- ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के कारण होर्मुज स्ट्रेट बंद है, जो दुनिया के तेल आवागमन के लिए महत्वपूर्ण मार्ग है
- रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत ने मध्यस्थता के लिए शांति की कोशिशें की हैं, सही समय पर भूमिका निभाएगा
- भारत ने होर्मुज स्ट्रेट से अपने जहाज सुरक्षित निकालने में सफलता पाई है, जो उसकी संतुलित कूटनीति को दर्शाता है
ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे तनाव की वजह से होर्मुज स्ट्रेट बंद है. होर्मुज के रास्ते ही दुनियाभर के 20 फीसदी तेल का आवागमन होता है. ऐसे में इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है. होर्मुज को लेकर भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का बड़ा बयान सामने आया है. उन्होंने कहा है कि भारत ने शांति की कोशिश की है. उन्होंने कहा कि लेकिन हर चीज का वक्त होता है. जब समय आएगा तो भारत भी भूमिका निभाएगा और सफलता पाएगा. इस बयान के बाद भारत द्वारा मध्यस्थता की चर्चा तेज हो गई है. ऐसे कई कारण हैं, जिनकी वजह से भारत सबसे बेहतर मध्यस्थ बन सकता है. आइए इन्हें समझते हैं.
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के मद्देनजर कहा कि होर्मुज स्ट्रेट में व्यवधान कोई दूर की घटना नहीं बल्कि यह एक कड़वी सच्चाई है जिसका भारत की सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता पर सीधा असर पड़ता है.
'भारत ने शांति की कोशिश की है'
जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से पूछा गया कि मिडिल ईस्ट संकट के बीच शांति कायम करने में भारत की कोई भूमिका है या नहीं, तो उन्होंने कहा, 'भारत ने कोशिश की है. लेकिन हर चीज का एक सही समय होता है. हो सकता है कि कल ऐसा समय आए जब भारत इसमें अपनी भूमिका निभाए और सफल भी हो. हम इस संभावना से इनकार नहीं कर सकते. प्रधानमंत्री ने दोनों पक्षों से युद्ध खत्म करने की अपील की है. कूटनीतिक मामलों में हमारे प्रधानमंत्री का दृष्टिकोण बहुत संतुलित है.'
'भारत के जहाज होर्मुज से निकल रहे'
उन्होंने आगे कहा, 'जब पीएम मोदी ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन और यूक्रेनी राष्ट्रपति से बात की, तो उन्होंने इस पर चर्चा की. यहां तक कि उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से भी इस पर चर्चा की और कहा कि कोई समाधान निकाला जाना चाहिए. जिस तरह से भारत आगे बढ़ रहा है, आपने देखा ही होगा कि होर्मुज़ स्ट्रेट से किसी भी देश का कोई जहाज गुजर नहीं पा रहा था. अगर कोई देश अपने 7-8 जहाजों को वहां से निकालने में कामयाब रहा, तो वह भारत ही था. ऐसा नहीं है कि अमेरिका भारत को अपना दुश्मन मानता है, या ईरान भारत को अपना दुश्मन मानता है. नहीं, यह भारत की बहुत ही बैलेंस अप्रोच रही है.'
क्यों भारत मध्यस्थता के लिए सबसे बेहतर?
ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता कराने के लिए भारत की स्थिति काफी बेहतर है. इसकी कई वजह हैं.
- भारत की छवि एक ऐसे देश की है जो किसी एक खेमे का हिस्सा नहीं है. फिर वो रूस-यूक्रेन युद्ध हो मिडिल ईस्ट में चल रहा तनाव.
- भारत अपने फैसले किसी बाहरी दबाव के बजाय अपने हितों और वैश्विक शांति के आधार पर लेता है. यह भारत को एक ईमानदार मध्यस्थ बनाती है.
- भारत आज विकासशील देशों का नेतृत्व कर रहा है. इसलिए उसकी पहल को गंभीरता से लिया जाता है.
- भारत के पास वह 'सॉफ्ट पावर' और कूटनीतिक पहुंच है कि वह एक तरफ अमेरिका और यूरोप से बात कर सकता है, तो दूसरी तरफ रूस, ईरान और अरब देशों से.
पाकिस्तान कैसे हो गया फेल?
ईरान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता कराने के लिए पाकिस्तान आगे आया. इस्लामाबाद में एक राउंड की बातचीत भी हुई. मंच सजा टेबल सजी, ईरान और अमेरिका से बातचीत करने शीर्ष नेता और अधिकारी भी आए. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी इस्लामाबाद पहुंचे. करीब 22 घंटे तक शहबाज शरीफ दोनों पक्षों की बात कराने की कोशिश करते रहे, लेकिन यह बातचीत बेनतीजा निकली. पाकिस्तान वही करता है जो अमेरिका उससे कहता है. ऐसे में उसकी विश्वसनीयता भी कम है. ईरान और अमेरिका दोनों ही पक्षों पर पाकिस्तान किसी भी सूरत में दबाव नहीं बना पाता. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ईरान ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि पाकिस्तान निष्पक्ष नहीं है और वह अमेरिका की शर्तों को उन पर थोपने की कोशिश कर रहा है. पाकिस्तान एक तरफ ईरान के साथ सीमा साझा करता है और दोस्ती का दावा करता है, वहीं दूसरी तरफ वह सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते के तहत बंधा हुआ है. इस विरोधाभास के कारण न तो ईरान उस पर पूरी तरह भरोसा करता है और न ही सऊदी अरब, जिसे लगता है कि संकट के समय पाकिस्तान ने उसका साथ नहीं दिया.
बता दें कि राजनाथ सिंह जर्मनी यात्रा पर हैं उन्होंने तीन दिवसीय यात्रा के पहले दिन रक्षा एवं सुरक्षा संबंधी संसदीय स्थायी समिति को संबोधित करते हुए यह भी कहा कि आज दुनिया नए सुरक्षा खतरों का सामना कर रही है और तकनीकी परिवर्तन ने स्थिति को बेहद जटिल एवं परस्पर संबंधित बना दिया है. मंत्री ने कहा कि बदलते परिवेश के अनुकूल ढलने की तत्परता के साथ एक नए दृष्टिकोण की आवश्यकता है. सिंह ने भारत और जर्मनी के रक्षा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्रों के बीच सहयोग बढ़ाने की भी पुरजोर वकालत की.
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