- विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव सदन में किसी सदस्य के खिलाफ लाया जा सकता है और इसका फैसला सदन की सहमति से होता है
- पिछले उदाहरणों में सदस्यों की सदस्यता समाप्त करने के लिए प्रस्ताव लाए गए थे जिनमें इंदिरा गांधी भी शामिल थीं
- सदन में प्रस्ताव लाने और सदस्यता समाप्त करने की प्रक्रिया में लोकसभा अध्यक्ष की मंजूरी अनिवार्य होती है
संसद भवन में बजट सत्र के पहले भाग के खत्म होने में केवल एक दिन बाकी है.पिछले कुछ दिनों से सदन में राहुल गांधी को लेकर बवाल मचा हुआ है.उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाने की बात हुई और अब निशिकांत दुबे ने स्पीकर को चिट्ठी लिखकर राहुल की सदस्यता खत्म करने की मांग की है.सवाल ये है कि क्या वाकई में राहुल गांधी की सदस्यता खतरे में है?
निशिकांत दुबे ने मांग की है कि उसे सब्सटेंटिव मोशन कहते हैं. इसको हिंदी में ठोस प्रस्ताव भी कहते हैं.यह प्रस्ताव किसी भी सदस्य या मंत्री द्वारा लाया जा सकता है.अभी तक इस प्रस्ताव का उपयोग जजों,सीएजी जैसे लोगों को हटाने के लिए लाया जाता रहा है.2005 में 10 सदस्यों को कैश फॉर क्यएरी के मामले में हटाया गया था.
इसी तरह विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव का भी उपयोग किसी भी सदस्य के खिलाफ किया जा सकता है यदि उनके खिलाफ ऐसा मामला बनता हो.मगर इस सबका का एक निश्चित नियम है जैसे कोई भी प्रस्ताव कोई भी सदस्य किसी और सदस्य के खिलाफ ला सकता है मगर उसे लोकसभा अध्यक्ष मंजूर करे,यदि किसी सदस्य का प्रस्ताव सदन में मंजूर नहीं होता है तो वह महज कागज का टुकड़ा है.
हर प्रस्ताव में कुछ ना कुछ दंड का प्रावधान होता है जो अधिकतम सदस्यता तक जा सकता है.पहले भी इंदिरा गांधी से लेकर कई सदस्यों को सदन से निष्कासित किया गया है और उनकी सदस्यता समाप्त हो चुकी है. मगर संसद में जो कुछ भी होता है उसमें सबसे पहले अध्यक्ष,फिर सदन की सहमति जरूरी है.यदि किसी का प्रस्ताव सदन में मंजूर नहीं होता है तो उस प्रस्ताव का कोई मतलब नहीं है.
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