राम मंदिर अयोध्या की तरह क्या धार भोजशाला मामले में भी मस्जिद के लिए मिलेगी जमीन? जानिए वकील ने क्या कहा

Bhojshala Verdict: धार भोजशाला विवाद पर आया हाईकोर्ट का यह फैसला कानूनी, सामाजिक और राजनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है. जहां एक ओर हिंदू पक्ष को पूजा का अधिकार मिला है, वहीं मुस्लिम पक्ष के लिए वैकल्पिक जमीन की संभावना छोड़ी गई है. अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती मिलती है या राज्य सरकार इस पर आगे क्या निर्णय लेती है.

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भोजशाला पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मंदिर माना परिसर, नमाज पर रोक; मस्जिद के लिए वैकल्पिक जमीन

Bhojshala Verdict: मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद पर इंदौर खंडपीठ के हाईकोर्ट ने बड़ा और अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने भोजशाला को वाग्देवी (मां सरस्वती) का प्राचीन मंदिर मानते हुए हिंदू पक्ष को पूजा का अधिकार दे दिया है, जबकि परिसर में नमाज की अनुमति से जुड़े पहले के आदेश को रद्द कर दिया गया है. इस फैसले के बाद एक अहम सवाल उठ रहा है कि क्या अयोध्या की तरह मुस्लिम पक्ष को वैकल्पिक जमीन दी जाएगी? इस पर अदालत ने स्पष्ट किया है कि मुस्लिम पक्ष सरकार के समक्ष आवेदन दे सकता है, जिस पर राज्य सरकार विचार करेगी.

कोर्ट का स्पष्ट फैसला: ‘भोजशाला का स्वरूप मंदिर'

इंदौर हाईकोर्ट की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि विवादित परिसर का धार्मिक स्वरूप भोजशाला का है, जिसमें देवी सरस्वती का मंदिर स्थित है.
अदालत ने यह भी माना कि ऐतिहासिक साक्ष्य इस बात की ओर इशारा करते हैं कि यह स्थान प्राचीन काल में संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र था.
इसके साथ ही कोर्ट ने 7 अप्रैल 2003 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष को नमाज की अनुमति दी गई थी.

नमाज पर रोक, पूजा का अधिकार मिला

फैसले के बाद अब भोजशाला परिसर में सिर्फ हिंदू पक्ष को पूजा-पाठ की अनुमति होगी. अदालत ने स्पष्ट किया कि यह स्थल कमाल मौला मस्जिद नहीं है, बल्कि एक मंदिर है. इस निर्णय के बाद अब लंबे समय से चली आ रही पूजा और नमाज की साझा व्यवस्था खत्म हो गई है.

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वैकल्पिक जमीन पर क्या कहा कोर्ट ने?

फैसले का सबसे अहम पहलू यह रहा कि अदालत ने मुस्लिम पक्ष के लिए वैकल्पिक जमीन को लेकर भी रास्ता खुला रखा है. एडवोकेट विष्णु शंकर जैन के अनुसार, कोर्ट ने कहा है कि मुस्लिम पक्ष सरकार के समक्ष एक औपचारिक आवेदन दे सकता है. राज्य सरकार इस पर विचार करेगी कि धार या आसपास के क्षेत्र में मस्जिद के लिए जमीन उपलब्ध कराई जा सकती है या नहीं. हालांकि, यह आदेश सीधे तौर पर जमीन देने का निर्देश नहीं है, बल्कि सरकार को निर्णय लेने का विकल्प देता है.

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एएसआई रिपोर्ट बनी फैसले का आधार

इस पूरे मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट महत्वपूर्ण आधार बनी. करीब 98 दिनों तक चले वैज्ञानिक सर्वे में हजारों पन्नों की रिपोर्ट तैयार की गई थी. इसमें उल्लेख किया गया कि वर्तमान संरचना से पहले यहां परमार काल का मंदिर था, जिसके अवशेषों का उपयोग बाद में निर्माण में किया गया. हिंदू पक्ष ने इस रिपोर्ट को अपने दावे का प्रमुख सबूत बताया, जबकि मुस्लिम पक्ष ने इसे पक्षपातपूर्ण बताया था.

वकील विष्णु जैन ने क्या कहा?

मामले में हिंदू पक्ष के वकील विष्णु शंकर जैन ने फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि “कोर्ट ने भोजशाला को हिंदू मंदिर माना है और पूजा का अधिकार दिया है. मुस्लिम पक्ष को कहा गया है कि वे सरकार के सामने आवेदन दे सकते हैं, जिस पर वैकल्पिक जमीन को लेकर विचार होगा.” उनके अनुसार, यह फैसला लंबे समय से चल रहे विवाद का कानूनी समाधान है.

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज BJP vs Congress

भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने फैसले का स्वागत करते हुए इसे “सत्य की जीत” बताया. उन्होंने कहा कि सनातन समाज ने लंबे संघर्ष के बाद यह दिन देखा है. पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने कहा कि अदालत के फैसले से उन्हें खुशी हुई है और यह स्पष्ट था कि भोजशाला मंदिर ही है. वहीं फैसले के बाद मुस्लिम पक्ष ने इसे चुनौती देने के संकेत दिए हैं. धार के शहर काजी ने कहा कि वे फैसले का सम्मान करते हैं, लेकिन इसका अध्ययन कर सुप्रीम कोर्ट जाएंगे. कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने भी कहा कि वे इस फैसले से सहमत नहीं हैं और इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी.

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अयोध्या केस से तुलना क्यों हो रही?

इस फैसले के बाद कई लोग अयोध्या मॉडल से इसकी तुलना कर रहे हैं, जहां सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर निर्माण के साथ मुस्लिम पक्ष को अलग जमीन देने का आदेश दिया था. हालांकि, भोजशाला मामले में हाईकोर्ट ने सीधे जमीन देने का आदेश नहीं दिया है, बल्कि इसे सरकार के विवेक पर छोड़ा है. यानी यहां अयोध्या जैसा स्पष्ट निर्देश नहीं है, लेकिन एक समान विकल्प जरूर खुला रखा गया है.

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आगे क्या होगा?

अब इस मामले में दो महत्वपूर्ण संभावनाएं हैं. मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकता है. राज्य सरकार के पास वैकल्पिक जमीन पर निर्णय लेने का अधिकार रहेगा. इसके साथ ही प्रशासन को इलाके में शांति बनाए रखने और फैसले के पालन को सुनिश्चित करने की चुनौती भी होगी.

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