- केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में व्यभिचार को अपराध से बाहर करने के फैसलों की संवैधानिक नैतिकता पर आपत्ति जताई
- सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने संवैधानिक नैतिकता की अवधारणा को भीड़ की नैतिकता और बहुसंख्यकवाद से जोड़ा
- CJI सूर्यकांत ने विदेशी लेखकों के विचारों पर अधिक भरोसे को उचित नहीं माना और उनके संदर्भ पर सवाल उठाए
व्यभिचार (Adultery) को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है. केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि व्यभिचार और सहमति से समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने के दो अहम फैसले 'संवैधानिक नैतिकता' के व्यक्तिपरक इस्तेमाल पर आधारित हैं और इन्हें 'अच्छा कानून नहीं' घोषित किया जाना चाहिए. प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली नौ-सदस्यीय संविधान पीठ द्वारा केरल के शबरिमला मंदिर समेत विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और कई धर्मों की ओर से अपनाई जाने वाली धार्मिक आजादी के दायरे और संभावनाओं से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान यह बात कही गई.
अंतरराष्ट्रीय निर्णयों पर अंधाधुंध भरोसा करना उचित नहीं
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ द्वारा व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाले ऐतिहासिक फैसले पर बुधवार को सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान विवाद खड़ा हो गया. केंद्र सरकार ने अमेरिकी स्कॉलर जेफरी ए. सेगल और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की प्रोफेसर निवेदिता मेनन के उद्धरणों पर आपत्ति जताई. मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ द्वारा व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाले अपने फैसले में शामिल विदेशी लेखों और निर्णयों का हवाला देते हुए केंद्र ने कहा, "अंतरराष्ट्रीय निर्णयों पर अंधाधुंध भरोसा करना उचित नहीं है."
...तो बीआर अंबेडकर को यकीन नहीं होता!
केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने व्यभिचार और समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाले सुप्रीम कोर्ट के दो ऐतिहासिक फैसलों में अपनाई गई 'संवैधानिक नैतिकता' की अवधारणा की आलोचना की. मेहता ने कहा कि अगर इन दोनों फैसलों (नवतेज सिंह जौहर और जोसेफ शाइन) को बीआर अंबेडकर या कन्हैया लाल मुंशी या अलादी कृष्णन द्वारा पढ़ा जाए, तो उन्हें यकीन नहीं होगा. वे आश्चर्यचकित होंगे, स्तब्ध होंगे या वे कहेंगे कि वे यही चाहते थे! उन्होंने आगे कहा कि उनका मानना है कि वे ऐसा नहीं चाहेंगे.
मेहता ने नवतेज सिंह जोहर बनाम भारत संघ मामले में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाले फैसले की आलोचना करते हुए तर्क दिया कि इसने नैतिकता शब्द को भीड़ की नैतिकता या बहुसंख्यकवाद के रूप में 'बदनाम' कर दिया है. उन्होंने कहा, "यह तर्क नहीं दिया जा सकता कि हमारे जैसे लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश में भीड़ या बहुमत की जीत होगी. ऐसा हो ही नहीं सकता, न केवल इसलिए कि 2014 में गढ़ी गई संवैधानिक नैतिकता की अवधारणा इसे रोकती है, बल्कि इसलिए भी कि संविधान और उसके प्रावधान इसे रोकते हैं."
"ये सेगल कौन हैं?"
जब मेहता ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ द्वारा लिखे गए ओपिनियन को खुली अदालत में पढ़ा, तो भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पूछा, "ये सेगल कौन हैं? इनका उल्लेख तो लगभग अंबेडकर की तरह किया गया है?" हालांकि, मुख्य न्यायाधीश कांत ने टिप्पणी की कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ के ओपिनियन में शामिल बातें कुछ प्रोफेसरों और लेखकों के विचार हैं, और इस मामले में व्यभिचार को निरस्त करने का मुद्दा विचाराधीन नहीं है. मुख्य न्यायाधीश कांत ने कहा, "ये कुछ प्रोफेसरों, कुछ लेखकों, कुछ रचनाकारों के व्यक्तिपरक विचार हैं, चाहे वे कोई भी हों, हम नहीं जानते. हमें उस लेखक की प्रतिष्ठा के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं है, जिनके विचारों का अनुसरण किया गया है. लेकिन, अंततः, व्यभिचार पर दिया गया निर्णय स्वयं यहां प्रश्नाधीन नहीं है."
इसके बाद मेहता ने स्पष्ट किया कि वह व्यभिचार को अपराध घोषित करने वाले कानून को रद्द करने को चुनौती नहीं दे रहे थे, बल्कि वह फैसले में संवैधानिक नैतिकता और महिलाओं की गरिमा के बारे में की गई टिप्पणियों में एक समस्या की ओर इशारा कर रहे थे, जो 2018 के सबरीमाला फैसले में लिए गए विचारों का आधार बनीं, जिसने मासिक धर्म वाली महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी.
व्यभिचार कानून को रद्द करने वाला फैसला लैंगिक भेदभाव पर आधारित था
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने मेहता से कहा कि संवैधानिक नैतिकता संवैधानिक शासन के दायरे में आती है. उन्होंने कहा, "हो सकता है कि यह आपको पसंद न आए, लेकिन यह हमारा विषय नहीं है." न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची ने भी मेहता से कहा कि मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ की सहमति वाली राय में जिन उदाहरणों का हवाला दिया गया है, वे केवल पीठ के एक न्यायाधीश का दृष्टिकोण थे. उन्होंने आगे कहा कि व्यभिचार कानून को रद्द करने वाला फैसला लैंगिक भेदभाव पर आधारित था.
मेहता ने कहा कि उनका कहने का मतलब जोसेफ शाइन फैसले के अनुच्छेद 195 से है, जहां जेएनयू की प्रोफेसर निवेदिता मेनन का उदाहरण दिया गया है. मेहता ने कहा, "मैं विद्वान प्रोफेसर को परेशान नहीं करना चाहता. वह कुछ विचारों के लिए जानी जाती हैं, जिनमें यह भी शामिल है कि भारत कुछ देशों पर अवैध रूप से कब्जा कर रहा है. मैं उस पर चर्चा नहीं करूंगा. लेकिन अब, निष्ठा पर उनका विचार सुप्रीम कोर्ट के फैसले में शामिल है. यह रिकॉर्ड का हिस्सा है." उन्होंने इसे हटाने की मांग की.
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मुख्य न्यायाधीश कांत ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में पूछा कि अगर इतने सारे विदेशी लेखकों का हवाला दिया जा सकता है, तो कुछ भारतीय प्रोफेसरों का हवाला क्यों नहीं दिया जा सकता? हालांकि, मेहता ने ज़ोर देकर कहा कि भारतीय निर्णयों में विदेशी लेखकों का हवाला देना उचित नहीं है. मौजूदा नौ न्यायाधीशों की पीठ को अधिक प्रतिनिधि बताते हुए उन्होंने कहा, "आपमें से कोई भी हार्वर्ड या येल से नहीं है. यह उन लोगों को दर्शाता है जो निचले तबके से ऊपर उठे हैं और सड़कों पर पले-बढ़े हैं. इसलिए हम जानते हैं कि सामाजिक नैतिकता क्या होती है."
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