- टीएमसी में चुनाव नतीजों के बाद से पार्टी लीडरशिप और नेताओं के बीच अविश्वास और बगावत की स्थिति बन गई है
- पार्टी के फैसले सेंट्रलाइज्ड हो गए हैं और बाहरी कंसल्टेंट्स तथा सर्वे सिस्टम पर अधिक निर्भरता बढ़ी है
- विधायकों की पार्टी मीटिंग्स में कम भागीदारी और असहमति के कारण संगठन में तनाव और टूटने की आशंका बढ़ी है
पश्चिम बंगाल के राजनीतिक गलियारों में अब एक बड़ा राजनीतिक सवाल चुपचाप घूम रहा है कि क्या तृणमूल कांग्रेस धीरे-धीरे टूटने की ओर बढ़ रही है? क्या बंगाल में महाराष्ट्र जैसा पॉलिटिकल माहौल बन सकता है, जहां शिवसेना या NCP दो गुटों में टूट गई थी?
यह चर्चा अभी भी अंदाजे वाली लग सकती है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस के अंदर हाल के घटनाक्रम ने ऐसे सवालों को नजरंदाज करना नामुमकिन बना दिया है. अब खुलेआम पॉलिटिकल गपशप, अंदरूनी अविश्वास, साफ बगावत, और लीडरशिप के कुछ हिस्सों और पार्टी के जमीनी स्तर के प्रतिनिधियों के बीच बढ़ती दूरी है. जाहिर है, इससे इस बात पर और ज्यादा पॉलिटिकल अंदाजे लगने लगे हैं कि क्या TMC को आखिरकार ऑर्गेनाइजेशनल टूट का सामना करना पड़ सकता है?
चुनाव नतीजों के बाद से बढ़ी नाराजगी!
2026 के विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद से यह बातचीत और तेज हो गई है. 4 मई को नतीजों के ऐलान के बाद से, कई सांसद, विधायक, पार्षद और जिला स्तर के नेताओं ने पार्टी लीडरशिप से नाराजगी जाहिर की है.
दिलचस्प बात यह है कि उनकी ज्यादातर बुराई मुख्य रूप से ममता बनर्जी पर नहीं, बल्कि अभिषेक बनर्जी और पार्टी स्ट्रक्चर के अंदर IPAC जैसे ऑर्गेनाइजेशन के बढ़ते असर पर की गई है. कई नेता अब खुलेआम कह रहे हैं कि तृणमूल कांग्रेस का पारंपरिक पॉलिटिकल कल्चर बदल गया है. उनके मुताबिक, फैसले लेने का तरीका तेजी से सेंट्रलाइज्ड हो गया है और यह कंसल्टेंट्स, सर्वे सिस्टम और बाहरी पॉलिटिकल स्ट्रेटजिस्ट पर बहुत ज्यादा निर्भर हो गया है. कई नेताओं को लगता है कि पार्टी और आम वर्कर्स के बीच ऑर्गेनिक पॉलिटिकल कनेक्शन कमजोर हो रहा है.
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बैठकों में नहीं आ रहे विधायक?
ममता बनर्जी पार्टी विधायकों की मीटिंग्स बुला रही हैं, जहां ये अंदरूनी बेचैनी और ज्यादा साफ दिखी. रिपोर्ट्स बताती हैं कि एक मीटिंग से दूसरी मीटिंग में विधायकों के आने की संख्या धीरे-धीरे कम होती गई. पहली मीटिंग में काफी अच्छी हिस्सेदारी देखी गई, लेकिन दूसरी मीटिंग में अटेंडेंस कम हो गई और तीसरी मीटिंग में और भी कम हो गई. ऑफिशियली, कई गैर-हाजिर विधायकों ने हेल्थ प्रॉब्लम, पर्सनल एंगेजमेंट या सिक्योरिटी से जुड़े बहाने बताए. हालांकि, राजनीतिक तौर पर, कई जानकारों का मानना है कि असली वजह अलग थी. कई विधायक अब मौजूदा लीडरशिप स्ट्रक्चर के करीब नहीं रहना चाहते थे.
पहली मीटिंग में ही, ममता बनर्जी ने कथित तौर पर विधायकों से खड़े होकर अभिषेक बनर्जी के लिए पब्लिकली सपोर्ट दिखाने को कहा. उस घटना से ही पार्टी लीडरशिप के अंदर अंदरूनी असहमति को लेकर बढ़ती घबराहट का पता चला.
