राजकोट के इस गांव में मच्छर रोक रहे शादी, पशुओं के लिए भी लगती है मच्छरदानी

इंसानों की तो बात ही छोड़िए, बेजुबान पशुओं की हालत भी दयनीय है. पशुओं को मच्छरों से बचाने के लिए पशुपालकों को बाड़े में बड़ी-बड़ी मच्छरदानियां बांधनी पड़ रही हैं.

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  • सौराष्ट्र के वेजा गांव में मच्छरों का आतंक इतना बढ़ गया है कि गांव की सामाजिक प्रतिष्ठा प्रभावित हो रही है.
  • मच्छरों के कारण मेहमान रात में गांव में ठहरने को तैयार नहीं होते और शाम को जल्दी विदा हो जाते हैं.
  • आसपास के गांवों के लोग मच्छरों से परेशान होकर वेजा गांव में अपनी बेटियों की शादी करने से इनकार कर रहे हैं.
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राजकोट:

गुजरात के सौराष्ट्र में राजकोट के पास स्थित वेजा गांव (Veja Village) के लोग इन दिनों एक ऐसी अजीबोगरीब समस्या से जूझ रहे हैं, जो सुनने में भले ही सामान्य लगे, लेकिन ग्रामीणों के लिए नरक के समान बन गई है. इस गांव में मच्छरों (Mosquitoes) का आतंक इस कदर बढ़ गया है कि अब यह गांव की सामाजिक प्रतिष्ठा और युवाओं की शादी के आड़े भी आने लगा है.

मेहमान यहां रात रुकने को तैयार नहीं होता

गांव के स्थानीय लोगों के अनुसार, गांव में मच्छरों का प्रकोप इतना अधिक है कि कोई भी मेहमान यहां रात रुकने को तैयार नहीं होता. यदि कोई रिश्तेदार दिन में आता भी है, तो शाम होते ही मच्छरों की सेना हमला कर देती है, जिसके कारण मेहमान शाम 5 बजते ही विदा हो जाते हैं. इसका सबसे गंभीर असर गांव के युवाओं पर पड़ रहा है. मच्छरों से तंग आकर आसपास के गांवों के लोग वेजा गांव में अपनी बेटी ब्याहने को तैयार नहीं हैं, जिससे युवाओं की शादी होना मुश्किल हो गया है.

पशुपालकों को बाड़े में बड़ी-बड़ी मच्छरदानियां

इंसानों की तो बात ही छोड़िए, बेजुबान पशुओं की हालत भी दयनीय है. पशुओं को मच्छरों से बचाने के लिए पशुपालकों को बाड़े में बड़ी-बड़ी मच्छरदानियां बांधनी पड़ रही हैं. मच्छरों के कारण पशु लगातार बीमार रहते हैं और दूध का उत्पादन भी घट रहा है. इससे परेशान होकर कुछ लोगों ने तो अपना पशुधन बेचना भी शुरू कर दिया है.

ग्रामीणों का कहना है कि हम जितना कमाते हैं, उतना दवाइयों में खर्च हो जाता है. मच्छरदानियां हर 5-6 महीने में टूट जाती हैं, जिससे नया खर्च सिर पर आ जाता है. इस नरक जैसी जिंदगी से हमें कौन बचाएगा?"

गांव वालों का कहना है कि मच्छरों के इस बढ़ते आतंक के पीछे गंदा पानी और जलकुंभी (गांडी वेल) जिम्मेदार है. पिछले 7-8 वर्षों से यह समस्या बनी हुई है, लेकिन प्रशासन द्वारा इसका कोई स्थायी समाधान नहीं किया जा रहा है. प्रशासन के कर्मचारी केवल पाउडर छिड़क कर खानापूर्ति कर लेते हैं. जब शिकायत की जाती है, तो एक विभाग दूसरे विभाग पर यह कहकर जिम्मेदारी टाल देता है कि "यह क्षेत्र हमारे अधिकार में नहीं आता." फिलहाल, वेजा गांव के लोग यह सवाल कर रहे हैं कि अगर प्रशासन ही हाथ खड़े कर देगा, तो इन हजारों मच्छरों के बीच वे कैसे जिएंगे?

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