नौकरी और बच्चे में से एक क्यों चुनना पड़े? राघव चड्ढा ने उठाया पितृत्व अवकाश का मुद्दा, देश में क्या नियम

पिता को नौकरी और नवजात बच्चे के बीच चुनाव क्यों करना पड़े, इस सवाल के साथ राघव चड्ढा ने संसद में पितृत्व अवकाश को कानूनी अधिकार बनाने की मांग उठाई। जानिए भारत में पितृत्व अवकाश से जुड़े मौजूदा नियम क्या हैं.

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पितृत्व अवकाश पर बहस तेज
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  • आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने संसद में भारत में पितृत्व अवकाश को कानूनी अधिकार बनाने की मांग की है
  • उन्होंने कहा कि बच्चे की देखभाल केवल मां की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पिता की भूमिका भी समान रूप से महत्वपूर्ण है
  • सुप्रीम कोर्ट ने भी बच्चों की परवरिश में पिता की भूमिका को अहम बताते हुए साझा जिम्मेदारी पर जोर दिया है
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नई दिल्ली:

AAP के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने एक बार फिर संसद सत्र के दौरान एक अहम सामाजिक मुद्दा उठाते हुए भारत में पितृत्व अवकाश को कानूनी अधिकार बनाने की मांग की है. उन्होंने कहा कि बच्चे के जन्म के बाद देखभाल की जिम्मेदारी महज मां तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि पिता की भूमिका भी उतनी ही अहम है. राघव चड्ढा ने कहा कि जब बच्चे का जन्म होता है तो दोनों माता‑पिता को बधाई दी जाती है, लेकिन देखभाल की जिम्मेदारी अक्सर मां पर आ जाती है. उन्होंने कहा कि कई बार पिता को अपने परिवार का साथ देने और अपनी नौकरी बचाने के बीच चुनाव करना पड़ता है.

पिता को नौकरी और परिवार के बीच चुनाव न करना पड़े

राघव चड्ढा के मुताबिक, एक पिता को अपने नवजात बच्चे की देखभाल और नौकरी के बीच चयन करने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए, और एक मां को भी प्रसव और रिकवरी के दौरान अपने साथी के बिना यह दौर नहीं गुजारना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि प्रसव के बाद महिला के लिए पति की मौजूदगी बेहद जरूरी होती है, चाहे वह भावनात्मक सहारा हो या जिम्मेदारियों को साझा करना. चड्ढा ने जोर देकर कहा कि बच्चे की देखभाल दोनों माता‑पिता की जिम्मेदारी है और यह बात देश के कानूनों में भी साफ दिखाई देनी चाहिए. इससे पहले भी राघव चड्ढा संसद में कई जनहित और उपभोक्ताओं से जुड़े मुद्दे उठा चुके हैं.

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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से मुद्दे को मिला बल

इनमें ऑनलाइन डिलीवरी की समयसीमा, एयरलाइंस द्वारा अतिरिक्त सामान पर लिए जाने वाले शुल्क और पैकेज्ड जूस के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर जैसे विषय शामिल हैं. राघव चड्ढा ने यह मुद्दा ऐसे समय में उठाया है, जब सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल ही में इसी तरह की टिप्पणी की है. जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि जहां मां की भूमिका महत्वपूर्ण है, वहीं पिता की भूमिका भी उतनी ही अहम है और उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अदालत ने कहा कि बच्चे की परवरिश एक साझा जिम्मेदारी है और पिता को भी नवजात शिशु के साथ पूरा अवसर मिलना चाहिए.

निजी क्षेत्र में पितृत्व अवकाश का कानूनी अभाव

फिलहाल भारत में निजी क्षेत्र के लिए पितृत्व अवकाश को अनिवार्य करने वाला कोई विशेष कानून नहीं है, जहां मातृत्व अवकाश Maternity Benefit Act, 1961 के तहत नियंत्रित होता है, वहीं पितृत्व अवकाश अभी भी श्रम कानूनों के दायरे से बाहर है. हालांकि, सरकारी कर्मचारियों के लिए Central Civil Services (Leave) Rules, 1972 के तहत पितृत्व अवकाश का प्रावधान है. इसके तहत पुरुष कर्मचारियों को 15 दिन का वेतन सहित अवकाश मिलता है, जिसे बच्चे के जन्म के छह महीने के भीतर लिया जा सकता है और यह सुविधा अधिकतम दो जीवित बच्चों तक सीमित है. यह मुद्दा इससे पहले भी संसद में उठ चुका है. साल 2017 में कांग्रेस के दिवंगत सांसद राजीव सातव ने ‘पितृत्व लाभ विधेयक' के जरिए सभी क्षेत्रों के लिए एक समान ढांचा बनाने का प्रस्ताव रखा था.

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वैश्विक मॉडल बनाम भारत की मौजूदा व्यवस्था

इस विधेयक में 15 दिन से लेकर तीन महीने तक के अवकाश का प्रावधान था, लेकिन यह कानून नहीं बन सका. वर्तमान में निजी क्षेत्र में पितृत्व अवकाश पूरी तरह कंपनियों की नीतियों पर निर्भर करता है और इसे कानूनी अधिकार के तौर पर मान्यता नहीं मिली है. वैश्विक स्तर पर कई देशों ने इस दिशा में ठोस कदम उठाए हैं. स्वीडन, नॉर्वे, डेनमार्क, आइसलैंड और पुर्तगाल जैसे देशों में मजबूत पैरेंटल लीव नीतियां लागू हैं. स्वीडन ने 1974 में ही 480 दिनों का पेड लीव लागू किया था, जिसे माता‑पिता के बीच बांटा जाता है. फिनलैंड में दोनों माता‑पिता को 164 दिन का अवकाश मिलता है और नॉर्वे में पिता के लिए विशेष पितृत्व अवकाश का प्रावधान है. 

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चड्ढा के इस बयान के बाद भारत में पितृत्व अवकाश को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है और यह सवाल उठ रहा है कि क्या भारत को भी वैश्विक मानकों के अनुरूप अधिक समावेशी और समान पैरेंटल लीव नीति अपनानी चाहिए.

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