सुप्रीम कोर्ट से DNT समुदायों को बड़ा झटका, जानें क्यों अलग पहचान की मांग वाली याचिका हुई खारिज

याचिकाकर्ता, DNT समुदाय के नेता डक्शिनकुमार बाजरंगे और अन्य, DNT समुदाय के लोगों को अलग वर्गीकृत करने की मांग कर रहे थे. वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ दवे ने अदालत में कहा कि ये समुदाय ऐतिहासिक अन्याय का सामना कर रहे हैं क्योंकि ब्रिटिश शासन ने इन्हें आपराधिक घोषित किया था.

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DNT समुदायों को बड़ा झटका
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  • सुप्रीम कोर्ट ने डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों की अलग पहचान की मांग वाली याचिका को खारिज किया है
  • चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि जाति आधारित अधिक वर्गीकरण की बजाय जातिहीन समाज बनाना उचित होगा
  • अदालत ने यह मामला नीति संबंधी बताया और याचिकाकर्ताओं को अपनी मांग संबंधित अधिकारियों के समक्ष रखने की सलाह दी
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सुप्रीम कोर्ट से DNT समुदायों को बड़ा झटका लगा है. अदालत ने मंगलवार को डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों (DNT) की 2027 की जनगणना में अलग पहचान की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया. DNT समुदायों की अलग गिनती की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए  CJI सूर्य कांत ने कहा कि  भारत एक बहुत ही अनोखा देश है. जाति रहित समाज बनाने के बजाय हम अधिक और अधिक वर्गीकरण बना रहे है.

नीति-संबंधी मामला कोर्ट के दायरे में नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह एक नीति-संबंधी मामला है और न्यायालय के दायरे में नहीं आता. हालांकि, याचिकाकर्ताओं को संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपनी मांग रखने की छूट दी गई है. CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने यह फैसला सुनाया. याचिकाकर्ता, DNT समुदाय के नेता डक्शिनकुमार बाजरंगे और अन्य, DNT समुदाय के लोगों को अलग वर्गीकृत करने की मांग कर रहे थे. वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ दवे ने अदालत में कहा कि ये समुदाय ऐतिहासिक अन्याय का सामना कर रहे हैं क्योंकि ब्रिटिश शासन ने इन्हें आपराधिक घोषित किया था.

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DNT समुदायों की अलग गिनती की सिफारिश

दवे  ने कहा कि वर्तमान जनगणना फॉर्म में केवल SC, ST और अन्य श्रेणियां हैं और DNT समुदाय को चिह्नित करने का विकल्प नहीं है. उन्होंने यह भी बताया कि सरकार की रिपोर्ट और आयोगों ने DNT की अलग गिनती की सिफारिश की है, लेकिन यह आखिरी बार 1913 में जनगणना में दर्ज हुआ था. चीफ जस्टिस ने टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत एक बहुत ही अनोखा देश है. जाति रहित समाज बनाने के बजाय हम अधिक और अधिक वर्गीकरण बना रहे हैं.

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उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के दावे साधारण नहीं हैं और यह गहरे कारणों से किए जाते हैं. बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि यह निर्णय नीति निर्माण के दायरे में आता है और न्यायालय इसे तय नहीं कर सकता. याचिकाकर्ताओं को यह सलाह दी गई कि वे अपनी मांग संबंधित मंत्रालय या सरकारी अधिकारियों के पास रखें.

बिना सही आंकड़े योजनाएं, सरकारी सहायता लागू होना संभव नहीं

 याचिका में बताया गया कि DNT समुदाय भारत में लगभग 10 से 12 करोड़ लोगों का समूह है, जिन्हें स्वतंत्रता के बाद कभी अलग गिनती में शामिल नहीं किया गया. कई आयोगों ने इनके लिए अलग वर्गीकरण और जनगणना की सिफारिश की थी, लेकिन अभी तक कोई स्पष्ट प्रक्रिया नहीं बनाई गई है. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि सही आंकड़ों के बिना इन समुदायों के लिए लक्षित कल्याणकारी योजनाएं और सरकारी सहायता प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो सकतीं 

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