- भोपाल के हमीदिया अस्पताल में युवाओं में खून निकालकर फिर शरीर में चढ़ाने की खतरनाक लत सामने आई है.
- ब्लड किक एक बिहेवियरल एडिक्शन है जिसमें व्यक्ति को खून चढ़ाने से ताकत या सुकून मिलने का भ्रम होता है.
- सोशल मीडिया के कारण युवाओं में ब्लड किक की लत तेजी से फैल रही है और यह मजाक से गंभीर समस्या बन जाती है.
Blood Kick Addiction Bhopal: न शराब, न स्मैक, न कोई और ड्रग… फिर भी नशा जानलेवा. यह कहानी उस खतरनाक लत की है, जिसमें नशे का जरिया वही खून बन जाता है, जो जिंदगी को चलाता है. विदेशों में पनपा यह खौफनाक ट्रेंड अब भोपाल तक पहुंच चुका है. मेडिकल भाषा में इसे ‘ऑटोहेमोथेरेपी एब्यूज' और आम बोलचाल में ‘ब्लड किक' कहा जाता है. कुछ पल की खुशी या सुकून पाने की चाह में युवा अपने ही खून से खेल रहे हैं और अनजाने में मौत को दावत दे रहे हैं.
हमीदिया अस्पताल में सामने आया चौंकाने वाला सच
भोपाल का हमीदिया अस्पताल, जहां रोज सैकड़ों मरीज इलाज के लिए आते हैं. लेकिन पिछले कुछ महीनों में यहां मनोरोग विभाग में पहुंचे कुछ युवा मरीजों ने डॉक्टरों को भी हैरान कर दिया. इन युवाओं की लत नशे के किसी आम तरीके से जुड़ी नहीं थी. वे अपनी नस से खून निकालकर उसी खून को फिर शरीर में चढ़ाने लगे थे. उन्हें लगता था कि इससे शरीर में तुरंत एनर्जी आती है और अलग ही तरह का सुकून मिलता है.
क्या है ‘ब्लड किक' और क्यों लग जाती है लत?
मनोचिकित्सक डॉ. जेपी अग्रवाल के मुताबिक, ब्लड किक कोई मेडिकल ट्रीटमेंट नहीं, बल्कि एक बिहेवियरल एडिक्शन है. इसमें दिमाग इस क्रिया को किसी इनाम की तरह लेने लगता है. इंसान को भ्रम हो जाता है कि खून दोबारा चढ़ाने से उसे ताकत या यूफोरिया मिल रहा है, जबकि हकीकत में इसका कोई मेडिकल फायदा नहीं है. यह नशा खून का नहीं, उस पल का होता है जिसमें दर्द और राहत एक साथ महसूस होती है.
सोशल मीडिया से शुरू होकर सुई तक पहुंचता सफर
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की लत के पीछे सोशल मीडिया बड़ी वजह बन रहा है. कुछ नया, अलग और खतरनाक करने की चाह में युवा ऐसे वीडियो या पोस्ट देखकर इसे आजमाने लगते हैं. शुरुआत मजाक या जिज्ञासा से होती है, लेकिन धीरे‑धीरे यह आदत बन जाती है. जब तक इंसान समझ पाता है, तब तक वह उस अंधेरे में पहुंच चुका होता है, जहां से लौटना आसान नहीं होता.
कुछ पल के सुकून की भारी कीमत
डॉ. अग्रवाल के मुताबिक, ब्लड किक के दुष्परिणाम बेहद खतरनाक हैं. बार‑बार खून निकालने और चढ़ाने से सेप्सिस, गंभीर इंफेक्शन, HIV, हेपेटाइटिस, नसों को नुकसान, खून के थक्के, एनीमिया और यहां तक कि ऑर्गन फेल्योर का खतरा रहता है. शरीर का नेचुरल सिस्टम बिगड़ जाता है और बोन मैरो पर भी दबाव पड़ता है. कई मामलों में यह लत अचानक मौत की वजह भी बन सकती है.
मानसिक बीमारी का संकेत है यह नशा
डॉक्टरों के अनुसार, ब्लड किक के पीछे अक्सर डिप्रेशन, सेल्फ‑हार्म की प्रवृत्ति या अटेंशन सीकिंग बिहेवियर हो सकता है. खुद को दर्द देकर सुकून ढूंढने की यह एक बीमार कोशिश है. विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि जिस खून से जिंदगी चलती है, उसी खून का नशा जिंदगी छीन सकता है. यह किक नहीं, बल्कि क्लिनिकल डेथ की तरफ बढ़ता कदम है.
इलाज किक में नहीं, काउंसलिंग में है
अस्पताल में चढ़ाया गया खून जहां जान बचाने के काम आता है, वहीं इस तरह चढ़ाया गया खून जान ले सकता है. डॉ. जेपी अग्रवाल के मुताबिक, ब्लड किक कोई मेडिकल साइंस नहीं, बल्कि एक मेंटल हेल्थ समस्या है. इसका इलाज दवाइयों से ज्यादा काउंसलिंग, सही गाइडेंस और परिवार के सपोर्ट से संभव है.
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