अब समुद्र में भी दुश्मन की खैर नहीं, नेवी को मिलने जा रहा नया अंडरवॉटर हथियार, भारत‑जर्मनी की साझेदारी से बनेगा हेवीवेट टॉरपीडो

भारतीय नौसेना को नया अंडरवॉटर हथियार मिलने जा रहा है. जर्मन कंपनी TKMS और भारत की VEM टेक्नोलॉजीज मिलकर हैदराबाद में हेवीवेट टॉरपीडो बनाएंगी. टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के साथ हर साल 500 टॉरपीडो उत्पादन क्षमता बनेगी, जिससे नौसेना की पनडुब्बी युद्ध क्षमता और आत्मनिर्भरता बढ़ेगी.

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  • जर्मनी की टीकेएमएस कंपनी और भारत की वीईएम टेक्नोलॉजीज के बीच हेवीवेट टॉरपीडो निर्माण का बड़ा समझौता हुआ है
  • हेवीवेट टॉरपीडो आधुनिक हथियार है जो पनडुब्बी और युद्धपोतों को लंबी दूरी से निशाना बनाता है.
  • हैदराबाद में वीईएम टेक्नोलॉजीज द्वारा सालाना लगभग 500 टॉरपीडो का उत्पादन और पूरी असेंबली भारत में की जाएगी.
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भारतीय नौसेना की पनडुब्बी क्षमता को बड़ा बढ़ावा मिलने वाला है. जर्मनी की कंपनी टीकेएमएस (TKMS) और भारत की वीईएम टेक्नोलॉजीज के बीच हुए बड़े समझौते के बाद जल्द ही देश में ही हेवीवेट टॉरपीडो का उत्पादन शुरू होगा. यह आधुनिक टॉरपीडो भारतीय नौसेना की कलवरी क्लास समेत अन्य पनडुब्बियों में लगाया जाएगा.

क्या है हेवीवेट टॉरपीडो?

टॉरपीडो एक अंडरवॉटर हथियार होता है, जिसे पनडुब्बी या युद्धपोत से दागा जाता है. दुश्मन की पनडुब्बी और युद्धपोतों को निशाना बनाता है. लंबी दूरी तक हमला करने में सक्षम है. भारी वारहेड से लैस, इसलिए बेहद विनाशकारी है. इसी कारण यह किसी भी आधुनिक नौसेना के लिए बेहद महत्वपूर्ण हथियार माना जाता है.

भारत में उत्पादन, हर साल 500 टॉरपीडो की क्षमता

इस परियोजना की मुख्य जिम्मेदारी वीईएम टेक्नोलॉजीज के पास होगी, जो हैदराबाद में ही इन टॉरपीडो का निर्माण करेगी. रॉ‑मैटेरियल से लेकर असेंबली तक पूरा काम भारत में होगा. इससे देश सालाना करीब 500 टॉरपीडो बनाने की क्षमता विकसित कर सकेगा.

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तकनीक भी भारत आएगी, बड़ा कदम आत्मनिर्भरता की ओर

इस समझौते में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भी शामिल है. जर्मन कंपनी भारत को टॉरपीडो निर्माण से जुड़ी अहम तकनीक देगी. इससे भारत आधुनिक टॉरपीडो बनाने वाली दुनिया की गिनी‑चुनी क्षमताओं में शामिल होगा. भविष्य में अपग्रेड और मेंटेनेंस भी देश में ही होगा. इसके साथ ही विदेशी निर्भरता घटेगी.

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दोनों कंपनियों ने इससे पहले सितंबर 2025 में एक MOU साइन किया था. अब यह समझौता उसी प्रक्रिया का अगला चरण है. भविष्य में दोनों मिलकर जॉइंट वेंचर भी बना सकती हैं.

निर्यात का भी रास्ता खुलेगा

टॉरपीडो का बड़े पैमाने पर उत्पादन होने पर भारत भविष्य में इसे निर्यात भी कर सकता है. इससे रक्षा क्षेत्र को नया बाजार और आर्थिक लाभ मिलेगा. 

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नौसेना की युद्ध क्षमता में बड़ी उछाल

इस नई प्रणाली के आने से भारतीय नौसेना की पानी के भीतर लड़ने की क्षमता बढ़ेगी. हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक बढ़त और मजबूत होगी. पनडुब्बियों की मारक क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी.

मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत को बड़ा सहारा

यह परियोजना न सिर्फ रक्षा क्षेत्र में नई तकनीक और निवेश लाएगी, बल्कि देश में रोजगार बढ़ाएगी. स्वदेशी रक्षा उत्पादन को तेजी देगी. भारत को उन्नत समुद्री हथियार निर्माण में सक्षम बनाएगी.

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