- पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव बिहार की राजनीतिक नर्सरी है जहां से कई बड़े नेता निकले हैं.
- इस बार 28 फरवरी को लगभग बीस हजार छात्र-छात्राएं अपने नए छात्रसंघ नेताओं के लिए मतदान करेंगे.
- कुल 41 उम्मीदवार विभिन्न पदों के लिए चुनावी दंगल में हैं जिसमें अध्यक्ष पद पर सबसे अधिक प्रतिस्पर्धा है.
पटना यूनिवर्सिटी (PU) छात्र संघ चुनाव को केवल एक कॉलेज इलेक्शन कहना गलत होगा, क्योंकि यह बिहार की 'राजनीतिक नर्सरी' है जहां से भविष्य के मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री निकलते हैं. इस बार 28 फरवरी को होने वाले चुनाव में विश्वविद्यालय का पूरा कैंपस चुनावी रंग में रंगा हुआ है.
पटना यूनिवर्सिटी का इतिहास गवाह है कि यहां के छात्र संघ की सीढ़ियों ने देश की संसद तक का रास्ता तय किया है. पिछले साढ़े तीन दशकों से बिहार की सत्ता के केंद्र रहे लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार इसी छात्र राजनीति की खोज हैं. सिर्फ इतना ही नहीं, बीजेपी के कद्दावर चेहरे जैसे सुशील कुमार मोदी, अश्विनी चौबे और रविशंकर प्रसाद ने भी इसी कैंपस के गलियारों में अपने नेतृत्व की पहली धार तेज की थी. आज का छात्र जब वोट डालता है, तो उसके मन में इन्हीं दिग्गजों जैसी लंबी राजनीतिक लकीर खींचने का सपना होता है.
यूनिवर्सिटी के 19,973 छात्र-वोटर अपने नए नेतृत्व का चुनाव करेंगे. मतदान की इस प्रक्रिया में 12,010 छात्र और 7,963 छात्राएं अपने मताधिकार का प्रयोग कर भविष्य के 'नेताओं' की किस्मत का फैसला करेंगी. इस बार चुनावी दंगल में कुल 41 उम्मीदवार अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं. सबसे कड़ा मुकाबला अध्यक्ष पद के लिए है, जहां 11 प्रत्याशी आमने-सामने हैं. इसके अलावा, महासचिव पद के लिए 9, उपाध्यक्ष के लिए 8, संयुक्त सचिव के लिए 6 और कोषाध्यक्ष पद के लिए 7 उम्मीदवार मैदान में डटे हुए हैं.
लालू यादव.. पटना यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष से लेकर CM तक का सफल
पटना यूनिवर्सिटी की वह 'सियासी लैब', जिसने बिहार के भविष्य की रूपरेखा तैयार की, आज एक बार फिर चर्चा में है. पटना यूनिवर्सिटी ने 1973 के साल ने बिहार को एक ऐसा चेहरा दिया जिसने राजनीति की भाषा ही बदल दी. लॉ कॉलेज के एक 'ठेठ गंवई' अंदाज वाले युवा, लालू प्रसाद यादव ने जब अपनी देसी अंदाज और बेबाक हाजिर-जवाबी से पटना यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष पद पर कब्जा जमाया था.
फिर 1974 के जेपी आंदोलन में लोकनायक जयप्रकाश नारायण की 'संपूर्ण क्रांति' की पुकार पर जब छात्र सड़कों पर उतरे, तो छात्र संघर्ष समिति के अध्यक्ष के रूप में लालू इस 'संग्राम' के सबसे मुखर सिपाही बनकर उभरे और आगे की कतार में आकर आंदोलन की कमान संभाल ली. हालांकि, इस आंदोलन की आग में लालू अकेले नहीं तप रहे थे. उनके साथ नीतीश कुमार और सुशील कुमार मोदी जैसे साथी भी थे, जो आगे चलकर बिहार की राजनीति के स्तंभ बने. संघर्ष ने लालू को कैंपस की दीवारों से निकालकर जनमानस का नेता बना दिया और यहीं से उनके मुख्यमंत्री और फिर देश के रेल मंत्री बनने तक का सफर शुरू हुआ. आज जब भी पटना यूनिवर्सिटी में वोटिंग होती है, तो लालू-नीतीश की यह विरासत हर छात्र की आंखों में एक नया सपना बनकर चमकती है.
पटना यूनिवर्सिटी ने ही तराशा बिहार की राजनीति का 'चाणक्य'
नीतीश कुमार पटना यूनिवर्सिटी के बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (अब NIT पटना) के छात्र थे. एक तरफ जहां आर्ट्स और लॉ के छात्रों का राजनीति में दबदबा रहता था, वहीं एक इंजीनियरिंग के छात्र का सक्रिय राजनीति में आना उस समय बड़ी बात थी. वे लोहिया की विचारधारा से प्रभावित थे और अपनी गंभीर व तार्किक छवि के लिए जाने जाते थे. 1974 में पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ (PUSU) का वह ऐतिहासिक चुनाव हुआ, जिसने बिहार की तकदीर बदल दी. इस चुनाव में लालू प्रसाद यादव अध्यक्ष चुने गए और नीतीश कुमार उपाध्यक्ष बने. उस समय ये तो ये दोनों युवा नेता एक-दूसरे के पूरक थे.
जब जेपी ने 'संपूर्ण क्रांति' का बिगुल फूंका, तो नीतीश कुमार ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई और करियर को दांव पर लगाकर खुद को आंदोलन में झोंक दिया. आंदोलन के दौरान उन्हें प्यार से 'मुन्ना' कहा जाता था. एक दिन वहीं से निकलकर वो बिहार की सत्ता पर सबसे लंबे समय तक राज करने वाले मुख्यमंत्री बनेंगे. 1974 की वह छात्र राजनीति ही थी, जिसने 'इंजीनियर नीतीश' को जननेता 'नीतीश कुमार' में बदल दिया.













