महिला आरक्षण बिल पर ‘ना’: क्या अखिलेश यादव की रणनीति अमित शाह के राजनीतिक दांव में उलझ गई?

महिला आरक्षण बिल के विरोध से अखिलेश यादव पीडीए वोटबैंक साधने की कोशिश में हैं, लेकिन इससे शहरी और महिला वोटरों में नकारात्मक संदेश का जोखिम बढ़ा है. सत्ता पक्ष इसे “महिला विरोध” बताकर घेर सकता है, जबकि अखिलेश इसे सामाजिक न्याय की लड़ाई के रूप में पेश कर रहे हैं.

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नई दिल्ली:

शतरंज हो या राजनीति, चाल संभलकर खेलनी होती है. अमित शाह को भारतीय जनता पार्टी का 'चाणक्य' माना जाता है, वहीं अखिलेश यादव ने लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश में मजबूत प्रदर्शन करके दिखा दिया कि वह राजनीति के कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं. यह बात भी दीगर है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में इंडिया गठबंधन ने संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने के नैरेटिव के जरिए जीत हासिल की थी, लेकिन राजनीति में काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है. अब बारी थी अमित शाह की. सरकार ने लोकसभा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम से जुड़े तीन बिल पेश किए. मकसद था कि महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में 33 फीसदी आरक्षण दिया जाए, लेकिन सारे विपक्षी दलों ने विरोध कर दिया और आखिरकार बिल लोकसभा में गिर गया.

लोकसभा में गिरा बिल, अब क्या करेगी सरकार?

सदन में संविधान (131वां) संशोधन विधेयक, 2026 पर मतदान हुआ. मतदान में बिल के समर्थन में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े. लोकसभा में किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है. जब महिला आरक्षण बिल लोकसभा में गिर गया, तो परिसीमन विधेयक, 2026 और संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 को सरकार ने आगे नहीं बढ़ाया. अब सवाल है कि क्या सरकार लोकसभा और राज्यसभा दोनों का संयुक्त सत्र बुलाकर बिल पास कराएगी, हालांकि सरकार ने यह साफ नहीं किया है.

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महिला आरक्षण बिल के विरोध में सपा

महिला आरक्षण बिल पर सपा के मुखिया अखिलेश यादव अपने पिता स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव के पदचिन्हों पर चल रहे हैं. चाहे सत्ता में रहे हों या बाहर, वे महिला आरक्षण बिल में भी आरक्षण की मांग करते रहे, लेकिन कोई भी सरकार आरक्षण में आरक्षण देने को तैयार नहीं थी. 1996 में एच. डी. देवगौड़ा की सरकार में यह बिल पेश किया गया, लेकिन सरकारें आती-जाती रहीं और बिल पास नहीं हुआ. यह बिल इंद्र कुमार गुजराल की सरकार से होते हुए अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार तक पहुंचा, लेकिन बात सदन में मारपीट तक पहुंच गई. वाजपेयी सरकार के दौरान समाजवादी पार्टी के सांसदों ने इसे सदन में फाड़ डाला. बिल पेश करने पर कानून मंत्री थंबी दोरई की कमीज भी फाड़ दी गई थी. फिर यह बिल मनमोहन सिंह की सरकार में आया। उस समय आरजेडी सरकार का हिस्सा थी, तो समाजवादी पार्टी बाहर से समर्थन कर रही थी, लेकिन बिल का विरोध जारी रहा. हालांकि यह बिल राज्यसभा में पास हुआ, लेकिन लोकसभा में फंस गया.

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अखिलेश यादव क्यों करते हैं विरोध

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस बिल पर चर्चा करते हुए कहा कि बीजेपी 'नारी' को नारा बनाने की कोशिश कर रही है. उन्होंने यह भी कहा कि वे बिल के समर्थन में हैं, लेकिन सरकार की इस जल्दबाजी के पीछे छिपी साजिश का विरोध करते हैं. अखिलेश की मांग थी कि ओबीसी और अल्पसंख्यक महिलाओं को इस बिल में आरक्षण दिया जाए, जबकि अमित शाह ने जवाब दिया कि संविधान में मुस्लिमों के लिए कोई आरक्षण का प्रावधान नहीं है. वहीं अखिलेश का आरोप था कि सरकार जाति जनगणना से बचना चाहती है, तो अमित शाह ने जवाब दिया कि इस जनगणना में जाति जनगणना भी होगी. इस पर सपा के धर्मेंद्र यादव ने कहा कि जनगणना में जाति का कॉलम नहीं है. अमित शाह ने जवाब दिया कि आदमी की जाति होती है, घर की जाति नहीं होती है. अभी घरों की गणना हो रही है, उसके बाद लोगों की गणना होगी, जिसमें जाति भी शामिल रहेगी.

