Meri Diary: Forensic Science Student Real Life Story: क्वोरा पर अक्सर आपको ऐसे अनुभव देखने को मिल जाते हैं जो जहन में गहरी छाप छोड़ देते हैं. हाल ही में फॉरेंसिक साइंस की पढ़ाई कर रहे छात्र ने अपने अनुभव यहां साझा किए और बताया कि कॉलेज में किस तरह से पढ़ाया और सिखाया जाता है. कैसे किसी ऐसी बॉडी को ट्रीट किया जाता है जो पोस्टमार्टम के लिए आती है. छात्र का यह अनुभव आपको सिहरन दे सकता है. यह पोस्ट कोलकाता में रहने वाले पल्ल्ब रॉय चौधरी की है. जिसमें वे अपनी पहली ऑटोप्सी अनुभव साझा कर रहे हैं. आपका पहला ऑटोप्सी अनुभव कैसा था? यहां है क्वोरा पर की गई ये पूरी पोस्ट -
आपका पहला ऑटोप्सी अनुभव कैसा था? (How was your first autopsy experience?)
फॉरेंसिक साइंस की पढ़ाई के दूसरे साल की बात है, जब मैंने पहली बार अपनी आंखों से एक ऑटोप्सी यानी शव परीक्षा देखी.
एक नौजवान लड़का था, करीब 25 से 30 साल का. बताया गया कि उसने फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली है.
उसे एक ठेले पर लाकर लाया गया था, बिल्कुल वैसे ही ठेले पर जैसे रेहड़ी-पटरी वाले सामान बेचते हैं. साथ में पुलिस भी थी, तो हम सब थोड़ा घबरा गए थे.
मुझे इस बात ने काफी हैरान किया कि मौत के बाद शरीर के साथ कैसा बर्ताव किया जाता है. वहां जो सहायक था, उसने बस डेड बॉडी को ठेले से बाहर खींचा. बॉडी से बहुत गंदी बदबू आ रही थी.
एक जोर की आवाज आयी और बॉडी फर्श पर जा गिरी. बिल्कुल बेजान. उसके नाक से तेजी से खून निकलने लगा.
तभी हमारे सर ने एक बात कही. उन्होंने बताया कि खून अभी बहा है और ये थक्का नहीं बना है, इसका मतलब ये चोट मौत से पहले की है. शायद एथमॉइड हड्डी टूटने की वजह से ऐसा हुआ है.
हममें से किसी ने पूछा कि सर अगर फांसी लगायी है तो सर की हड्डी कैसे टूट सकती है.
सर ने मुस्कुराते हुए कहा कि असली ट्विस्ट यही है. इसने खुदकुशी नहीं की है. इसके सर पर किसी भारी चीज या शायद जोर का मुक्का मारा गया है जिससे इसकी मौत हुई. बाद में इसे फांसी पर लटका दिया गया ताकि ये सुसाइड लगे.
हम सब सर का दिमाग देखकर हैरान रह गए. ऐसा लग रहा था मानो हम शरलॉक होम्स को लाइव देख रहे हों.
इसके बाद सर ने कहा कि चलो अब इसे खोलकर देखते हैं. उन्होंने हथौड़ा और छेनी जैसा एक औजार लिया और सिर को खोला. वो बिल्कुल किसी सूटकेस की तरह खुल गया और अंदर जमा हुआ खून साफ दिख रहा था.
फिर उन्होंने पेट की जांच की ये देखने के लिए कि कहीं जहर तो नहीं दिया गया, पर ऐसा कुछ नहीं मिला. करीब दो घंटे तक शरीर के एक-एक हिस्से की बारीकी से जांच हुई.
जब पूछा गया कि सर इसकी मौत कैसे हुई, तो उन्होंने कहा कि ये तय करना पुलिस का काम है, हम सिर्फ वो बताएंगे जो हमने यहां देखा है.
बाद में हमने और भी कई तरह के केसेस देखे. सांप के काटने से मौत, जलने से मौत और जहर खाने के कई मामले. एक वीआईपी केस भी था जिसका नाम मैं नहीं बता सकता. डूबने के केसेस और एक ऐसा केस भी देखा जहां कुल्हाड़ी से सर दो हिस्सों में बंट गया था.
गोली लगने के भी कई केसेस देखे जो राइफल या पिस्टल से मारे गए थे. मैंने ये भी देखा कि लड़ाई-झगड़े में मारे गए जोर के मुक्के भी मौत का कारण बन सकते हैं. इसलिए दोस्तों, कभी लड़ाई में हाथों का इस्तेमाल न करें.
पैथोलॉजी में हमने एक अधूरा विकसित भ्रूण यानी फीटस भी देखा जिसे एकाडियक ट्विन कहते हैं.
सच कहूं तो ये सब देखना कोई मजेदार अनुभव नहीं था. लाशों को देखना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता, लेकिन सीखने को बहुत कुछ मिला.
नोट : यह सोशल नेटवर्किंंग साइट से ली गई जानकारी है. एनडीटीवी इसकी तथ्यात्मक पुष्टि नहीं करता.
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