Jharkhand: झारखंड में कितनी खतरनाक है पुलिस कस्टडी? आ गया मौतों का आंकड़ा; अब इंतजार हाई कोर्ट के फैसले का

चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की दो न्यायाधीशों की पीठ ने झारखंड में हिरासत में कथित यातना और मौत के मामले में दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई पूरी कर ली है.

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Jharkhand High Court
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  • झारखंड में 2018 से 2025 के बीच पुलिस हिरासत में 437 लोगों की मौत दर्ज की गई है.
  • झारखंड हाई कोर्ट ने हिरासत में मौतों से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा.
  • जनहित याचिका में हिरासत में मौतों की ज्यूडिशियल जांच की मांग की गई थी.
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देश के कई राज्यों की तरह झारखंड में भी अक्सर पुलिस की कार्यशैली को लेकर सवाल उठते रहते हैं. इसी को लेकर झारखंड में एक जनहित याचिका डाली गई थी. इसकी सुनवाई के दौरान अब तथ्य सामने आ गए हैं. सरकारी तौर पर अदालत को बताया गया है कि राज्य में 2018 से 2025 के सात वर्षों के दौरान पुलिस हिरासत में 437 लोगों की मौत हुई. इस आंकड़े के सामने आने के बाद अब निगाहें झारखंड हाई कोर्ट पर लगी हैं कि वह इस गंभीर मुद्दे को लेकर झारखंड की पुलिस के बारे में क्या रूख लेता है.

हाईकोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित

झारखंड हाई कोर्ट में चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की दो न्यायाधीशों की पीठ ने हिरासत में कथित यातना और मौत के मामले में दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई पूरी कर ली है. अदालत ने सभी पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया है. इस संबंध में दायर जनहित याचिका में लगभग 10 वर्षों के अंदर हिरासत में हुई मौतों की ज्यूडिशियल जांच एवं नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन के निर्देशों का पालन करने की मांग की गई है.

2018 से 2025 तक 437 मौतें

गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग की प्रधान सचिव वंदना दादेल द्वारा दायर शपथपत्र के साथ संलग्न तालिका में बताया गया कि वर्ष 2018 से 2025 के बीच 437 व्यक्तियों की पुलिस या न्यायिक हिरासत में मृत्यु हुई. हालांकि तालिका में यह उल्लेख था कि मृत्यु की सूचना मजिस्ट्रेट को दी गई या नहीं. लेकिन अधिकांश मामलों में यह स्पष्ट नहीं था कि धारा 176(1-A) के तहत अनिवार्य न्यायिक जांच वास्तव में कराई गई या नहीं.

प्रार्थी के अधिवक्ता शादाब अंसारी का कहना है कि मामले में अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा है, लेकिन कई ऐसे मामले हैं जो बेहद पुराने हो चुके हैं, जिनसे संबंधित साक्ष्य जुटाना संभव नहीं है. ऐसे में अदालत अपने फैसले में दिशा-निर्देश जारी करेगी ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर लगाम लगाई जा सके.

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