नेहरू की उस चिट्ठी में क्या लिखा था? गांधी जी ने क्या कहा था? सोमनाथ मंदिर की पूरी कहानी

सोमनाथ मंदिर एक बार फिर भारत की राजनीति, इतिहास और वैचारिक बहस के केंद्र में आ गया है. साथ ही लौट आई है पंडित नेहरू और महात्मा गांधी से जुड़ी इसकी असहज करने वाली कहानी. पढ़ें वो वाक्या और जानें इस ऐतिहासिक मंदिर से जुड़ा गूढ़ इतिहास.

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  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमनाथ मंदिर को भारत की सभ्यतागत दृढ़ता और आत्मविश्वास का प्रतीक बताया है.
  • नेहरू की चिट्ठियों और मंदिर उद्घाटन में जाने से राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को रोकने की फिर चर्चा भी हो रही है.
  • गजनी के हमले के 1000 साल, पुनर्निर्माण के 75 साल का संयोग सोमनाथ मंदिर को फिर राजनीति के केंद्र में ले आया है.
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‘जय सोमनाथ.' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस ट्वीट के साथ ही सोमनाथ मंदिर एक बार फिर भारत की राजनीति, इतिहास और वैचारिक बहस के केंद्र में आ गया. पीएम मोदी ने जब यह कहा कि जनवरी 1026 में महमूद गजनवी के हमले के बावजूद सोमनाथ की शाश्वत आस्था कभी नहीं टूटी, तो यह सिर्फ एक धार्मिक टिप्पणी नहीं थी, बल्कि एक स्पष्ट राजनीतिक और सभ्यतागत संदेश भी था. प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार साल 2026 को भारत के आत्मविश्वास, सांस्कृतिक स्मृति और ऐतिहासिक पुनरुत्थान के प्रतीक के रूप में पेश कर रहे हैं. इसी संदर्भ में 11 जनवरी 2026 से ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' की शुरुआत की जा रही है, जो पूरे एक साल चलेगा. इसके साथ ही यह सोमनाथ मंदिर से जुड़ी आस्था, राजनीति, विचारधारा और इसके इतिहास के पन्नों पलटने का अवसर है.

पीएम मोदी के ट्वीट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ट्वीट में साफ लफ्जों में लिखा कि 1026 में सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले आक्रमण और उसके बाद हुए अनेक हमले भी भारत की शाश्वत आस्था को डिगा नहीं सके. बल्कि इन आक्रमणों ने भारत की सांस्कृतिक एकता को और मजबूत किया और हर पीढ़ी ने सोमनाथ का पुनर्निर्माण किया.

इसके साथ ही पीएम मोदी ने 1951 में पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन और उसके 50 वर्ष पूरे होने की भी याद दिलाई. उन्होंने 31 अक्टूबर 2001 को हुए उस कार्यक्रम का जिक्र किया, जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और कई प्रमुख नेता मौजूद थे. पीएम मोदी ने यह भी बताया कि 2026 में 1951 के उस ऐतिहासिक समारोह के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं.

प्रधानमंत्री मोदी ने सरदार पटेल और केएम मुंशी को सोमनाथ मंदिर के ऐतिहासिक पुनर्निर्माण का नायक बताया.

अखबार में पीएम मोदी ने क्या लिखा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सोमनाथ मंदिर पर लिखा लेख अखबारों में प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने सोमनाथ को भारतीय सभ्यता की अमर चेतना बताया. उन्होंने लिखा कि सोमनाथ केवल पत्थरों से बना मंदिर नहीं है, बल्कि वह विचार है जिसे हजार साल की हिंसा भी मिटा नहीं सकी. मोदी ने महमूद गजनवी के आक्रमण को भारत की आत्मा पर हमला बताया और कहा कि हर पीढ़ी ने इस मंदिर को फिर खड़ा किया.

अपने लेख में पीएम मोदी ने अहिल्याबाई होल्कर, स्वामी विवेकानंद, सरदार पटेल और केएम मुंशी की भूमिका को रेखांकित किया. उन्होंने 1951 में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद द्वारा मंदिर उद्घाटन को स्वतंत्र भारत के आत्मविश्वास का प्रतीक बताया और लिखा कि 2026 में 1000 साल और 75 साल का संयोग सोमनाथ को और भी ऐतिहासिक बना देता है.

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2026 क्यों ऐतिहासिक है- 1000 साल और 75 साल का संगम

साल 2026 सोमनाथ मंदिर के इतिहास में दो वजहों से बेहद अहम है. 1026 में महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया था, जिसके 1000 साल पूरे हो रहे हैं. वहीं दूसरी ओर 11 मई 1951 को स्वतंत्र भारत में पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन के 75 वर्ष भी पूरे हो रहे हैं. गुजरात सरकार और केंद्र सरकार इस अवसर को केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत स्मृति के उत्सव के रूप में पेश कर रही हैं. गुजरात सरकार के मंत्री जितु वाघाणी ने इसे दुर्लभ ऐतिहासिक संयोग बताया और कहा कि इस मौके पर शौर्य यात्रा, रोड शो और 3000 ड्रोन का भव्य शो आयोजित किया जाएगा, जिसमें सोमनाथ के पूरे इतिहास को आकाश में उकेरा जाएगा.

