आज Ola, Uber, Rapido पर कैब मिलना मुश्किल! टैक्सी यूनियनों ने किया हड़ताल का ऐलान, जानिए मांगें क्या?

आज पूरे देश में ऐप-आधारित टैक्सी ड्राइवरों ने हड़ताल बुलाई है. यह हड़ताल गिरती कमाई, मनमाने किराए और बढ़ते शोषण के खिलाफ है. यूनियनों का आरोप है कि सरकारें मोटर व्हीकल एग्रीगेटर गाइडलाइंस-2025 के अनुसार न्यूनतम बेस किराया तय नहीं कर रही हैं, जिससे कंपनियां अपनी मर्जी से किराया घटा देती हैं.

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  • ओला, उबर, रैपिडो और अन्य ऐप ड्राइवरों ने बढ़ते शोषण और कम होती आय के विरोध में राष्ट्रव्यापी हड़ताल की है.
  • तेलंगाना गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन, इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स ने हड़ताल बुलाई है.
  • केंद्र और राज्य सरकारें अब तक मोटर व्हीकल एग्रीगेटर गाइडलाइंस के तहत न्यूनतम बेस किराया तय नहीं कर पाई हैं.
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ओला, उबर, रैपिडो, पोर्टर और अन्य ऐप सेवाओं से जुड़े ड्राइवरों ने आज यानी 7 फरवरी को पूरे देश में हड़ताल घोषित की है. यह हड़ताल कम होती आय और बढ़ते शोषण के खिलाफ की जा रही है. हड़ताल का आयोजन तेलंगाना गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन (TGPWU) और इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स (IFAT) कर रहे हैं.

यूनियनों का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकारें अब तक न्यूनतम बेस किराया तय नहीं कर पाई हैं, जबकि यह मोटर व्हीकल एग्रीगेटर गाइडलाइंस, 2025 में लिखा हुआ है. इसी वजह से ऐप कंपनियां अपनी मर्जी से किराए कम कर देती हैं, जिससे ड्राइवरों की कमाई लगातार घट रही है.

TGPWU के अध्यक्ष शैक सलाहुद्दीन ने कहा कि सरकार की लापरवाही से कंपनियों को किराया मनमाने ढंग से तय करने की खुली छूट मिल गई है.

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पहले डिलीवरी पार्टनर्स ने की थी हड़ताल

इससे पहले 31 दिसंबर 2025 को भी डिलीवरी वर्कर्स ने हड़ताल की थी. उनका कहना था कि घंटों काम करने के बाद भी उन्हें बहुत कम पैसे मिलते हैं और कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है. इस मामले पर एक AAP सांसद ने भी कहा था कि स्विगी, जोमैटो, ब्लिंकिट, जेप्टो, ओला और उबर जैसी बड़ी कंपनियों की सफलता के पीछे यही वर्कर्स हैं, लेकिन सबसे ज्यादा दबाव और परेशानी इन्हीं को झेलनी पड़ रही है.

मुंबई में भी ऐप टैक्सी और ऑटो ड्राइवर हड़ताल पर

महाराष्ट्र कामगार सभा से जुड़े ऐप टैक्सी और ऑटो रिक्शा चालक भी 7 फरवरी को एक दिन की राष्ट्रव्यापी हड़ताल करेंगे. उनकी मुख्य मांगें हैं- अवैध बाइक टैक्सी सेवाओं पर रोक, ऐप कंपनियों की मनमानी किराया नीति पर कार्रवाई और पैनिक बटन से जुड़ी समस्याओं का समाधान.

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ड्राइवरों का कहना है कि पैनिक बटन लगाने के लिए उन पर अतिरिक्त खर्च डाल दिया गया है. केंद्र सरकार ने 140 कंपनियों को मंजूरी दी है, लेकिन राज्य सरकार ने उनमें से करीब 70% को अनधिकृत बता दिया है. इसके चलते ड्राइवरों को पुराने डिवाइस हटाकर नए लगवाने पड़ रहे हैं, जिन पर लगभग ₹12,000 का खर्च आ रहा है.

इसके अलावा, खुली परमिट नीति से ऑटो रिक्शों की संख्या बढ़ने से उनकी आय घट गई है. साथ ही, अवैध बाइक टैक्सियों से होने वाले हादसों में पीड़ितों को बीमा लाभ भी नहीं मिलता,

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(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
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