं. महंगाई में जीवन चालान के लिए कपड़े सिलाई का भी काम करते हैं. वह चाहते हैं कि सरकार इस बार छोटे किसानों के लिए कुछ योजना लेकर आए.

चंदेरी की जमुनाबाई ने बताया कि खेती इतनी महंगी हो गई है कि लागत नहीं निकल पाती. खाद, पानी, मजदूरी, बीज, यह सब महंगा हो गया है.

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बिचौलियों और कर्ज का बोझ

किसानों का एक बड़ा दर्द बिचौलियों को लेकर है. उनका कहना है कि फायदा व्यापारी उठा लेता है और किसान खाली हाथ रह जाता है. कई किसानों की जेब में कर्ज की पर्चियां हैं, जो उनकी रोज़मर्रा की चिंता बन चुकी हैं. कर्जमाफी और निर्यात की व्यवस्था भी उनकी प्रमुख मांगों में शामिल है.

शरबती की पहचान और उम्मीद

सीहोर का शरबती गेहूं देश ही नहीं, विदेशों में भी अपनी मिठास और सुनहरे रंग के लिए जाना जाता है. किसान चाहते हैं कि इसकी एमएसपी कम से कम 5,000 रुपये प्रति क्विंटल हो, जबकि सोयाबीन 8,000 रुपये तक पहुंचे. किसानों का कहना है कि अगर सरकार शरबती का सही दाम दे तो यह पूरे क्षेत्र की किस्मत बदल सकता है.

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सीहोर के रहने वाले हैं शिवराज सिंह चौहान

सीहोर से ही देश के कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान आते हैं. इस जिले में गहरी काली मिट्टी होती है. यहां खरीफ में लगभग 3.50 लाख हेक्टेयर और रबी में 3.56 लाख हेक्टेयर रकबे में खेती होती है, खेती के रकबे का 86 प्रतिशत हिस्सा ही सिंचित है. इस जिले में गेहूं, सोयाबीन, चना, प्याज, लहसुन की खेती ज्यादा की जाती है. यहां का शरबती गेहूं देश में ही नहीं, विदेश में भी अपनी खास पहचान रखता है.

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