न्यायिक शक्ति का गलत उपयोग...अभिनेता दर्शन की ज़मानत पर SC ने कर्नाटक हाईकोर्ट की आलोचना की

कोर्ट ने कहा कि धारा 302 के मामले में गिरफ्तारी के आधार प्रस्तुत नहीं किए गए थे.यह प्रथम दृष्टया न्यायिक शक्ति का विकृत प्रयोग है.

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  • सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए दर्शन को मिली जमानत पर पुनर्विचार किया है.
  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने जमानत मामले में सजा या बरी करने जैसा निर्णय दिया जो गलत है.
  • कर्नाटक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दर्शन की जमानत रद्द करने की मांग की है.
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नई दिल्ली:

कन्नड़ फिल्मों के अभिनेता दर्शन की मुश्किलें और बढ़ती दिख रही हैं. रेणुकास्वामी हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले पर सवाल खड़े किए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि हाईकोर्ट ने जमानत मामले में सजा या बरी करने जैसा फैसला सुना दिया लेकिन हम ऐसी गलती नहीं दोहराएंगे. दर्शन को दी गई ज़मानत रद्द करने की कर्नाटक राज्य की याचिका पर फैसला सुरक्षित. सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि दर्शन को मिली जमानत बनी रहेगी या रद्द होगी. 

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की. पीठ ने वकील से कहा कि क्या आपको नहीं लगता कि हाईकोर्ट ने बरी करने का आदेश सुनाया था? क्या हाईकोर्ट दूसरे मामलों में भी इसी तरह का आदेश सुनाता है? जो बात परेशान करने वाली है वह है हाईकोर्ट की दली. 

कोर्ट ने कहा कि धारा 302 के मामले में गिरफ्तारी के आधार प्रस्तुत नहीं किए गए थे.यह प्रथम दृष्टया न्यायिक शक्ति का विकृत प्रयोग है. एक निचली अदालत के जज द्वारा ऐसी गलती करना अभी भी स्वीकार्य है. लेकिन हाईकोर्ट के जज द्वारा ऐसी गलती करना? जस्टिस पारदीवाला ने पूछा कि मुकदमे को पूरा करने में कितना समय लगेगा? जब कर्नाटक सरकार के वकील ने कहा कि हम डे टू डे करेंगे. जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि इस मामले में डे टू डे सुनवाई क्यों? जब विचाराधीन कैदी 5-6 साल से जेल में सड़ रहे हैं? शीर्ष अदालत को बताया गया कि मुकदमा 6 महीने में पूरा हो सकता है. 

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