सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक दिलचस्प मामला सामने आया, जहां एक वकील अशोक पांडे ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के मामले में पैरवी के बदले 1 करोड़ रुपये फीस दिलाने की मांग की थी. कोर्ट ने उस याचिका को खारिज करते हुए व्यंग्य के लहजे में कहा, बहुत-बहुत धन्यवाद, आपने समाजसेवा की है. CJI सूर्य कांत मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि अगर याचिकाकर्ता ने खुद व्यक्तिगत रूप से पेश होकर मामले दायर किए थे तो फिर खर्च का दावा कैसे किया जा सकता है.सुनवाई के दौरान वकील ने कहा कि कुछ जजों ने उस समय प्रेस कॉन्फ्रेंस कर तत्कालीन CJI के खिलाफ बयान दिए थे इसलिए उन्हें 'बचाने' के लिए अदालत जाना पड़ा.
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इस पर CJI ने टिप्पणी करते हुए कहा, आप इसे सामाजिक सेवा बताते हैं तो सामाजिक सेवा अनमोल है और मुफ्त है.फिर इसके लिए 1 करोड़ रुपये कैसे मांग सकते हैं? अदालत ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर सही फैसला दिया था और इसमें हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है. दरअसल, याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें कानून एवं न्याय मंत्रालय को ₹1 करोड़ फीस दिलाने की उनकी मांग ठुकरा दी गई थी.
हाईकोर्ट की बेंच ने न सिर्फ याचिका खारिज की थी बल्कि सुप्रीम कोर्ट में अपील की अनुमति देने से भी इनकार कर दिया था. 2018 में जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की पहल हुई थी, जिस पर तत्कालीन उपराष्ट्रपति और राज्यसभा सभापति वेंकैया नायडू ने पर्याप्त आधार न होने का हवाला देकर नोटिस खारिज कर दिया था.
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सीजेआई (थोड़ा व्यंग्य करते हुए): आप स्वयं उपस्थित हुए थे, तो आप खर्च की बात कैसे कर रहे हैं?
अशोक पांडे: कुछ जजों ने तत्कालीन माननीय मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई थी... मुझे उन्हें बचाना पड़ा. उनका अपमान किया जा रहा था.
चीफ जस्टिस: आप मौजूदा जजों पर तरह-तरह के गंभीर आरोप लगाते हैं और फिर उन्हें माननीय कहते हैं. आपने जो किया है वह समाजसेवा है, जो अमूल्य और नि:शुल्क है, तो आप इसके लिए 1 करोड़ रुपये कैसे मांग सकते हैं? आप अपनी समाजसेवा जारी रखें. बहुत-बहुत धन्यवाद. पांडे इसके बाद लगातार बयान देते रहे, लेकिन सीजेआई ने अनसुना कर दिया.उच्च न्यायालय ने याचिका को सही ढंग से खारिज कर दिया है. हम इसमें हस्तक्षेप नहीं करेंगे.
हाईकोर्ट से भी याचिका खारिज हुई थी
याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के याचिका खारिज करने के फैसले को चुनौती दी थी. याचिकाकर्ता ने याचिका में केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय को 1 करोड़ रुपये फीस और खर्च के रूप में देने का निर्देश देने की मांग की थी. याचिकाकर्ता का दावा था कि उन्होंने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा को 'अपमान, प्रताड़ना और पद से हटाने' से बचाने के लिए कुछ केस दायर किए थे. जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की पीठ ने उनकी याचिका के साथ-साथ संविधान के अनुच्छेद 134ए के तहत सर्वोच्च न्यायालय में अपील के लिए प्रमाण पत्र देने के उनके अनुरोध को भी खारिज कर दिया.
महाभियोग की मांग की थी
गौरतलब है कि अप्रैल 2018 में सात राजनीतिक दलों के 71 राज्यसभा सदस्यों ने जस्टिस मिश्रा के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही की मांग करते हुए एक नोटिस पर हस्ताक्षर किए थे. हालांकि भारत के तत्कालीन उपराष्ट्रपति और राज्यसभा अध्यक्ष वेंकैया नायडू ने बाद में इस नोटिस को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इसमें कोई ठोस आधार नहीं है.