फिर आया पंडित जवाहरलाल नेहरू का नाम...

जैसे ही सोमनाथ स्वाभिमान पर्व की घोषणा हुई, वैसे ही जवाहरलाल नेहरू का नाम फिर चर्चा में आ गया. बीजेपी ने जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखी गई चिट्ठियों को सामने रखते हुए कांग्रेस पर सीधा हमला बोला. बीजेपी ने दावा किया कि नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण और उसके उद्घाटन समारोह को दिखावे का समारोह कहा था और इसे भारत की वैश्विक छवि के लिए नुकसानदायक माना था. पार्टी ने नेहरू के उस पत्र का हवाला दिया, जो उन्होंने 28 अप्रैल 1951 को सूचना एवं प्रसारण मंत्री आरआर दिवाकर को लिखा था.

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इस पत्र में नेहरू ने साफ लिखा कि सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन कोई सरकारी कार्यक्रम नहीं दिखना चाहिए और ऑल इंडिया रेडियो को इसके कवरेज को हल्का रखना चाहिए, ताकि यह सरकारी आयोजन न लगे.

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क्या थी नेहरू की चिंता- धर्मनिरपेक्षता या वैश्विक छवि

सोमनाथ मंदिर को लेकर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की आपत्ति का मूल बिंदु यह था कि भारत एक नया स्वतंत्र हुआ और धर्मनिरपेक्ष देश है. उनका मानना था कि यदि राष्ट्रपति और सरकार के वरिष्ठ सदस्य किसी मंदिर के उद्घाटन में शामिल होते हैं, तो इससे यह संदेश जा सकता है कि भारत एक धार्मिक राज्य है.

नेहरू ने राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को भी सलाह दी थी कि वे सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन में शामिल न हों. उनका तर्क था कि राष्ट्रपति का पद धार्मिक गतिविधियों से अलग रहना चाहिए. हालांकि यह भी सच है कि नेहरू ने कभी सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को रोका नहीं. उन्होंने सिर्फ यह सुनिश्चित करना चाहा कि इसमें सरकारी धन और सरकारी प्रतीकात्मकता न जुड़े.

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पंडित नेहरू की पूरी कहानी

सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के बाद केएम मुंशी ने राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया. यह वही क्षण था जब नेहरू और राजेंद्र प्रसाद के विचारों में टकराव सामने आया. नेहरू ने राष्ट्रपति को मंदिर न जाने की सलाह दी. दरअसल पंडित नेहरू ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद को सोमनाथ मंदिर नहीं जाने की सलाह दी थी. उन्होंने तर्क दिया था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और राष्ट्रपति के किसी मंदिर के कार्यक्रम में जाने से गलत संकेत जाएगा. लेकिन राजेंद्र प्रसाद ने इसे स्वीकार नहीं किया. उन्होंने कहा कि वे राष्ट्रपति के रूप में नहीं, बल्कि एक नागरिक के रूप में मंदिर जा रहे हैं.

बता दें कि जवाहरलाल नेहरू ने सोमनाथ मंदिर से खुद को पूरी तरह अलग रखा था. यहां तक कि उन्होंने तब सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिख कर कहा था कि सोमनाथ मंदिर के पुनर्निमाण में सरकारी पैसे नहीं इस्तेमाल किए जाने चाहिए. तो जब भी सोमनाथ मंदिर का जिक्र होता है, पंडित नेहरू के उन फैसलों की बात उभर कर सामने आ जाती है.

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सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण पर महात्मा गांधी ने क्या कहा था?

सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की कहानी 1947 में जूनागढ़ से शुरू होती है. आजादी के बाद जूनागढ़ रियासत के नवाब ने पाकिस्तान में शामिल होने की घोषणा कर दी थी. लेकिन इसके बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने कड़ा रुख अपनाया और जूनागढ़ को हैदराबाद और कश्मीर की तरह ही भारत में विलय करा दिया.

तत्कालीन उप-प्रधानमंत्री सरदार पटेल 12 नवंबर, 1947 को जूनागढ़ पहुंचे. उसी दौरान उन्होंने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का आदेश दिया. यहीं सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया.

