कक्षा की खिड़की से झांकता भविष्य: दिनेश कर्नाटक की किताब में शिक्षा की चुनौतियों का सच

किताब में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 को बार-बार संदर्भित किया गया है. लेखक मानते हैं कि यदि इस दस्तावेज़ में दिए सुझावों को ईमानदारी से लागू किया जाए, तो शिक्षा व्यवस्था में बदलाव संभव है.

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'शिक्षा में बदलाव की चुनौतियाँ' किताब शिक्षा से जुड़े 29 लेखों का संग्रह है.

स्कूलों के नए सत्र की शुरुआत में हर साल शिक्षा में बदलावों पर बात होती है, 'शिक्षा में बदलाव की चुनौतियाँ' किताब हमारी शिक्षा व्यवस्था की इन्हीं जटिलताओं को उजागर करता एक जरूरी दस्तावेज है.

आवरण चित्र बना बच्चों की उम्मीदों का प्रतिबिंब

काव्यांश प्रकाशन से छपी इस किताब का आवरण चित्र पहली नज़र में ही दिलचस्पी जगा देता है. डॉ. मनोज रांगड़ और विनोद उप्रेती द्वारा बनाई गई यह कलाकृति एक खिड़की से झांकते बच्चे की आंखों में उम्मीदों का पूरा आकाश समेटे हुए है. यह चित्र सवाल उठाता है कि क्या हमारी शिक्षा प्रणाली बच्चों को इस खिड़की से बाहर निकलने का रास्ता दिखा पा रही है.

किताब के 29 लेखों में समेकित शिक्षा की बहस

अनुक्रम से पता चलता है कि यह किताब शिक्षा से जुड़े 29 लेखों का संग्रह है. विविध विषयों पर केंद्रित ये लेख पाठकों को तुरंत अपने विमर्श में खींच लेते हैं. लेखक ने अपने शिक्षण अनुभवों को इस तरह पिरोया है कि हर अध्याय शिक्षा पर लिखा एक महत्वपूर्ण निबंध लगता है.  

कृष्णमूर्ति से लेकर गिजूभाई तक, शिक्षा दर्शन की यात्रा

पहला लेख जे. कृष्णमूर्ति के शिक्षा-दर्शन पर चर्चा करता है. सरल भाषा में लिखे इस अध्याय में बच्चों की सृजनशीलता को प्रेरित करने की बात केंद्रीय है. 'क्या हम अपने विद्यार्थियों को जानते हैं' जैसे लेखों में लेखक ने बैंकिंग व्यवस्था और 'प्रथम' संस्था के मॉडल को शिक्षा से जोड़कर नई दृष्टि दी है. साथ ही, 1932 में गिजूभाई द्वारा किए गए प्रयोगों का स्मरण कराते हुए यह सवाल उठाया गया है कि आज के शिक्षक छात्रों की वास्तविक ज़रूरतों से कितना वाकिफ हैं.  

सरकारी बनाम प्राइवेट स्कूलों से दो दुनियाओं का बढ़ता फासला

एक लेख में सरकारी और निजी स्कूलों के बीच बढ़ते अंतर को रेखांकित किया गया है. लेखक के अनुसार, यह असमानता देश में दो तरह की दुनियाओं को जन्म दे रही है. कुछ अंश चौंकाते हैं, जैसे '9वीं तक सभी बच्चे साथ बैठते थे, लेकिन 10वीं में मुस्लिम छात्र अलग हो जाते थे.' ऐसे उदाहरण सामाजिक विखंडन की गहरी समस्या की ओर इशारा करते हैं.  

ट्यूशन संस्कृति और प्राइवेट स्कूलों के बढ़ते प्रभाव पर तीखी टिप्पणी करते हुए लेखक लिखते हैं 'शिक्षा के व्यापारी आम लोगों की जमा-पूंजी छीन रहे हैं.' प्राइवेट स्कूलों की फीस व्यवस्था को वह देश की सबसे बड़ी संगठित लूट बताते हैं. अंग्रेजी थोपने की नीति पर सवाल उठाते हुए पर्यटन गाइडों का उदाहरण दिया गया है, जो बिना औपचारिक शिक्षा के भाषा सीख लेते हैं.

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शिक्षकों की मानसिकता और मारपीट के पीछे का सच

एक लेख में लेखक पूछते हैं कि शिक्षक बच्चों को क्यों पीटते हैं और इसका जवाब वे सिस्टम में ढूंढते हैं. उनके अनुसार यह एक आसान रास्ता है, जहाँ न तो रचनात्मक समाधान चाहिए न ही छात्रों की भावनाओं का ख्याल.

किताब में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 को बार-बार संदर्भित किया गया है. लेखक मानते हैं कि यदि इस दस्तावेज़ में दिए सुझावों को ईमानदारी से लागू किया जाए, तो शिक्षा व्यवस्था में बदलाव संभव है. वे स्वास्थ्य सेवाओं की तर्ज पर शिक्षा को मेट्रो जैसी प्राथमिकता देने की वकालत करते हैं.  

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अंतिम लेखों में 'प्रथम' संस्था की रिपोर्ट का विश्लेषण किया गया है. एनसीआरटी के सर्वे के हवाले से बताया गया है कि परीक्षाएं छात्रों की चिंता का प्रमुख कारण हैं. लेखक का मानना है कि यदि पुस्तक में दिए सुझावों को अमल में लाया जाए, तो बच्चों का बचपन और भविष्य दोनों सुरक्षित हो सकते हैं.  

एक शिक्षक का अनुभव-संपन्न आह्वान

यह पुस्तक केवल समस्याएं गिनाने तक सीमित नहीं रहती. हर लेख के साथ लेखक का व्यक्तिगत संघर्ष और समाधान की तलाश झलकती है. शिक्षा नीति निर्माताओं के लिए यह एक दस्तावेज है. जैसे किताब में लिखा है 'स्कूलों में जीवन बिता देने वाले शिक्षकों से नीतियां बनवाई जाएं, तो सिस्टम बदल सकता है.'  

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