आर्थिक तंगी से बीच में इलाज छोड़ने को मजबूर ट्रॉमा मरीज, 6 महीने में 35% की मौत

अध्ययन के अनुसार, जिन मरीजों ने बीच में इलाज छोड़ा, उनमें से 35 प्रतिशत की अगले छह महीने में मौत हो गई. हालांकि, 65 प्रतिशत मरीज कुछ दिन बाद दोबारा हॉस्पिटल में भर्ती हुए है लेकिन उनमें से 54% मरीजों ने सरकारी अस्पताल को चुना.

विज्ञापन
Read Time: 3 mins
बीच में इलाज छोड़ने वालों में बढ़ा मौत का खतरा
नई दिल्ली:

ट्रॉमा सेंटर में भर्ती मरीज अक्सर बीच में इलाज छोड़कर चले जाते हैं. एक ताजा शोध से पता चला है कि इलाज अधूरा छोड़ देने वाले इन मरीजों की मौत का खतरा तीन गुना तक बढ़ जाता है. यह शोध इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च (IJMR) में छपा है. अध्ययन के अनुसार, प्राइवेट ट्रॉमा सेंटरों में भर्ती गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीज सबसे अधिक बीच में इलाज छोड़कर जा रहे हैं और इसकी पीछे सबसे बड़ी वजह आर्थिक मजबूरी है. क्योंकि उन मरीजों के पास हॉस्पिटल का बिल जमा करने का पर्याप्त पैसा नहीं होता है. अध्ययन बताता है कि करीब 42% मरीजों ने आर्थिक तंगी के चलते अस्पताल से डिस्चार्ज अगेंस्ट मेडिकल एडवाइस (DAMA) लिया. इनमें से आधे से ज्यादा मरीज निचले आर्थिक वर्ग से थे.

प्राइवेट में मोटा बिल, सरकारी अस्पताल भाग रहे मरीज 

शोध में कई चौंकाने वाले नतीजे सामने आए. इसके मुताबिक, इलाज बीच में छोड़ने वाले 35% मरीजों की मौत छह महीने में हो गई. हालांकि, 77% मरीज बाद में किसी अन्य अस्पताल पहुंचे, जिनमें से अधिकतर को सरकारी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ा. अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता और वेल्लोर सीएमसी के ट्रॉमा सर्जरी डॉ. जोसेस डैनी जेम्स ने बताया कि अक्सर यह देखा गया है कि अस्पतालों के मोटे बिल की वजह से परिजन मरीज को प्राइवेट की जगह सरकारी हॉस्पिटल में भर्ती कराना बेहतर समझते हैं लेकिन क्या ये ट्रॉमा सेंटर में भर्ती मरीजों पर भी लागू होता है या नहीं, यह जानने के लिए हमने यह शोध किया.

बीच में इलाज छोड़ने वालों में बढ़ा मौत का खतरा

इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने निजी अस्पतालों के ट्रॉमा सेंटर में भर्ती 2486 मरीजों के दस्तावेजों की समीक्षा की. इसमें पता चला कि करीब 42 प्रतिशत परिजन पैसे की कमी की वजह से अपने मरीजों को लेकर घर चले गए. शोध में चिकित्सकों ने यह भी पाया कि दिमाग और रीढ़ की हड्डी की चोट वाले जिन मरीजों को ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया उन्होंने सबसे अधिक बीच में इलाज छोड़ दिया. इससे उनकी मौत का जोखिम करीब दो से तीन गुना बढ़ गया.

अध्ययन के अनुसार, जिन मरीजों ने बीच में इलाज छोड़ा, उनमें से 35 प्रतिशत की अगले छह महीने में मौत हो गई. हालांकि, 65 प्रतिशत मरीज कुछ दिन बाद दोबारा हॉस्पिटल में भर्ती हुए है लेकिन उनमें से 54% मरीजों ने सरकारी अस्पताल को चुना.

Advertisement

सरकार बढ़ाए कदम, सभी ट्रॉमा सेंटर का हो अध्ययन

डॉ. जोसेस डैनी जेम्स ने कहा, "यह समस्या सिर्फ एक निजी अस्पताल तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में गंभीर ट्रॉमा और बीमारियों के इलाज में बड़ी चुनौती है. सरकार को सभी ट्रॉमा सेंटरों पर ऐसे अध्ययन कराने चाहिए और आर्थिक सहयोग बढ़ाना चाहिए, अगर ऐसा नहीं हुआ तो गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए इलाज अधूरा छोड़ना मजबूरी बन सकता है."

Featured Video Of The Day
Syed Suhail | Iran Israel War | Bharat Ki Baat Batata Hoon: क्या अटैक में Netanyahu की मौत? Khamenei
Topics mentioned in this article