कानून के शासन का गला घोंटा जा रहा हो तो बुलडोजर का इस्तेमाल जरूरी: सुप्रीम कोर्ट

जस्टिस बागची ने कहा कि देश में बड़ी संख्या में अवैध निर्माण हैं और उनके ध्वस्तीकरण को लेकर कई याचिकाएं अदालतों में लंबित हैं. जब कानून के शासन को अधिकारियों और अवैध अतिक्रमणकारियों के बीच कथित मिलीभगत और भ्रष्टाचार से कमजोर किया जाता है, तब अवैध निर्माण हटाने के लिए बुलडोजर का इस्तेमाल जरूरी हो सकता है. 

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बुलडोजर जस्टिस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई.
नई दिल्ली:

बुलडोजर जस्टिस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2024 के फैसले की अवमानना ​​का आरोप लगाने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करने से इनकार किया. CJI की बेंच ने याचिकाकर्ताओं को संबंधित हाई कोर्ट जाने का निर्देश दिया. SC ने दोहराया कि बुलडोजर का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन कानून की उचित प्रक्रिया का पालन करना होगा. लोगों को किसी खास श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए, मनमाने ढंग से किसी को नहीं चुना जा सकता. अदालत ने आगे कहा जब अधिकारियों और अवैध कब्ज़ा करने वालों के बीच मिलीभगत से कानून के शासन का गला घोंटा जा रहा हो, तो बुलडोजर का इस्तेमाल जरूरी है. अदालत ने कहा कि 2024 का फैसला इसलिए आया था क्योंकि आरोपी लोगों को मनमाने ढंग से चुना जा रहा था और उनके घर गिराए जा रहे थे. अवैध निर्माण बड़े पैमाने पर हो रहे हैं और उनमें से कुछ को गिराने का फैसला लिया जाता है.

विवादों पर फैसला अब संबंधित हाई कोर्ट करेंगे

सुप्रीम कोर्ट ने सारे अवमानना मामलों को हाईकोर्ट भेजा, जिन लोगों को बुलडोजर से अंतरिम संरक्षण बरकरार रहेगा. कोर्ट ने कहा कि  मामलों में कई ऐसे तथ्यात्मक प्रश्न हैं, जिनके समाधान के लिए सबूतों और विस्तृत सुनवाई की जरूरी होगी. इसलिए इन विवादों पर फैसला अब संबंधित हाईकोर्ट करेंगे. अदालत ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया है कि वह इन मामलों की सुनवाई संभव हो तो चार महीने के भीतर पूरी करने का प्रयास करें. 

इसका मतलब है कि बुलडोजर जस्टिस से जुड़े मामलों में हाईकोर्ट मामले के तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर स्वतंत्र रूप से फैसला लेगा. जिन मामलों में तोड़फोड़ के खिलाफ अंतरिम संरक्षण दिया गया है, वह जारी रहेगा. सुप्रीम कोर्ट में CJI सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच बुलडोजर जस्टिस मामले में दाखिल अवमानना याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी. 

दोषी साबित होने से पहले निर्दोष मानना न्याय की बुनियाद

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा अदालत का संबंधित फैसला इसलिए आया क्योंकि अदालत की अंतरात्मा इस मामले से झकझोर गई थी. किसी भी व्यक्ति को दोषी साबित होने से पहले निर्दोष मानने का सिद्धांत न्याय व्यवस्था की बुनियाद है. और यह देखना जरूरी है कि कानून का पालन किस हद तक किया जा रहा है.

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जस्टिस बागची ने कहा कि देश में बड़ी संख्या में अवैध निर्माण हैं और उनके ध्वस्तीकरण को लेकर कई याचिकाएं अदालतों में लंबित हैं. जब कानून के शासन को अधिकारियों और अवैध अतिक्रमणकारियों के बीच कथित मिलीभगत और भ्रष्टाचार से कमजोर किया जाता है, तब अवैध निर्माण हटाने के लिए बुलडोजर का इस्तेमाल जरूरी हो सकता है. 

हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून लागू करने के नाम पर किसी व्यक्ति को निशाना बनाना या उसकी पहचान के आधार पर कार्रवाई करना संविधान और न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है. जस्टिस बागची ने कहा कि किसी भी ध्वस्तीकरण कार्रवाई में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होना चाहिए कि क्या संबंधित व्यक्ति के पास वैध अनुमति थी और क्या पूरी कार्रवाई कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए की गई?

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उन्होंने जोर देकर कहा कि कानून का शासन तभी कायम रहेगा जब प्रशासन निष्पक्ष और कानूनी तरीके से कार्रवाई करेगा. पिछले साल बुलडोजर कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश जारी किए थे. जिसके तहत किसी भी इमारत को ध्वस्त करने से पहले संबंधित नगर निकायों और प्रशासन को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करने की बात थी. 

सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार, किसी भी कार्रवाई से पहले प्रभावित पक्ष को पर्याप्त अवसर और कानूनी सुरक्षा प्रदान करना अनिवार्य है.

बुलडोजर एक्शन के लिए सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश:

  • किसी भी भवन को गिराने से पहले मालिक या कब्जाधारी को कम से कम 15 दिन पहले लिखित कारण बताओ (शो-कॉज) नोटिस देना अनिवार्य होगा.
  • बिना नोटिस के ध्वस्तीकरण नहीं किया जा सकेगा. अंतिम निर्णय लेने से पहले प्रभावित व्यक्ति को स्थानीय नगर निकाय के समक्ष व्यक्तिगत रूप से अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाएगा. 
  • जारी किए गए नोटिस, संबंधित पक्ष के जवाब और अंतिम वैधानिक आदेश को नगर निकाय के समर्पित डिजिटल पोर्टल पर अपलोड करना होगा, ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रहे. 
  • यदि अंतिम ध्वस्तीकरण आदेश जारी भी हो जाता है, तब भी प्रशासन को प्रभावित व्यक्ति को कानूनी अपील करने या सुरक्षित रूप से परिसर खाली करने के लिए पर्याप्त समय देना होगा.
  • उपयुक्त मामलों में यह अवधि आठ सप्ताह तक हो सकती है या संबंधित कानून में निर्धारित समय के अनुसार होगी. 
  • इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ध्वस्तीकरण की कार्रवाई कानून के अनुसार, निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से की जाए तथा किसी भी व्यक्ति के प्राकृतिक न्याय के अधिकारों का उल्लंघन न हो. 
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