- वी. मोहना भारतीय सेना में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन दिलाने वाली SC की दूसरी महिला जज बनने जा रही हैं
- उनका जन्म तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले के पोल्लाची में 13 भाई-बहनों वाले अनुशासित परिवार में हुआ था
- मां सिर्फ पांचवीं कक्षा तक पढ़ी थीं, लेकिन उन्होंने मोहना की कानूनी क्षमता को पहचानकर प्रोत्साहित किया
भारतीय सेना में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन दिलाने वाली सीनियर वकील वी. सुब्रमणि मोहना सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में बार से सीधे नियुक्त होने वाली दूसरी महिला जज बनने जा रही हैं. उनके जीवन की कहानी भी बहुत ही प्रेरणादायक है. सालों से सुप्रीम कोर्ट के कॉरिडार में वकील के तौर पर मोहना का हंसता-मुस्कराता चेहरा तो बहुत लोगों ने देखा, लेकिन उनके साहस, संघर्ष और शिक्षा की परिवर्तनकारी शक्ति की कहानी बहुत कम लोग जानते हैं
जस्टिस वी मोहना का 13 भाई-बहनों का परिवार
तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले के व्यापारिक नगर पोल्लाची में जन्मी वी. मोहना का बचपन ऐसे परिवार में बीता, जहां अनुशासन, परिश्रम और शिक्षा को जीवन के सबसे महत्वपूर्ण मूल्य माना जाता था. 13 भाई-बहनों में वह 11 वीं संतान थीं. एक बड़े परिवार का हिस्सा, जिसमें 9 बेटियां और चार बेटे थे.उनके पिता एस. वेंकिटा सुब्रमणि अय्यर अनुशासित और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति थे. भारतीय सेना में सेवा देने के बाद उन्होंने तमिलनाडु सरकार में वरिष्ठ कीट-विज्ञानी के रूप में काम किया.
5वीं तक पढ़ी-लिखी मां बनीं प्रेरणा
सेना से मिले अनुशासन और सेवा-भाव ने पूरे परिवार के जीवन को दिशा दी, जहां हर बच्चे से उत्कृष्टता और जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती रही. जहां पिता ने जीवन में अनुशासन की नींव रखी, वहीं उनकी माता कावेरी अम्माल ने अपनी बेटी की असाधारण प्रतिभा को पहचाना. खास बात ये है कि मां खुद सिर्फ पांचवी कक्षा तक पढ़ी थीं, लेकिन उन्होंने मोहना की वाद-विवाद, भाषण, निबंध लेखन और विचार-विमर्श में रुचि को देखा और समझा कि यह केवल शौक नहीं, बल्कि एक सफल वकील बनने की क्षमता का संकेत है.
मेहनत के बल पर हासिल किया मुकाम
जस्टिस मोहना से जुड़े सूत्रों ने NDTV को बताया कि मां ने उनको ऐसे रास्ते पर चलने को प्रेरित किया जिस पर उनके परिवार में पहले कभी कोई नहीं चला था. वह था कानूनी पेशे का रास्ता. मोहना की मेहनत ही थी कि उनकी शैक्षणिक प्रतिभा ने जल्द ही उन्हें पहचान दिलाई. दसवीं से लेकर स्नातक तक उन्हें राष्ट्रीय मेधा छात्रवृत्ति प्राप्त हुई. 1983 में भारत में पहली बार पांच साल का एकीकृत BA. LLB पाठ्यक्रम शुरू किया गया. मोहना उन अग्रणी छात्रों में शामिल थीं, जिन्होंने कोयंबटूर लॉ कॉलेज (बाद में गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, कोयंबटूर) के पहले बैच में दाखिला लिया . उस समय यह संस्थान अपने शुरुआती दौर में था. क्लास किराए की इमारतों में चलती थीं, पुस्तकालय सीमित था और आधुनिक लॉ कॉलेजों जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं.
ट्यूशन पढ़ाकर उठाया अपनी पढ़ाई का खर्च
83 छात्रों में लगभग 9 छात्राएं थीं. फिर भी मोहना ने अपनी मेहनत, वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में सक्रिय भागीदारी और सीखने के प्रति समर्पण से अपनी अलग पहचान बनाई.सूत्रों ने NDTV को बताया कि पढ़ाई में किसी तरह की दिक्कत ना हो इसलिए कार्यरत महिलाओं के छात्रावास में रहते हुए उन्होंने ट्यूशन पढ़ाकर अपनी शिक्षा का खर्च उठाया. 1988 में उन्होंने उस ऐतिहासिक प्रथम बैच के सदस्य के रूप में स्नातक की उपाधि प्राप्त की.
कानूनी जगत की सर्वोच्च ऊंचाइयों तक पहुंचान बड़ी बात
उनके सहपाठियों में के. वी. विश्वनाथन भी थे, जो आगे चलकर वरिष्ठ वकील बने, भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल रहे और 2023 में सीधे बार से सुप्रीम कोर्ट के जज नियुक्त हुए. पोल्लाची के एक बड़े परिवार से निकलकर कानूनी जगत की सर्वोच्च ऊंचाइयों तक पहुंचना जस्टिस मोहना की असाधारण उपलब्धि है. उनकी यात्रा उन सभी युवाओं, विशेषकर महिलाओं के लिए प्रेरणा है, जो परंपराओं की सीमाओं से आगे बढ़कर बड़े सपने देखने और उन्हें साकार करने का साहस रखती हैं.
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