- अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच तनाव के कारण देश के कई शहरों में LPG सिलेंडर की आपूर्ति में देरी हो रही है
- केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने लोकसभा में बताया कि LPG उत्पादन पिछले 5 दिनों में 28 प्रतिशत बढ़ाया गया है
- भारत में LPG की सालाना खपत तीन करोड़ टन से अधिक है और 33 करोड़ से ज्यादा घरों में इसका कनेक्शन है
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जो जंग चल रही है, उसकी आंच अब घर-घर तक पहुंचने लगी है. देश के कई शहरों से ऐसी तस्वीरों आई हैं, जिनमें लोग गैस एजेंसी के बाहर सिलेंडर के लिए खड़े हैं. सोशल मीडिया पर कई लोगों ने दावा किया है कि बुकिंग के बावजूद 3-3, 4-4 दिन तक सिलेंडर नहीं मिल रहा है. हालांकि, सरकार का कहना है कि कोई किल्लत नहीं है.
लोकसभा में केंद्रीय पेट्रोलियम और नैचुरल गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बताया कि पिछले 5 दिनों में LPG का प्रोडक्शन 28% बढ़ाया गया है. उन्होंने कहा कि सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता है कि भारत के 33 करोड़ परिवारों की रसोई में किसी तरह की कमी न हो.
भारत में कितनी गैस की खपत?
भारत में LPG की सालाना 3 करोड़ टन से ज्यादा की खपत होती है और 33 करोड़ से ज्यादा घरों में इसका कनेक्शन है. PIB की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत अपनी जरूरत की 60% LPG बाहर से इम्पोर्ट करता है. और 40% का प्रोडक्शन भारत में ही किया जाता है. अब दिक्कत ये है कि जो LPG बाहर से इम्पोर्ट होती है, उसमें से 90% होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते से ही आती है. होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से LPG पर ही सबसे बड़ा असर पड़ेगा, क्योंकि इसके सोर्स भी लिमिटेड हैं.
LPG v/s PNG: क्या फर्क है?
खाना बनाने के लिए जो गैस इस्तेमाल होती है, उसे लिक्विड पेट्रोलियम गैस यानी LPG कहा जाता है. इसके अलावा आज के समय में पाइपलाइन के जरिए भी गैस को सीधे घरों तक पहुंचाया जाता है, वह पाइप्ड नैचुरल गैस (PNG) होती है.
अब इसमें सबसे ज्यादा दिक्कत LPG की है, PNG की फिलहाल कोई दिक्कत नहीं है. वह इसलिए क्योंकि LPG काफी हद तक लॉजिस्टिक्स पर निर्भर करती है. बनने या इंपोर्ट होने के बाद यह कई स्टेज से गुजरती है और तब जाकर घरों तक पहुंचती है. इसके उलट, PNG एक पाइपलाइन नेटवर्क के जरिए काम करती है. नैचुरल गैस प्रोडक्शन फील्ड या इंपोर्ट टर्मिनल से नेशनल गैस ग्रिड के जरिए शहर के गैस डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम तक लाया जाता है और फिर सीधे घरों के मीटर तक पहुंचती है.
LPG हमेशा सिलेंडर में ही मिलती है, जबकि PNG के लिए सिलेंडर की जरूरत नहीं है, ये सीधे पाइप से घर तक आ जाती है.
घर तक कैसे पहुंचती है गैस?
लाखों-करोड़ों घरों में खाना LPG से ही पकाया जाता है. LPG क्रूड ऑयल की रिफाइनिंग और नैचुरल गैस प्रोसेसिंग के दौरान बनती है. इसमें प्रोपेन और ब्यूटेन गैसें होती हैं, जिन्हें लिक्विड रूप में बदलकर सिलेंडर में स्टोर किया जाता है.
बनने या इंपोर्ट होने के बाद LPG को टर्मिनल पर स्टोरेज किया जाता है. यहां से इसे बॉटलिंग प्लांट भेजा जाता है. फिर सिलेंडर में भरा जाता है और डिस्ट्रीब्यूटर तक पहुंचाया जाता है. इसके बाद जाकर ये घरों तक पहुंचती है.
वहीं, PNG बस नैचुरल गैस यानी मीथेन है जो सीधे पाइपलाइन से घरों, रेस्टोरेंट और इंडस्ट्रीज तक पहुंचाई जाती है. यह सिस्टम ठीक वैसे पानी के कनेक्शन की तरह काम करता है. गैस एक अंडरग्राउंड पाइपलाइन नेटवर्क से होकर बहती है और कनेक्शन के जरिए घर तक पहुंचती है.
सरकार के मुताबिक, देशभर में 1.5 करोड़ से ज्यादा PNG कनेक्शन हैं. सरकार का लक्ष्य 2032 तक 12.63 करोड़ कनेक्शन लगाना है. अभी PNG कनेक्शन ज्यादातर दिल्ली-मुंबई जैसे बड़े शहरों में ही है. पाइपलाइन के जरिए गैस को घर-घर तक पहुंचाने के लिए 25,400 किलोमीटर लंबा नेटवर्क है. अभी 10,400 किलोमीटर की पाइपलाइन पर काम चल रहा है.














