सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर की मांग करने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया. यह याचिका बीजेपी नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने दाखिल की है. याचिकाकर्ता की दलील है कि जिस परिवार के एक व्यक्ति को कोई सरकारी नौकरी या संवैधानिक पद मिल जाता है, उसे आरक्षण के दायरे से बाहर किया जाए. उनकी दलील है कि इस वजह से उन्हें भी आरक्षण का लाभ मिल पाएगा, जो अब तक आरक्षण के दायरे से बाहर हैं. आइए जानते हैं कि क्रीम लेयर क्या है जिसकी मांग याचिकाकर्ता ने की है.
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने बीते साल अगस्त में कहा था कि सरकार एससी-एसटी आरक्षण के भीतर अलग से वर्गीकरण कर सकती है. इस फैसले में यह सिफारिश की गई थी कि अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण में क्रीमी लेयर का प्रावधान होना चाहिए.लेकिन अदालत ने कहा था कि यह अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) वर्ग पर लागू क्रीमी लेयर के प्रावधान से अलग होना चाहिए. दरअसल यहां 'क्रीमी लेयर' से आशय उस वर्ग से है जो अपने वर्ग के अन्य लोगों से आर्थिक और सामाजिक रूप से आगे हैं. अभी क्रीमी लेयर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और आर्थिक रूप से पिछड़े (ईडब्लूएस) वर्गों के आरक्षण में यह व्यवस्था लागू है. लेकिन एससी-एसटी आरक्षण में इसे लागू नहीं किया गया है. इसकी मांग कुछ लोग बहुत पहले से कर रहे हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी फैसले में क्या कहा था
कांग्रेस से विद्रोह कर निकले वीपी सिंह के नेतृत्व में दिसंबर 1989 में जनमोर्चा की सरकार केंद्र में बनी थी. इस सरकार ने सात अगस्त 1990 को मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की थी. ओबीसी आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार के मामले में वैध ठहराया था. इसी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी के सामाजिक आर्थिक तौर पर मजबूत तबकों को आरक्षण देने से इनकार करते हुए क्रीमी लेयर का सिद्धांत लेकर आई थी. अदालत ने क्रीमी लेयर के मापदंड तय करने के लिए एक विशेषज्ञ कमेटी का गठन किया था. इसकी अध्यक्षता रिटायर जस्टिस आरएन प्रसाद ने की थी.
इस कमेटी के सुझाव पर कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने आठ सितंबर 1993 को ओबीसी के क्रीमी लेयर के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे. ये निर्देश आय, स्थिति और रैंक के आधार पर सूचीबद्ध किए गए हैं. इसमें आने वाले ओबीसी में शामिल जातियों के सदस्यों के बच्चों को आरक्षण का लाभ नहीं देने की बात की गई है. हालांकि 'क्रीमी लेयर' शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल सत्तानाथन आयोग ने किया था. तमिलनाडु की सरकार ने 1969 में सत्तानाथन आयोग का गठन किया था. यह पिछड़े वर्गों के लिए बना था. इसने 1970 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी. इसी रिपोर्ट में 'क्रीमी लेयर' की अवधारणा बताई गई थी.
ओबीसी आरक्षण का क्रीमी लेयर कितना है
ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर को सबसे पहले 1993 में एक लाख रुपये की वार्षिक आय सीमा तय की गई थी. केंद्र सरकार ने 2004 में इसे बढ़ाकर ढाई लाख रुपये सालाना कर दिया था.सरकार ने 2008 में इसे ढाई लाख रुपये सालाना से बढ़ाकर साढ़े चार लाख रुपये सालाना कर दिया था. सरकार ने 2013 में इसे बढ़ाकर छह लाख रुपये और 2017 में बढ़ाकर आठ लाख रुपये सालाना कर दिया था. इसके बाद से सरकार ने इसे नहीं बढ़ाया है, हालांकि संसदीय समितियों ने बढ़ती महंगाई को देखते हुए इसे बढ़ाने की सिफारिश कई बार की है. लेकिन सरकार ने इसे अब तक नहीं बढ़ाया है.
