- गमछा अब सिर्फ कपड़ा नहीं, राजनीति, संस्कृति और पहचान की नई भाषा बन चुका है.
- नेताओं से अभिनेताओं तक, गमछा सत्ता और जनसंपर्क का शक्तिशाली प्रतीक बन गया है.
- खेतों से होते हुए राजनीतिक मंच और रुपहले पर्दे तक, गमछा भारत का सबसे सस्टेनेबल स्टाइल स्टेटमेंट बन गया है.
कभी किसानों, मजदूरों, आमजनों के पसीने पोंछने और धूप से बचाने वाला कपड़ा गमछा आज सत्ता, संस्कृति और स्टाइल का नया प्रतीक बना गया है. गमछा आज सिर्फ एक वस्त्र नहीं रहा, यह राजनीति की भाषा, पहचान की मुहर और भारतीयता का ब्रांड लोगो बन चुका है. राहुल गांधी से लेकर नरेंद्र मोदी तक, असम के गामोसा से लेकर केरल के थोरथ तक गमछा अब देश की सबसे तेज़ी से बदलती सांस्कृतिक कहानी लिख रहा है. आज गमछा जहां हमारी संस्कृति और परंपरा का विरासत है. आम आदमी की पहचान का यह प्रतीक आज राजनीति के गलियारे ही नहीं फिल्मों के रुपहले पर्दे पर भी अपनी छाप छोड़ चुका है. खेतों से होते हुए फैशन की दुनिया में इसने अपनी जगह बनाई. आज राजनेताओं, अभिनेताओं के कंधे पर सज कर इसने अपनी ग्लोबल पहचान बना ली है.
राहुल गांधी बनाम हिमंता बिस्वा सरमा
गणतंत्र दिवस की शाम देश की राजनीति में पारंपरिक वस्त्र गमछा अचानक एक तूफान बन गया. मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी ने गणतंत्र दिवस की संध्या को राष्ट्रपति भवन में आयोजित रात्रिभोज कार्यक्रम में असमिया गामोसा पहनने से इनकार किया, जिसे उन्होंने पूर्वोत्तर की संस्कृति के अपमान से जोड़ दिया. हालांकि कांग्रेस ने पलटवार किया कि यह राजनीति को संस्कृति के नाम पर भड़काने की कोशिश है और उन्होंने उसी कार्यक्रम में शिरकत कर रहे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की तस्वीर शेयर की. पर यहां चर्चा का विषय यह नहीं है कि राहुल गांधी ने गामोसा लिया था या नहीं बल्कि यह है कि आज गामोसा कहें या गमछा यह इतना ताकतवर प्रतीक बन चुका है कि उसके पहनने या न पहनने से राजनीतिक नैरेटिव बन रहे हैं साथ ही इसने गांव, देहातों से निकल कर फिल्मी परदों से होते हुए अपनी ग्लोबल पहचान बना ली है.
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राहुल गांधी खुद सीएए हो या भारत जोड़ो यात्रा कई जनसभाओं में कंधे पर गमछा डाले दिखे हैं. वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे कोरोना महामारी के दौरान और बाद में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर अपने कंधे पर धारण किया जो सीधे उस आम आदमी की छवि से जुड़ता है, जो खेतों में काम करता है, निर्माण स्थलों पर मजदूरी करता है, और गांव की गलियों में पसीने से भीगता है. राजनेताओं के समर्थकों के लिए गमछा आज जन-राजनीति का प्रतीक बन गया है तो आलोचकों की नजर में यह इमोशनल ब्रांडिंग का हथियार है.
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मोदी का गमछा- बिहार से योगा डे तक
गमछा की राजनीतिक ताकत को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बखूबी समझते हैं. बीते वर्ष बिहार चुनावों के दौरान मुजफ्फरपुर की रैली में मोदी का गमछा लहराना अचानक वायरल हुआ. यह संकेत था कि प्रधानमंत्री खुद को उस बिहार से जोड़ रहे हैं, जहां गमछा किसान और मजदूर की पहचान है. कोरोना काल में जब देश भय और अनिश्चितता में जी रहा था, तब पीएम मोदी ने कई सार्वजनिक कार्यक्रमों में असमिया गामोसा लपेट कर भारत की संस्कृति को राष्ट्रीय सम्मान का संदेश दिया. हर साल 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर गामोसा या पारंपरिक भारतीय वस्त्र पहनकर उन्होंने गमछे को घरेलू, गांव, कस्बे, छोटे शहरों के कपड़े से निकालकर राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक बना दिया. पीएम मोदी ने गमछा को लोक संस्कृति से सत्ता की भाषा में बदल दिया.
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देसी कपड़ा बना ऑन-स्क्रीन स्टाइल
गमछा सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहा- यह बॉलीवुड का देसी फैशन आइकन भी बन चुका है. हालांकि फिल्मी परदे पर दिलीप कुमार, राजकुमार, संजीव कुमार जैसे कलाकारों ने 1960, 1970 के दशक में कई फिल्मों में इस गमछे का इस्तेमाल बखूबी गांव, देहात की संस्कृति को दर्शाने के लिए किया.
