- भवानीपुर में तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच कड़ा मुकाबला, इलाके राजनीतिक रूप से बंटे हुए
- स्थानीय लोग औद्योगीकरण और रोजगार की कमी को लेकर चिंतित हैं, जिससे युवाओं को अन्य शहरों में जाना पड़ता है
- तृणमूल कांग्रेस के समर्थक खुलकर बात नहीं कर रहे हैं, जबकि बीजेपी के समर्थक बदलाव की उम्मीद व्यक्त कर रहे हैं
कोलकाता पहुंचे 24 घंटे से कुछ ज्यादा ही हुए हैं.रविवार सुबह मैं भवानीपुर के लिए निकला. जी हां वही भवानीपुर जहां से ममता बनर्जी और शुभेन्दु अधिकारी के बीच कड़ा मुकाबला है.भवानीपुर में घूमते हुए पता चल जाएगा कि किस तरह से झंडों ने गलियों को बांट रखा है.यहां बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के बीच गलियां और इलाके बंटे हुए दिखेंगे.सुबह-सबह मैं जा पहुंचा भवानीपुर के एक ऐसे इलाके में जहां एक लाइन से चाय की दुकानें हैं.वहां बैठे लोगों से बातचीत करने के बाद लगा कि कोलकाता में इस बार मुकाबला कांटे का है.
ये कहना कि किसी एक पार्टी के लिए मुकाबला आसान होगा थोड़ी जल्दबाजी होगी.यहां जो लोग चाय पीते मुझे मिले वो सभी अभिजात्य वर्ग के थे. सभी रविवार की सुबह लंबी सैर के बाद चाय और नाश्ता करने आए थे और रविवार होने के नाते फुरसत में थे.ये लोग यहां के व्यापारी वर्ग के हैं जिन्हें मारवाड़ी कहा जाता है कुछ गुजराती भी मिले.सबसे दिलचस्प बात ये है कि यहां एक दुकान है जो सुबह फाफरा और जलेबी भी बनाता है जो गुजरातियों का पसंदीदा सुबह का नाश्ता भी है.'
सब ठीक फिर क्यों बंगाल के लोग खुश नहीं?
एक परिवार ऐसा भी मिला जो टिफिन में चाय के साथ खाने के लिए थेपला भी बना कर लाया था. उन्होंने मुझे भी थेपला चखाया.यहां इस बात पर चर्चा हो रही थी कि बंगाल में औद्योगीकरण कब होगा,उद्योग धंधे कब लगेंगे.लोगों का कहना है कि सब कुछ ठीक है, जीवन ठीक-ठाक चल रहा है मगर काम धंधा नहीं है.बच्चों को बेंगलुरु या हैदराबाद जाना पड़ रहा है.कोलकाता कब आईटी हब बनेगा.कहने का मतलब है कि लोगों को लग रहा है कि कहीं विपक्ष की सरकार होने का खामियाजा तो नहीं भुगत रहा है बंगाल! यहीं पर बीजेपी की डबल इंजन की थ्योरी काम कर जाती है.
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टीएमसी वोटर के अंदर SIR का डर
एक बात और इस बार देखने को मिली कि तृणमूल का वोटर खुल कर बात नहीं कर रहा है. वो अभी चुप है, जबकि बीजेपी के सर्मथक खुल कर बदलाव की बात कर रहे हैं.जब मैं तृणमूल कांग्रेस के कुछ सदस्यों से मिला तो उनका कहना है कि देखिए 15 साल के सरकार के बाद ऐंटी इन्कम्बन्सी यानि सत्ता विरोधी लहर तो जरूर होती है.आज के राजनीतिक हालात में विपक्ष की सरकार चलाना एक चुनौती है क्योंकि केंद्र से उतनी मदद नहीं मिलती जितना बीजेपी शासित राज्यों को मिलती है.फिर तृणमूल कांग्रेस में उस संस्था को लेकर भी कई सवाल लोगों ने उठाए जो पार्टी के लिए रणनीति बनाने का काम कर रही है.कुछ नेताओं ने उनके फीडबैक के सिस्टम पर सवाल उठाए .कुल मिलाकर तृणमूल खेमे में भी नर्वसनेस है और इसका सबसे बड़ा कारण है एसआईआर(SIR).
करो या मरो का मुकाबला
पार्टी को लगता है कि जिस तरह से नाम काटे गए हैं उससे उनको नुकसान होने वाला है खासकर उन सीटों पर जहां हार जीत का अंतर कम था.तृणमूल कांग्रेस को लगता है कि एसआईआर उनके खिलाफ गया जिसकी भरपाई मुश्किल हैं मगर नर्वसनेस से यह भी जाहिर होता है कि उन्हें अहसास है कि बीजेपी भी पूरी ताकत लगाने वाली है और यह चुनाव करो या मरो का हो कर रह गया है.इतने सब के बावजूद तृणमूल कांग्रेस को लगता है कि भले ही उनकी सीटें कम होंगी मगर वे सरकार बना लेंगे. कुल मिलाकर महज 24 घंटे के आकलन से लगता है कि इस बार पश्चिम बंगाल में लड़ाई है मगर अभी तो शुरुआत है. आगे बहुत कुछ होना बाकी है खासकर राजनीतिक तौर पर,कभी कभी एक मुद्दा चुनाव की बाजी पलट देता है और बंगाल में तृणमूल और बीजेपी को उसी मुद्दे का इंतजार है.
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