सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई है. जिसमें जजों की मौखिक टिप्पणियों और उनके सांकेतिक बयानों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने या फिर उनका गलत इस्तेमाल करने को रोकने की मांग की गई है. याचिका में काकरोच जनता पार्टी (CJP) की गतिविधियों समेत उन व्यक्तियों और संस्थाओं की जांच की मांग भी हुई है, जो कथित तौर पर सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही से जुड़ी टिप्पणियों या ट्रेडमार्क के रूप में इस्तेमाल, मुद्रीकरण या बिना अनुमति व्यापारिक उपयोग कर रहे हैं. मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, MEITY, बार काउंसिल ऑफ इंडिया और CBI को नोटिस जारी किया है. इस याचिका पर अगली सुनवाई 10 सितंबर को होगी.
'कॉकरोच' शब्द का दिया गया हवाला
वकील राजा चौधरी की तरफ से दायर की गई इस याचिका में 15 मई 2026 की अदालत की सुनवाई का हवाला दिया है, जिसमें जिसमें चीफ जस्टिस ने अपनी टिप्पणी में 'कॉकरोच' शब्द का इस्तेमाल किया था. याचिका में आरोप लगाया है कि कोर्ट में हुई बातचीत को कांट-छांटकर सोशल मीडिया पर राजनीतिक प्रतीक, मीम और वायरल कंटेंट के रूप में इस्तेमाल किया गया था. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक याचिका में वकालत के पेशे में कथित फर्जी कानून की डिग्रियों, जाली पहचान के आधार पर प्रैक्टिस और पेशेवर मानकों में गिरावट के आरोपों की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है. याचिकाकर्ता ने जांच CBI या किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी से कराने का अनुरोध किया है.
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याचिका में इन बातों की भी जिक्र
याचिका में बार काउंसिल ऑफ इंडिया और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की तरफ से भी फर्जी या धोखाधड़ी करने वाले कानूनी प्रैक्टिशनरों की मौजूदगी को लेकर चिंता व्यक्त की गई है. याचिका के मुताबिक ऐसे कथित फर्जी प्रैक्टिशनरों का असर सीधे तौर पर न्याय प्रशासन पर पड़ सकता है. याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से उचित रिट, आदेश या निर्देश जारी कर सक्षम एजेंसी को ऐसे मामलों की जांच करने का निर्देश देने की मांग की है, जिनमें फर्जी या धोखाधड़ी से हासिल कानून की डिग्री और वकालत के पेशे में प्रतिरूपण जैसे आरोप शामिल हैं. याचिका में कहा गया है कि कानूनी पेशे की विश्वसनीयता बनाए रखने और न्याय व्यवस्था में जनता का भरोसा कायम रखने के लिए ऐसे मामलों की स्वतंत्र जांच और आवश्यक कार्रवाई जरूरी है.
याचिका में स्पष्ट किया गया है कि निष्पक्ष आलोचना, लोकतांत्रिक असहमति, व्यंग्य और संविधान द्वारा संरक्षित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को रोकने की मांग नहीं की जा रही है.याचिकाकर्ता के अनुसार संवैधानिक नैतिकता और संस्थागत गरिमा के दायरे में ऐसी आलोचना और असहमति पूरी तरह स्वीकार्य है. हालांकि न्यायिक कार्यवाही और संस्थागत अभिव्यक्तियों का व्यावसायिक या ट्रेडमार्क आधारित शोषण इस तरह नहीं किया जा सकता, जिससे न्यायपालिका और न्याय प्रशासन में जनता के विश्वास को नुकसान पहुंचे. याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मामले की परिस्थितियों के अनुरूप अन्य उचित आदेश और निर्देश जारी करने की भी मांग की गई है.
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