आय की यह सीमा केवल उन्हीं लोगों पर लागू होती है, जो सरकारी सेवा में नहीं हैं. वहीं सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के मामले में क्रीमी लेयर के लिए उनकी रैंक को आधार बनाया गया है, उनकी आर्थिक हैसियत को नहीं.इसके तहत माता-पिता में से किसी एक के ग्रुप ए का सरकारी अधिकारी होने, माता-पिता दोनों के ग्रुप-बी का सरकारी अधिकारी होने, माता या पिता अगर 40 साल की आयु से पहले ग्रुप में प्रमोट हुए हों या माता या पिता सेना में कर्नल या उससे बड़ी रैंक पर कार्यरत हों तो ओबीसी उम्मीदवार को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है. वायुसेना और नौसेना के मामले में समान रैंक देखी जाती है. केंद्र सरकार ने 2022 में संसद में जानकारी दी थी कि 2015 से 2019 के बीच भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के लिए चुने गए 63 लोगों को इस आधार पर सेवा में भर्ती नहीं किया गया, क्योंकि वो क्रीमी लेयर में आ रहे थे.
ईडब्लूएस के लिए क्रीमी लेयर कितना है
नरेंद्र मोदी सरकार ने 103वें संविधान संशोधन के जरिए 2019 में आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को भी आरक्षण देने का फैसला किया. इसके लिए पिछड़ेपन का आर्थिक आधार आठ लाख रुपये सालाना तय की गई है. इसका मतलब यह हुआ कि आठ लाख सालाना से अधिक की आय वालों को शिक्षा या सरकारी नौकरी में ईडब्लूएस आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा. हालांकि ओबीसी और ईडब्लूएस आरक्षण के लिए क्रीमी लेयर की सीमा आठ लाख रुपये तो रखी गई है. लेकिन दोनों की गणना का तरीका अलग-अलग है. इसका निर्धारण सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की ओर से गठित विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर किया गया था. इस समिति ने अपनी रिपोर्ट दिसंबर 2021 में सौंपी थी. सुप्रीम कोर्ट ने भी इस गणना को भेदभाव पूर्ण बताया था. ईडब्लूएस आरक्षण के क्रीमी लेयर में आर्थिक आय के साथ-साथ आवेदक के परिवार को जमीन को भी शामिल किया जाता है. पांच एकड़ से अधिक कृषि योग्य जमीन होने पर आवेदक को ईडब्लूएस आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है. इसके अलावा आय की गणना में आवेदक की वेतन, कृषि, व्यवसाय आदि से होने वाली आय को जोड़ा जाता है.
एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर?
पिछले साल अगस्त में कहा था कि सरकार एससी-एसटी आरक्षण के भीतर अलग से वर्गीकरण पर फैसला सुनाने वाले सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ में नौ जज शामिल थे. इस पीठ में शामिल थे तत्कालीन सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बेला त्रिवेदी, जस्टिस पंकज मित्तल, जस्टिस मनोज मिश्र और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा. इनमें से छह जजों ने एससी-एसटी आरक्षण में आरक्षण के भीतर आरक्षण के पक्ष में और एक जज ने विपक्ष में फैसला सुनाया था.इनमें से जस्टिस पंकज मित्तल ने क्रीमी लेयर के एक अलग मापदंड का जिक्र किया था. उन्होंने कहा था,''अगर एक छात्र सेंट स्टीफंस या किसी अन्य शहरी कॉलेज में पढ़ रहा है और एक छात्र ग्रामीण इलाके के किसी स्कूल या कॉलेज में पढ़ रहा है, तो इन दोनों को एकसमान नहीं माना जा सकता है. अगर एक पीढ़ी आरक्षण के जरिए आगे बढ़ी है तो अगली पीढ़ी को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए."
यह तो हुई ओबीसी और ईडब्लूएस आरक्षण में क्रीमी लेयर की बात, अब एससी-एसटी में क्रीमी लेयर को शामिल किया जाता है या नहीं और अगर शामिल किया जाता है तो उसका आधार क्या होगा, इसके लिए हमें सुप्रीम कोर्ट के फैसले या सरकार के किसी फैसले का इंतजार करना होगा.
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