दिल्ली के पुराने लोहा पुल की तरह प्रयागराज का नैनी ब्रिज भी होगा रिटायर, दोनों की एक सी कहानी

दिल्ली की तरह ही प्रयागराज में भी ऐतिहासिक पुल है. दोनों में कई समानाताएं हैं, जो पढ़ने वालों को जिज्ञास में भर सकती है. पहले तो, दोनों ही पुल का निर्माण बिट्रिश शासनकाल में यमुना नदी पर हुआ है.

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  • दिल्ली और प्रयागराज के यमुना नदी पर बने पुराने लोहा पुल ब्रिटिश काल में बनाए गए थे और उनकी बनावट लगभग समान है
  • दोनों पुलों का निर्माण 1859 और 1863 में शुरू हुआ था और इन्हें डबल लाइन रेलवे ट्रैकों के रूप में विकसित किया
  • ये पुल सिर्फ आवागमन के साधन नहीं, बल्कि शहरों की पहचान और लोगों के बीच भावनात्मक संबंध का प्रतीक रहे हैं
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नई दिल्ली:

दिल्ली की ऐतिहासिक पहचान रहा यमुना नदी पर बना पुराना लोहा पुल अब जल्द ही रिटायर हो जाएगा. नए पुल के उद्घाटन के बाद से पुराने ब्रिज पर ट्रेनों की आवाजाही बंद हो जाएगी. हालांकि, नीचे सड़क पर गाड़ियों का आवागमन चालू रहेगा. ऐसे में जब इस पुराने लोहा पुल की हर तरफ इतनी चर्चा है तो प्रयागराज के नैनी पुल का जिक्र जरूर होना चाहिए क्योंकि दोनों पुल में बहुत सी समानाताएं हैं.

अंग्रेजों के जमानें में बनें दोनों पुल

दिल्ली की तरह ही प्रयागराज में भी ऐतिहासिक पुल है. दोनों में कई समानाताएं हैं, जो पढ़ने वालों को जिज्ञास में भर सकती है. पहले तो, दोनों ही पुल का निर्माण बिट्रिश शासनकाल में यमुना नदी पर हुआ है. दिल्ली का लोहा पुल 1863 में बनना शुरू हुआ और सन् 1866 में जाकर पूरा हुआ जबकि नैनी पुल का निर्माण कार्य वर्ष 1859 में शुरू हुआ और 15 अगस्त साल 1865 में आम जनता के लिए खोल दिया गया. रंग रूप, नक्शा और बनावट में दोनों लगभग एक समान हैं. तस्वीरों में अचानक से देखने पर पहचानना भी थोड़ा मुश्किल है लेकिन दोनों के बीच का फासला 700 किमी से अधिक का है. दिल्ली का लोहा पुल 850 मीटर का है तो नैनी रेलवे पुल 960 मीटर लंबा है. दोनों ही डबल-डेकर पुल दिल्ली-हावड़ा रूट के मुख्य रेल नेटवर्क रहे हैं. पहले इन पुलों पर एक लाइन का निर्माण हुआ जो आगे चलकर डबल लाइन में कनवर्ट हो गया.

हैरिटेज पुल का दर्जा

इन पुलों की सबसे खास बात यह है कि दोनों ने ही अपने शहरों की पहचान बनाई और दिलाई. दिल्ली और प्रयागराज (तात्कालीक इलाहाबाद) इन पुलों के नाम से जाना और पहचाना गया. यही वजह है कि दोनों को हैरिटेज का दर्जा मिला है. इस पर ऊपर से जब रेलगाड़ियां और नीचे से वाहनों का आवागमन एकसाथ होता है तो निसंदेह थोड़ा भय जरूर लगता है, लेकिन यह अलग सुखद अहसास भी कराता है.

दिलों को जोड़ता पुल

नैनी का पुल सिर्फ आवागमन या सिर्फ व्यापार के साधन नहीं रहा बल्कि यह दिलों को जोड़ने वाले सेतु का काम करता आया है. इसने शहरों को बसते देखा है. पीढ़ियां आई और चली गईं, लेकिन ये पुल आज भी मजबूती से खड़ा है. लाखों लोगों को प्रतिदिन ढोहते दोनों पुल ने कभी उफ तक नहीं की, दर्द हुआ तो दवा ले ली, लेकिन समय के साथ बिना झुके मजबूती से खड़े रहे. एक ने पुरानी दिल्ली को पूर्वी दिल्ली से जोड़ा तो दूसरे ने प्रयागराज शहर को नैनी से मिलाया. यह पुल लोगों की उम्मीद, विश्वास के साथ-साथ शहरों का प्रमुख लैंडमार्क रहा है. इस पुल से जब पटरियों से ट्रेनें गुजरती हैं तो उस वक्त निकलने वाली 'खड़खड़' और 'ठक-ठक' की आवाज लोगों को अलग ही अनुभव कराती हैं. 

