- ऑपरेशन सिंदूर युद्ध ने ड्रोन की मारक क्षमता और आधुनिक युद्धों में उनकी अहमियत को साबित किया है.
- ड्रोन अब सिर्फ निगरानी के लिए नहीं बल्कि हमले, हथियार पहुंचाने और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में भी उपयोग हो रहे हैं.
- भारत का सैन्य ड्रोन बाजार तेजी से बढ़ रहा है और आत्मनिर्भरता के तहत बड़े ड्रोन विकास की दिशा में काम जारी है.
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध ने दिखाया कि ड्रोन किस तरह तबाही मचा सकते हैं. इस युद्ध के साथ ही ड्रोन यह बता चुके हैं कि उनका दौर आ चुका है. सेना को भी यह बात समझ में आ गई है कि मार्डन वॉरफेयर में ड्रोन की भूमिका कितनी अहम है. हालांकि सेना पहले भी ड्रोन का इस्तेमाल सर्विलांस के लिए करती थी, लेकिन अब तो सेना की हर इन्फेंट्री में ड्रोन वार्रियर हैं. ये निगरानी के साथ अटैक कैपेबिलिटी के साथ सुसाइडल ड्रोन से लैस हैं.
सिर्फ भारत-पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि रूस-यूक्रेन और ईरान-अमेरिका की जंग में भी ड्रोन गेमचेंजर साबित हो रहे हैं. खबरें तो यहां तक हैं कि चीन ने मधुमक्खी के साइज का ड्रोन बना लिया है, जिसे न कोई रडार देख सकेगा, न इंसानी आंखें. ऐसे में ये बहुत जरूरी है कि दुनिया इस नए किस्म के वॉरफेयर को तेजी से अपनाए.
युद्ध की तस्वीर बदलने की क्षमता
टैंक-तोपों की तुलना में सस्ते हथियार
सबसे बड़ी बात यह है कि ये पारंपरिक हथियारों के मुकाबले काफी सस्ते हैं. कुछ हजार डॉलर के ड्रोन करोड़ों के टैंक और तोपों को तबाह कर रहे हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनिया को ड्रोन की असली ताकत दिखाई. इजरायल-ईरान संघर्ष में भी ड्रोन बड़े हथियार बनकर उभरे. इन युद्धों ने साबित कर दिया कि भविष्य का युद्ध ड्रोन आधारित होगा. आज कामीकाजे ड्रोन सबसे ज्यादा चर्चा में हैं, इन्हें लोइटरिंग म्यूनिशन भी कहा जाता है. ये घंटों तक हवा में मंडरा सकते हैं. फिर सही समय देखकर सीधे टारगेट पर हमला कर सकते हैं. ऐसे ही फर्स्ट पर्सन व्यू (FPV) ड्रोन को काफी घातक माना जा रहा है, जिसका इस्तेमाल आजकल जंग में बखूबी हो रहा हैं. FPV ड्रोन बिलकुल किसी वीडियो गेम की तरह हैं. ऑपरेटर एक VR सेट पहनकर इसे किसी गाड़ी की तरह कंट्रोल कर सकता है.
खुद फैसला ले सकेंगे AI ड्रोन
वहीं स्वार्म ड्रोन तकनीक ने खतरा और बढ़ा दिया है. इसमें एक साथ दर्जनों ड्रोन हमला करते हैं. इनका मकसद दुश्मन की एयर डिफेंस प्रणाली को भ्रमित करना होता है. भविष्य में ड्रोन और खतरनाक बनने वाले हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ड्रोन तो खुद फैसले ले सकेंगे. ड्रोन हवा में दूसरे ड्रोन से लड़ेंगे. हाइपरसोनिक यूएवी कुछ ही मिनटों में दुश्मन के अंदर तक हमला कर सकेंगे. अब यह साइबर वॉरफेयर भी बड़ा खतरा बन चुका है.जीपीएस सिग्नल जाम करना, ड्रोन को हैक करना और कमांड सिस्टम पर कब्जा करना नई रणनीति का हिस्सा बन गया है.
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हर सैनिक को ड्रोन से रूबरू करा रही सेना
भारतीय सेना ने भी इस बदलाव को तेजी से अपनाया है. ऑपरेशन सिंदूर इसके लिए बड़ा टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है. 2025 के भारत-पाक संघर्ष में पहली बार दो परमाणु शक्ति वाले देशों के बीच बड़े स्तर पर ड्रोन युद्ध देखने को मिला. इसके बाद भारतीय सेना ने ड्रोन युद्ध को लेकर तेजी से काम शुरू किया. अब सेना की इन्फेंट्री में अश्नि ड्रोन प्लाटून बनाई गई हैं. इन्हें आर्टिलरी और आर्म्ड यूनिट्स तक बढ़ाया जा रहा है. सेना ने इस ड्रोन कॉन्सेप्ट को ईगल इन द आर्म का नाम दिया है. इसका मकसद हर सैनिक को ड्रोन से रूबरू कराना हैं, क्योंकि जिस तरह से पाकिस्तान ने भारत पर ड्रोन छोड़े, उसके लिए ये जरूरी है कि हर जवान को कम से कम एक बेसिक लेवल की जानकारी हो.
सबसे खास बात यह है कि सेना अब खुद अपने वर्कशॉप में ड्रोन बना रही है. इसका मकसद सैनिकों को तकनीक की गहरी समझ देना है. सेना तरह तरह के ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन पर फोकस कर रही हैं. साथ ही सेना साइबर सुरक्षा पर भी जोर दे रही है. इसके लिए एथिकल हैकर्स की मदद ली जा रही है. ड्रोन के कम्युनिकेशन और एंटी-स्पूफिंग सिस्टम की लगातार टेस्टिंग हो रही है.
भारत में तेजी से बढ़ता ड्रोन का सैन्य बाजार
भारत को देखें तो यहां का सैन्य ड्रोन बाजार तेजी से बढ़ रहा है. बीते कुछ सालों में कई ऐसे स्टार्टअप्स और कम्पनियां सामने आई हैं जो बहुत ही उम्दा किस्म के ड्रोन बना रही हैं. 2025 में इस बाजार की कीमत करीब 600 मिलियन डॉलर थी, लेकिन जिस रफ्तार से इसमें इजाफा हो रहा है, ये मार्केट 2034 तक 1.9 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है. आत्मनिर्भर भारत अभियान ने भी इस मार्केट को खड़ा करने में बड़ी भूमिका निभाई है. हालांकि भारत अब छोटे ड्रोन बनाने में महारत हासिल कर चुका हैं, लेकिन बड़े ड्रोन के क्षेत्र में अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है. सेनाएं अभी इजरायल में बने हेरोप और हार्पी जैसे ड्रोन पर काफी हद तक निर्भर है, लेकिन सरकार और सेना इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही हैं. अब साफ है कि ड्रोन का दौर भविष्य नहीं, बल्कि वर्तमान बन चुका है.














