तमिलनाडु में एक भी ब्राह्मण को टिकट नहीं, आखिर BJP, कांग्रेस, AIADMK और DMK के लिए क्यों 'अछूत' हो गए ब्राह्मण

तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव के लिए सभी राजनीतिक दलों ने अपने उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर दिया है. इस बार एक बात साफ तौर पर नजर आ रही है, वह यह है कि मुख्यधारा की किसी भी राजनीतिक दल ने ब्राह्मणों को टिकट देने से परहेज किया है. जिनकी राज्य की आबादी में हिस्सा करीब तीन फीसदी का है. क्या है इसकी वजह.

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नई दिल्ली:

Tamil Nadu Assembly Elections 2026: तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए आज नामांकन पत्रों की जांच हो रही है. नामांकन वापस लेने की अंतिम तिथि 9 अप्रैल है. दक्षिण भारत के इस राज्य में 23 अप्रैल को होने वाले चुनाव की एक खास बात यह है कि इस बार मुख्य धारा की किसी भी पार्टी ने कोई ब्राह्मण उम्मीदवार नहीं उतारा है. अभिनेता से नेता बने विजय की (तमिलागा वेट्री कड़गम) टीवीके और तमिल स्वाभिमान की राजनीति करने वाली एनटीके पार्टी अपवाद हैं. टीवीके ने दो और एनटीके ने छह ब्राह्मणों को टिकट दिया है. इनके अलावा हर पार्टी ने ब्राह्मण उम्मीदवार उतारने से परहेज किया है. यहां तक कि उत्तर भारत में ब्राह्मण-बनिया की राजनीति करने वाली बीजेपी ने भी कोई ब्राह्मण उम्मीदवार चुनाव मैदान में नहीं उतारा है. बीजेपी की सहयोगी एआईएडीएमके ने भी ब्राह्मण उम्मीदवार उतारने से परहेज किया है. 

तमिलनाडु में ब्राह्मण राजनीति

तमिलनाडु में ब्राह्मण आबादी करीब तीन फीसदी मानी जाती है. लेकिन ऐसा पहली बार नहीं है कि राज्य की राजनीति में ब्राह्मण हाशिए पर ढकेले गए हैं. इससे पहले 1950 के दशक में जब कांग्रेस का नेतृत्व ब्राह्मणों से गैर-ब्राह्मणों के हाथों में चला गया तो 1954 में के कामराज के नेतृत्व में मद्रास पहला ऐसा राज्य था, जिसके मंत्रिमंडल में कोई ब्राह्मण नहीं था. इसके बाद 1967 में हुए तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद सीएन अन्नादुरई के नेतृत्व में डीएमके की सरकार बनी.

इस चुनाव ने तमिलनाडु के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया. इस चुनाव में ब्राह्मण विधायकों की संख्या में भारी गिरावट आई और वो दो अंकों से घटकर एक अंक में आ गए. इसके बाद हुए चुनावों में भी ब्राह्मणों का प्रतिनिधित्व लगातार घटता रहा. साल 1980 के दशक विधानसभा में ब्राह्मण विधायकों की संख्या एक अंक में ही रही.राज्य में द्रविड़ राजनीति करने वाले दलों के मजबूत होते ही उम्मीदवारों के चयन में गैर-ब्राह्मण जातियों को वरीयता मिलने लगी.

इससे तमिलनाडु की राजनीति में ब्राह्मण दुर्लभ होते चले गए.आज हालत यह हो गई है कि तमिलनाडु में सत्ता और विपक्ष दोनों ही गैर ब्राह्मण की राजनीति कर रहे हैं.

इस बार के विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने एआईएडीएमके समेत कुछ छोटे दलों से समझौता किया है. इस समझौते के मुताबिक बीजेपी 27, पट्टाली मक्कल काची (पीएमके) 18, अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम (एएमएमके) 11, तमिल मनीला कांग्रेस (टीएमसी) पांच, इंधिया जननायक काची (आईजेके) दो, तमिलगा मक्कल मुनेत्र कड़गम (टीएमएमके) एक और पुरैची भारतम एक सीट पर चुनाव लड़ रही है.