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भारत के सबसे पुराने पुल

हिंदुस्तान और भारतीय रेलवे के इतिहास के सबसे पुराने पुलों में शुमार यह पुल इंजीनीयिरिंग कौशल का शानदार नमूना है. आज के जमाने में जब पुल निर्माण कार्य के कुछ वक्त बाद ढहने शुरू हो जाते हैं, तब यह 160 साल पुराने पुल अपनी मजबूती का एक उदाहरण पेश करते हैं कि कैसे तमाम आंधी-तूफानों के झेलने के बावजूद ये चट्टानों की तरह बिना हिले खड़े हैं.

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1978 की बाढ़ में डूबे थे पुल

सबसे रोचक बात यह है कि जब सितंबर 1978 की ऐतिहासिक और विनाशकारी बाढ़ आई थी, तो यह डूब गए थे. इसे सदी की सबसे भीषण बाढ़ माना जाता है, जिसमें गंगा और यमुना का जलस्तर खतरे के निशान से बहुत ऊपर पहुंच गया था, इस दौरान दोनों पुल जलमग्न हो गए थे. यही वजह है कि आज जब बारिश होती है यह पुल बाढ़ का मानक बनते हैं कि शहर की क्या स्थिति है.

दशकों की लंबी यात्रा में हर पड़ाव को देखा

इन पुलों की सबसे खास बात यह है कि दोनों भारतीय रेल की यात्रा के सच्चे सार्थी रहे हैं. भाप के इंजन से लेकर इलेक्ट्रिक इंजन तक का इन्होंने साथ में सफर किया है. रेलवे के पुलों, इमारतों और नेटवर्क विस्तार पर कई शोध करने वाले भारतीय रेल के अधिकारियों और विशेषज्ञों ने पुराने यमुना ब्रिज को ‘‘भारत की अमूल्य धरोहर'' बताया है. भारतीय रेलवे के वरिष्ठ अधिकारी पी के मिश्रा के अनुसार, ‘‘यह लोहे का एक पुराना घोड़ा है, जो 1860 से यमुना नदी पर सरपट दौड़ रहा है. इसने भांप से चलने वाली ट्रेन के युग, डीजल युग और बिजली से चलने वाली ट्रेन के युग को देखा है.''

हिंदुस्तान में रेल सेवा की शुरुआत 16 अप्रैल 1853 को बंबई से ठाणे के बीच हुई थी. ‘ब्रिजेस, बिल्डिंग्स एंड ब्लैक ब्यूटीज ऑफ नॉर्दर्न रेलवे' किताब के अनुसार, ‘‘ब्रिटिश काल की सबसे सफल रेल कंपनियों में से एक'' तत्कालीन पूर्वी भारतीय रेलवे ने दिल्ली-हावड़ा लाइन का निर्माण किया था. उत्तर रेलवे के पूर्व जीएम विनू एन माथुर द्वारा लिखी इस पुस्तक में अविभाजित भारत में निर्मित विभिन्न रेलवे पुलों का इतिहास बयां किया गया है, जिनमें दिल्ली और प्रयागराज में यमुना पर बने ‘‘प्रसिद्ध पुल'' भी शामिल हैं. 

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इतिहास के पन्नों में दर्ज करने की तैयारी

आज जब दोनों ही पुल अपने कई दशकों की यात्रा पूरी करने जा रहे हैं, तो इनके भार को भी कम किया जा रहा है. दिल्ली के लोहा पुल की जगह लेने के लिए नया पुल आधुनिक तरीके से उद्धघाटन के लिए तैयार हैं तो वही पुराने नैनी पुल के बगल एक नया रेलवे ब्रिज के निर्माण को मंजूरी मिल गई है. इसे साल 2031 में लगने वाले कुंभ मेले से पहले तैयार करने की योजना है. यह पुल चिनाब रेल ब्रिज की तर्ज पर स्फेरिकल बेयरिंग तकनीक से बनेगा. यानी आने वाले कुछ वर्षों में नैनी पुल भी रिटायर हो जाएगा और इसी के साथ अंत होगा भारतीय रेलवे के सबसे ऐतिहासिक रेल पुलों का यादगार सफर.

आने वाले वक्त में यह पुल सिर्फ किताबों, किस्से और कहानियों में सुने और पढ़े जाएंगें लेकिन यह अपने साथ जो विरासत, पहचान और इतिहास ले जाएंगे उसे सदियों याद किया जाएगा. प्रयागराज में पले-बढ़े और लंबे समय से दिल्ली में रह रहे राजीव कुमार दुबे बताते हैं कि प्रयागराज का लोहा पुल और नैनी का नैनी यमुना ब्रिज सिर्फ यात्रा के मार्ग नहीं थे, बल्कि रोजमर्रा के साथी जैसे थे. इन पुलों से गुजरना अपने आप में एक अलग एहसास और अनुभव देता था. इन पर चलकर जाना केवल एक सफर पूरा करना नहीं था, बल्कि यह हमारी उम्मीदों, विश्वास और सपनों को भी एक दिशा देता था.

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