इस बीच, असहमति जताने वालों के खिलाफ डिसिप्लिनरी एक्शन ने तनाव को और बढ़ा दिया है. लेजिस्लेटिव कम्युनिकेशन से जुड़े नकली सिग्नेचर के आरोप सामने आने के बाद दो विधायकों को पार्टी से निकाल दिया गया. हालांकि, निकाले गए नेताओं ने इन आरोपों से पूरी तरह इनकार किया और दावा किया कि कंप्यूटर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके उनके सिग्नेचर में डिजिटल तरीके से छेड़छाड़ की गई थी. उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी जानकारी के बिना डॉक्यूमेंट्स सर्कुलेट किए गए और उनके नाम से गलत कम्युनिकेशन दिखाए गए.
फर्जी साइन का विवाद क्या?
यह मामला पार्टी के लिए और भी शर्मनाक हो गया क्योंकि नकली सिग्नेचर और हेरफेर किए गए लेटर के आरोप जल्द ही एक राजनीतिक विवाद में बदल गए. अंदरूनी तालमेल, ऑर्गेनाइजेशनल ट्रांसपेरेंसी और खुद लेजिस्लेटिव पार्टी के कामकाज को लेकर सवाल उठने लगे.
दरअसल, 18 मई को अभिषेक बनर्जी ने कथित तौर पर विधानसभा के प्रमुख सचिव को एक पत्र लिखा था. बाद में 20 मई को एक और पत्र भेजा गया, जिसमें कहा गया कि विपक्षी विधायकों की एक मीटिंग हुई थी, जिसमें ज्यादातर विधायकों ने शोभनदेव मुखोपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाने के समर्थन में हाथ उठाए थे. हालांकि, विवाद इसलिए खड़ा हो गया क्योंकि बाद में कई विधायकों ने दावा किया कि वे न तो ऐसी किसी मीटिंग में शामिल हुए थे और न ही किसी प्रस्ताव पर साइन किए थे. इससे गंभीर सवाल उठे. अगर दस्तखत वाकई नकली थे तो असल में कितने विधायक शामिल थे? क्या प्रस्ताव सच में पास हुआ था? या सिस्टम में कहीं कोई हेराफेरी हुई थी?
आखिरकार मामला CID तक पहुंच गया, और खबर है कि मुख्यमंत्री ने भी माना कि कई विधायकों से पूछताछ की जा रही है. इस पूरे मामले ने पार्टी के अंदर अविश्वास की भावना को और गहरा कर दिया.
राजनीतिक तौर पर जरूरी बात यह है कि बगावत अब कुछ खास लोगों तक ही सीमित नहीं है. बेचैनी का एक बड़ा माहौल दिखने लगा है. कुछ नेताओं ने चुपचाप पार्टी मीटिंग्स से पूरी तरह बचना शुरू कर दिया है. दूसरे डर, दबाव और ऑर्गनाइजेशन के अंदर खुलकर अपनी राय न बता पाने के बारे में ऑफ द रिकॉर्ड बोल रहे हैं.
इससे जाहिर है एक बड़ी पॉलिटिकल बहस शुरू हो गई है. अगर नाराजगी बढ़ती रही, तो क्या बंगाल में कोई अलग पॉलिटिकल प्लेटफॉर्म बन सकता है? जरूरी नहीं कि वह BJP हो, और जरूरी नहीं कि वह कांग्रेस जैसी कोई दूसरी ताकत हो, बल्कि शायद एक ऐसा तीसरा राजनीतिक मंच हो जिसे खुद असंतुष्ट तृणमूल नेताओं ने बनाया हो.
पहले भी देखे हैं ऐसे उदाहरण
भारतीय राजनीति में ऐसे उदाहरण पहले भी देखे गए हैं. दशकों से कांग्रेस के कई क्षेत्रीय गुटों में बंटने से लेकर महाराष्ट्र में शिवसेना और NCP से जुड़े हालिया घटनाक्रमों तक, अब पार्टियों में फूट पड़ना असंभव नहीं माना जाता. बंगाल ने भी अपने पूरे इतिहास में कई बार राजनीतिक समीकरणों में बदलाव देखे हैं.
अभी के लिए, ज्यादातर चर्चाएं महज राजनीतिक 'हवाबाजी' हैं, यानी बिना किसी पक्के सबूत के की गई अटकलें. लेकिन ये अटकलें इसलिए लगाई जा रही हैं, क्योंकि पार्टी के भीतर की अस्थिरता के संकेतों को अब नजरंदाज करना मुश्किल होता जा रहा है.
तृणमूल कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता सिर्फ बगावत नहीं, बल्कि लोगों की नजर में पार्टी की छवि है. जब कोई सत्ताधारी पार्टी अंदर से बंटी हुई नजर आने लगती है, तो संगठन के भीतर और आम मतदाताओं के बीच भी शंकाएं फैलने लगती हैं. तब पार्टी के अधिकार, नेतृत्व के उत्तराधिकार, वैचारिक दिशा और सांगठनिक अनुशासन को लेकर सवाल उठने लगते हैं.
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