बाकी की 169 सीटों पर एआईएडीएमके अपने उम्मीदवार उतारे हैं. राज्य की 27 सीटों पर चुनाव लड़ रही बीजेपी ने भी कोई ब्राह्मण उम्मीदवार उतारने से परहेज किया है. जबकि बीजेपी के पास एस गुरुमुर्ती और नारायणन तिरुपति जैसे ब्राह्मण चेहरे भी थे. लेकिन इनमें  से कोई भी चुनाव नहीं लड़ रहा है. इससे यह धारणा बन रही है कि ब्राह्मण बीजेपी में संगठन को नेतृत्व देता है और वह चुनावी लड़ाई दूसरों पर छोड़ देता है.

एआईएडीएमके में ब्राह्मण

वहीं एमजी रामचंद्रन और जयललिता के दौर में ब्राह्मणों को जगह देने वाली बीजेपी की सहयोगी एआईएडीएमके ने भी कोई ब्राह्मण उम्मीदवार उतारने से परहेज किया है. पिछले 35 सालों में ऐसा पहली बार है जब एआईएडीएमके ने कोई ब्राह्मण उम्मीदवार नहीं उतारा है. इससे पहले 2021 के चुनाव में एआईएडीएमके ने राज्य के पूर्व पुलिस प्रमुख आर नटराज को टिकट दिया था. यह हाल तब है जब तमिलनाडु में इस गठबंधन को तमिलनाडु ब्राह्मण एसोसिएशन ने अपना समर्थन दिया है.

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एनडीए जैसा ही हाल राज्य में सत्तारूढ़ धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन (एसपीए) का भी है. इस गठबंधन में शामिल द्रमुक और कांग्रेस ने भी किसी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया है. ब्राह्मणों को टिकट देने में थोड़ी उदारता अभिनेता विजय की टीवीके और तमिल स्वाभिमान की राजनीति करने वाली एनटीके पार्टी ने दिखाई है. टीवीके ने दो और एनटीके पार्टी ने छह ब्राह्मण उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं. टीवीके ने माइलापुर से एस सुब्रमणियन और कोयंबटूर दक्षिण से वी राघवन को उम्मीदवार बनाया है.ये दोनों ऐसी सीटें हैं, जहां ब्राह्मण आबादी ठीक-ठाक मानी जाती है. 

द्रविड़ राजनीति में सत्ता के नए केंद्र

तमिलनाडु में द्रविड़ों की राजनीति करने वाली पार्टियों में भी जाति का ही दबदबा है. एआईएडीएमके में जयललिता के शासनकाल में थेवर समुदाय का दबदबा रहा. इसका एक कारण यह था कि उनकी करीबी सहयोगी वीके शशिकला थेवर समुदाय की थीं. लेकिन जयललिता के निधन के बाद थेवर के साथ-साथ गौंडर जाति भी मजबूत होती गई.

यह राज्य की एक राजनीतिक और आर्थिक रूप से प्रभावशाली पिछड़ी जाति है. एआईएडीएमके को 2016 में मिली जीत में गौंडर और थेवर का दबदबा दिखाई दिया. मंत्रिमंडल में इन दोनों जातियों का प्रभाव दिखा. गौंडर जाति के करीब आठ और थेवर जाति के सात मंत्री बनाए गए थे. इस चुनाव में अपनी सत्ता बचाने के लिए मैदान में उतरी डीएमके में जाति का बोलबाला है. डीएमके में मुदलियार जाति का प्रभाव है. डीएमके के संस्थापक सीएन अन्नादुरई इसी जाति के थे. 

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तमिलनाडु में राजनीति ने जाति का उन्मूलन नहीं किया है, बल्कि केवल जातिगत आवरण को बदल कर एक जाति की जगह दूसरी जाति को बैठा दिया है. ऐसे में सवाल यह है कि तमिलनाडु की राजनीति में अभी और आने वाले सालों में ब्राह्मणों का प्रतिनिधित्व कैसा रहेगा इसके लिए हमें चार मई तक का इंतजार करना होगा, जब इस विधानसभा चुनाव के नतीजे आएंगे. 

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