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आगे कुआं, पीछे खाई

देश बदल रहा है, लोगों की आकांक्षाएं बदल रही हैं. खासकर महिलाएं शिक्षा से लेकर हर क्षेत्र में बेहतर कर रही हैं. इसकी भनक अखिलेश यादव को है. उनके शासनकाल में जो कानून-व्यवस्था का हाल हुआ था, उसका खामियाजा वे करीब 10 साल से भुगत रहे हैं. योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में हत्याएं, बलात्कार, दहेज के मामले और एसिड अटैक के मामलों में कमी आई है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक, 2016 में यूपी में हत्याएं 4889 थीं, जो 2023 में घटकर 3307 हो गईं. 2016 में बलात्कार की घटनाएं 4816 थीं, जो 2023 में घटकर 3556 हो गई हैं. 2016 में दहेज हत्याएं 2473 थीं, जो 2023 में घटकर 2141 हो गई हैं. महिलाओं पर एसिड फेंकने के मामले 57 थे, जो 2023 में 31 हो गए हैं. 2016 में महिलाओं के शील भंग (लज्जा भंग की कोशिश) के मामले 11335 थे, जो 2023 में घटकर 9549 हो गए हैं.

एक तरफ अखिलेश के शासनकाल के आंकड़े हैं, तो दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ के कानून-व्यवस्था का इकबाल है कि जनसंख्या बढ़ने के बावजूद अपराध घट रहे हैं. इस बात का अहसास अखिलेश को है, लेकिन अगर वे इस बिल का समर्थन करते, तो पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) के वोटर नाराज हो सकते थे. वहीं अब बिल का विरोध करने पर 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी उन्हें “महिला विरोधी” बताकर घेर सकती है.

महिलाओं पर मुलायम की बातों की गूंज

भले मुलायम सिंह यादव नहीं रहे, लेकिन महिलाओं पर उनके बयान अभी तक प्रदेश की जनता भूली नहीं है. लोकसभा 2014 के दौरान अप्रैल में मुरादाबाद की एक रैली में उन्होंने कहा था, 'क्या बलात्कार के मामले में फांसी की सजा दी जानी चाहिए? वे लड़के हैं, उनसे गलतियां हो जाती हैं.' इसी बिल की चर्चा के दौरान बीजेपी सांसद कंगना रनौत ने भी मुलायम सिंह के पुराने बयान का जिक्र करते हुए सपा के धर्मेंद्र यादव को जवाब दिया. कंगना का कहना था कि मुलायम सिंह ने कहा था कि यह कानून नौजवानों को संसद में सीटी बजाने के लिए उकसाएगा. मुलायम सिंह ने ये भी कहा था कि महिला आरक्षण बिल के मौजूदा स्वरूप से सिर्फ बड़े घरों और शहरों की लड़कियों को फायदा मिलेगा. हमारे गांव की गरीब महिलाएं ज्यादा आकर्षक नहीं होतीं. ये सारी बातें जनता के संज्ञान में हैं.

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अखिलेश की चुनौतियां

अखिलेश यादव को यह भी डर सता रहा है कि परिसीमन से उत्तर प्रदेश की राजनीति का गणित और केमिस्ट्री बदल सकती है. परिसीमन से यूपी में 120 से ज्यादा सीटें हो सकती हैं. इससे कहीं बीजेपी को फायदा न हो जाए. हालांकि, अखिलेश यादव बड़ी चालाकी से राजनीति कर रहे हैं. पीडीए का फॉर्मूला लोकसभा चुनाव में चल गया. इंडिया गठबंधन ने 80 में से 43 सीटें जीतकर यह बता दिया कि लोकतंत्र में कोई भी सत्ता स्थायी नहीं होती और जनमत जब करवट लेता है, तो मजबूत से मजबूत राजनीतिक दीवारें ढह जाती हैं. यह भी ध्यान देने वाली बात है कि मुलायम सिंह यादव अपने राजनीतिक जीवन में कभी भी अपने बलबूते पर 36 सीटें नहीं जीत पाए थे, जो अखिलेश ने जीतकर दिखा दिया. हालांकि, लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा उपचुनाव में सपा को करारी हार का सामना करना पड़ा. लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी लगातार झारखंड को छोड़कर महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और बिहार के चुनाव जीत चुकी है. मतलब संविधान खत्म करने और आरक्षण खत्म करने का मुद्दा फिलहाल ठंडा पड़ चुका है जो कि सिर्फ यूपी में ही चल पाया.

अखिलेश की अग्नि परीक्षा

भले ही अखिलेश और विपक्ष के विरोध से बिल संसद में गिर गया है, लेकिन इसका एक जोखिम भी है. शहरी और महिला वोटर्स के एक हिस्से में नकारात्मक संदेश गया है. सत्ता पक्ष अब उन्हें “महिला विरोधी” बताकर हमला करेगा. वहीं अखिलेश यह बताने की कोशिश करेंगे कि उन्होंने पीडीए के हक के लिए बिल का विरोध किया. मतलब महिला आरक्षण बिल की दोधारी तलवार पर अखिलेश चल रहे हैं. जरा सी चूक हुई, तो इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. लेकिन अगर चालाकी से चले, तो फायदा भी हो सकता है. वहीं महिलाओं के लिए नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ सरकार के कामों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. जनधन योजना, शौचालय, मुफ्त सिलेंडर, किसान सम्मान निधि और प्रदेश में अपराध को लेकर जीरो टॉलरेंस, खासकर एंटी रोमियो स्क्वॉड. अब समय ही तय करेगा कि महिला आरक्षण बिल का विरोध अखिलेश के लिए राजनीतिक जोखिम साबित होता है या रणनीतिक बढ़त.

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