MP के नगरीय निकायों में एल्डरमैन नियुक्तियां अटकीं; कांग्रेस और BJP आमने‑सामने, सियासत तेज

MP Alderman Appointments: मध्यप्रदेश के 244 नगरीय निकायों में हजार से ज्यादा एल्डरमैन नियुक्तियां लंबित. सहमति के नाम पर देरी, कांग्रेस ने बीजेपी को घेरा. पढ़िए पूरी खबर.

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एल्डरमैन की नियुक्तियां मध्य प्रदेश में कब? BJP vs कांग्रेस

MP Alderman Appointments: मध्यप्रदेश के नगरीय निकायों में एल्डरमैन की नियुक्तियां अब महज प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रहीं, बल्कि सियासी खींचतान का मुद्दा बन चुकी हैं. प्रदेश के 244 शहरी निकायों में दूसरे चरण की नियुक्तियां पिछले एक महीने से अटकी हुई हैं. बड़े शहरों से लेकर संवेदनशील अंचलों तक नामों पर सहमति नहीं बन पा रही है. स्थानीय विधायक, सांसद और पार्टी संगठन के बीच तालमेल की कमी के चलते सूची आगे नहीं बढ़ पा रही. इस देरी को लेकर विपक्ष ने सरकार को घेर लिया है, जबकि सत्तारूढ़ दल इसे सामान्य प्रक्रिया बता रहा है. आने वाले नगरीय चुनावों से पहले यह मुद्दा अहम माना जा रहा है.

एक हजार से ज्यादा एल्डरमैन पद खाली

प्रदेश में 244 नगरीय निकाय यानी नगर निगम, नगर पालिका और नगर परिषदों में एक हजार से अधिक एल्डरमैन की नियुक्तियां अब भी लंबित हैं. भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर समेत 16 नगर निगमों में अब तक एल्डरमैन के नामों का ऐलान नहीं हो सका है. इन सभी जगहों पर नियुक्तियां दूसरे चरण में होनी थीं, लेकिन सहमति के अभाव में प्रक्रिया ठप पड़ी है.

पहला चरण पूरा, दूसरे पर ब्रेक

सरकार पहले चरण में 169 निकायों में 768 एल्डरमैन की नियुक्ति कर चुकी है. लेकिन दूसरे चरण में चंबल और बुंदेलखंड जैसे इलाकों में नामों पर विवाद इतना बढ़ा कि सूची को होल्ड करना पड़ा. कई जगहों पर स्थानीय जनप्रतिनिधियों और संगठन के जिला स्तर के नेतृत्व में मतभेद खुलकर सामने आए.

बड़े शहरों में ज्यादा खींचतान

सूत्रों के मुताबिक, बड़े शहरों में खींचतान सबसे ज्यादा है. इंदौर जैसे अहम नगर निगम से अब तक जिलाध्यक्ष का पैनल भोपाल नहीं पहुंच पाया है. चारों महानगरों भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर में 12‑12 एल्डरमैन नियुक्त किए जाने हैं, लेकिन हर नाम पर अलग‑अलग दावेदारी और सिफारिशें सामने आ रही हैं.

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MP Alderman Appointments: मध्यप्रदेश एल्डरमैन नियुक्ति

दावेदारों का घटता उत्साह

नियुक्तियों में देरी का एक कारण दावेदारों की बदलती मानसिकता भी है. अगले साल होने वाले नगरीय निकाय चुनावों को देखते हुए कई इच्छुक नेता खुद पीछे हटने लगे हैं. छोटा कार्यकाल और चुनावी टिकट को लेकर अनिश्चितता ने एल्डरमैन बनने के उत्साह को कम कर दिया है.

कांग्रेस ने बताया बीजेपी की गुटबाजी

विपक्ष ने इस पूरी देरी को बीजेपी की अंदरूनी गुटबाजी से जोड़ दिया है. पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता पीसी शर्मा ने कहा कि बड़े‑बड़े नेता जो कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में गए हैं, वे भी एल्डरमैन बनना चाह रहे हैं. उनके मुताबिक, पार्टी के अंदर इतना घमासान है कि मुख्यमंत्री को खुद हालात का “निरीक्षण” करना पड़ रहा है. कांग्रेस का दावा है कि यह नियुक्तियां आने वाले चुनावों में बीजेपी की कमजोरियों को उजागर करेंगी.

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बीजेपी का पलटवार

बीजेपी ने कांग्रेस के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है. पार्टी प्रवक्ता अजय सिंह यादव का कहना है कि बीजेपी एक कैडर आधारित और बड़ा संगठन है, इसलिए निर्णय प्रक्रिया में समय लगना स्वाभाविक है. उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस में पदों का इस्तेमाल भ्रष्टाचार के लिए किया जाता है, जबकि बीजेपी में दायित्व सिर्फ जनहित और संगठन के काम के लिए दिए जाते हैं.

क्यों अहम हैं एल्डरमैन की नियुक्तियां?

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, एल्डरमैन की नियुक्तियां केवल नामांकन नहीं होतीं, बल्कि वे शहरी राजनीति की दिशा तय करती हैं. ये चेहरे नगर निगमों और परिषदों में सत्ता संतुलन, विकास प्रस्तावों और भविष्य की चुनावी रणनीति में अहम भूमिका निभाते हैं. चुनाव से पहले संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए इन्हें एक अहम कड़ी माना जाता है.

दूसरी सूची पर टिकी निगाहें?

फिलहाल सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि एल्डरमैन की दूसरी सूची कब जारी होगी. जैसे‑जैसे नगरीय निकाय चुनाव नजदीक आ रहे हैं, हर फैसला सियासी तौर पर ज्यादा महत्वपूर्ण होता जा रहा है. कुल मिलाकर एल्डरमैन की अटकी हुई नियुक्तियां सिर्फ देरी का मामला नहीं हैं, बल्कि इसके पीछे चल रहे अंदरूनी समीकरणों की कहानी भी हैं. सहमति की तलाश, घटती दावेदारी और चुनावी दबाव—इन सबके बीच अब देखना होगा कि सरकार समय रहते यह सियासी पेंच सुलझा पाती है या नहीं.

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