फिल्म डॉन के खइके पान बनारस वाला गाना तो अमिताभ बच्चन को देखने जानने वालों को याद ही होगा. सलमान खान, शाहरुख खान, नवाजुद्दीन, अक्षय कुमार, अनिल कपूर, जैकी श्रॉफ सभी ने इसे फिल्मी पर्दे पर इसे अपने गले से लगाया.
बॉलीवुड कलाकारों ने संघर्षशील किरदारों में गमछे को लिपटा कर आम आदमी की छवि को मजबूत किया.
शाहरुख खान ने फिल्म जीरो के ट्रेलर लॉन्च इवेंट में एक खास देसी स्टाइल अपनाया था. तब उन्होंने बनारसी गमछे के पैटर्न वाली लाल शर्ट के साथ कमर में गमछा बांधा था. यह लुक उनके मेरठ के बउआ सिंह वाले किरदार को दर्शाता था, जो तब काफी चर्चा में रहा था.
वहीं सलमान खान का 2004 में मुझसे शादी करोगी के गाने जीने के हैं चार दिन में तौलिया डांस तो 22 साल बाद आज भी लोगों को याद है. हां वो गमछा नहीं था पर उन्होंने बंजरंगी भाईजान के गाने में या फिर बिग बॉस के मंच पर कई बार गमछा लपेटा.
सलमान खान ने जब गमछे को स्टाइल स्टेटमेंट की तरह इस्तेमाल किया तो यह देसी परिधान युवाओं के बीच फैशन बन गया. और जब ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर' की टीम कान्स फिल्म फेस्टिवल में गमछा पहनकर पहुंची, तो दुनिया ने देखा कि भारतीय देसी कपड़ा अब ग्लोबल रेड कार्पेट पर भी जगह बना चुका है.
परंपरा बनी फैशन क्रांति
केरल का तोरथ, बंगाल-बिहार और यूपी का गमछा, असम का गामोसा- ये सब एक ही सांस्कृतिक विरासत की अलग-अलग भाषाएं हैं. कभी यह सिर्फ स्नान के बाद शरीर पोंछने, सिर ढकने या धूप से बचने का साधन था, लेकिन अब यही कपड़ा बन चुका है फैशन और स्टाइल एक्सेसरीज.
अब यह पश्चिमी बाजार तक भी पहुंच रहा है. शायद यह दुनिया का सबसे सस्टेनेबल कपड़ा है- जिसे बिना बिजली के पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से बुना जाता है, जो सस्ता और टिकाऊ और बहुउपयोगी होता है.
साथ ही यह पारंपरिक कारीगरी और भारतीय हस्तशिल्प का प्रतीक भी है जो बड़ी संख्या में इस उद्योग पर निर्भर स्थानीय रोजगार का साधन है. गमछा बदला नहीं है बल्कि इसने ये दिखाया है यह पहले से ही परफेक्ट था.
क्या है गमछे का इतिहास
कपास से बनने वाला यह वस्त्र कभी हैंडलूम पर तैयार किया जाता था पर बढ़ती आबादी, बढ़ते डिमांड के बीच आज यह पावरलूम से बहुतायत में तैयार किया जाता है. इतिहासकार मानते हैं कि गमछा शब्द संस्कृत की गमछिका से निकला है यानी शरीर ढकने और पोंछने का कपड़ा.
इसके इस्तेमाल की शुरुआत का प्रमाण तो नहीं है पर मुगल काल में यह आम लोगों का दैनिक इस्तेमाल का वस्त्र रहा, वहीं ब्रिटिश शासन में खादी आंदोलन के दौरान यह आत्मनिर्भरता और स्वदेशी चेतना का प्रतीक बन गया. स्वतंत्रता सेनानियों की सभाओं में गमछा कंधे पर डालना सादगी और संघर्ष की पहचान था.
आज वही कपड़ा संसद के गलियारों, फैशन शो, फिल्मों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिखाई दे रहा है. यह भारत की विविधता को वैश्विक मंच पर सम्मान देने का संकेत है.
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असमिया गामोसा
जिस असमिया गामोसा के अपमान की बात हिमंत बिस्व सरमा ने की वो असम में सम्मान का प्रतीक है. इसे अतिथि के स्वागत और सम्मान में भेंट किया जाता है. वहां उत्सवों, आयोजनों के दौरान यह आमजनों के कंधे पर परंपरा के हिस्से के तौर पर देखा जा सकता है.
जब यह कपड़ा प्रधानमंत्री के कंधे तक पहुंचा, तो संदेश साफ था- स्थानीय संस्कृति अब राष्ट्रीय पहचान बन रही है.
गमछा गरीब का भी है, अमीर का भी है, किसान का भी है, नेता और अभिनेता का भी है.
यूपी, बिहार में गमछा; असम में गामोसा, तमिलनाडु में तुंड तो केरल में तोरथ के नाम से जाना जाने वाला गरीबों का गमछा आज भारत का सस्टेनेबल स्टाइल स्टेटमेंट बन चुका है.