सरदार पटेल, केएम मुंशी और कांग्रेस के दूसरे नेता इस प्रस्ताव के साथ महात्मा गांधी के पास गए. महात्मा गांधी ने उनके फैसले का स्वागत किया लेकिन साथ ही यह भी सुझाव दिया कि सोमनाथ मंदिर के निर्माण के खर्च में लगने वाला पैसा आम जनता से दान के रूप में इकट्ठा किया जाना चाहिए, न कि सरकारी की ओर से दिया जाना चाहिए.

15 दिसंबर 1950 को सरदार पटेल के निधन से करीब दो माह पहले अक्टूबर के महीने में सोमनाथ मंदिर के जर्जर हिस्से को ढहाया गया और वहां मौजूद मस्जिद को कुछ किलोमीटर सरकाया गया. सरदार पटेल के निधन के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निमाण की जिम्मेदारी नेहरू सरकार में खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री केएम मुंशी को सौंपी गई. 

केएम मुंशी ने याद दिलाया कि मध्यकाल में भारत की यात्रा करने वाले अलबरूनी और मार्कोपोलो ने जो वर्णन किया उनके मुताबिक “यह मंदिर अति समृद्ध था. इसके निर्वाह के लिए दस हजार गांव थे, अभिषेक का जल गंगा से और कमल पुष्प हमेशा कश्मीर से आते थे. गर्भगृह में हीरे-जवाहरात जड़ित मूर्तियां थीं. एक हजार पुजारी हमेशा भगवान की पूजा में रहते थे.”  

नए मंदिर का निर्माण प्राचीन मंदिर कला विशेषज्ञ प्रभाशंकर सोमपुरा की देखरेख में किया गया. प्राचीन नागर शैली में इस मंदिर का निर्माण हुआ है. मंदिर की ऊंचाई फर्श से लेकर छत तक 155 फीट है.

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गर्भ गृह में एक मंजिल और शिखर तक सात मंजिलें हैं. मंदिर का सभा गृह और नृत्य मंडप तीन-तीन मंजिल के हैं. इसकी तीसरी मंजिल पर 1000 छोटी-छोटी कलश आकृतियां बनाई गई हैं. गर्भ गृह के कलश का वजन 10 टन है. 72 स्तंभ वाला यह मंदिर 800 साल बाद नागर शैली से निर्मित पहला देवालय है.

पुनर्निर्माण के बाद 11 मई 1951 को सोमनाथ मंदिर के द्वार भक्तों के लिए खोल दिए गए. यह स्वतंत्र भारत के इतिहास का एक ऐसा क्षण था, जिसे आज बीजेपी और पीएम मोदी भारत की सभ्यतागत विजय के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं.

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सोमनाथ मंदिर बार-बार टूटा, फिर खड़ा हुआ- क्या है इतिहास?

सोमनाथ मंदिर शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला माना जाता है. पौराणिक मान्यता के अनुसार इसका निर्माण स्वयं चंद्रदेव सोमराज ने किया था. इसका उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है. यह मंदिर सदियों तक भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र रहा.

1026 में महमूद गजनवी के आक्रमण के बाद सोमनाथ सिर्फ एक बार नहीं, कई बार टूटा.

अलाउद्दीन खिलजी और औरंगजेब के दौर में भी इस मंदिर को नुकसान पहुंचाया गया. लेकिन हर बार किसी न किसी रूप में इसका पुनर्निर्माण हुआ. 18वीं सदी में अहिल्याबाई होल्कर ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

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स्वामी विवेकानंद सोमनाथ मंदिर पर क्या बोले? 

1890 के दशक में स्वामी विवेकानंद सोमनाथ गए थे. सोमनाथ मंदिर ने उन्हें बहुत प्रभावित किया. बाद में उन्होंने चेन्नई में कहा, "दक्षिण भारत के कुछ पुराने मंदिर और गुजरात के सोमनाथ जैसे मंदिर आपको ज्ञान की बहुत सी बातें सिखाएंगे, ये आपको किताब से अधिक इतिहास की गहरी समझ देंगे. देखिए कि कैसे इन मंदिरों पर सौ हमलों के बाद सौ बार फिर से बनने के निशान हैं. इन्हें बार-बार नष्ट करने की कोशिश की गई और खंडहरों से ये फिर बनते रहे, ठीक वैसे ही जैसे पहले मजबूती से खड़े थे."

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पीएम मोदी का स्वाभिमान पर्व इसी कथा को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश है. वहीं नेहरू की असहजता और चिट्ठियां यह दिखाती हैं कि आजादी के बाद भारत किस तरह अपनी पहचान को लेकर संघर्ष कर रहा था.

सोमनाथ मंदिर भारत की उस चेतना का प्रतीक है जो हर आक्रमण के बाद और मजबूत हुई. 1026 से 2026 तक की यह यात्रा सिर्फ मंदिर की नहीं, बल्कि भारत के आत्मसम्मान की कहानी है. सोमनाथ टूट सकता है, लेकिन झुकता नहीं. यही इसकी सबसे बड़ी कहानी है.

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