'इंद्रेश कुमार को मालेगांव केस में गिरफ्तार करने का...' : पूर्व IPS के खुलासे को RSS ने बताया दुर्भाग्यपूर्ण

मालेगांव ब्लास्ट मामला (2006 और 2008) देश के चर्चित आतंकी मामलों में से एक रहा है, जिसकी जांच महाराष्ट्र एटीएस द्वारा की गई थी. उस समय एटीएस प्रमुख रहे के.पी. रघुवंशी ने अपनी किताब में दावा किया है कि जांच के दौरान उन्हें कुछ विशेष व्यक्तियों को आरोपी बनाने के लिए राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ा.

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  • के. पी. रघुवंशी ने अपनी जीवनी में मालेगांव ब्लास्ट मामले में राजनीतिक दबाव का खुलासा किया है.
  • रघुवंशी ने बताया कि बिना पर्याप्त सबूत गिरफ्तारी से मना करने पर उन्हें पद से हटाया गया था.
  • मालेगांव ब्लास्ट मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने कई आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी.
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पूर्व आईपीएस अधिकारी K. P. Raghuvanshi की जीवनी “Trouble Shooter” में किए गए खुलासों के बाद महाराष्ट्र की राजनीति और सुरक्षा एजेंसियों के कामकाज को लेकर नई बहस छिड़ गई है. इस किताब में दावा किया गया है कि आतंकवाद विरोधी दस्ते (ATS) के प्रमुख रहते हुए उन पर तत्कालीन यूपीए सरकार के एक मंत्री द्वारा आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार को मालेगांव ब्लास्ट मामले में गिरफ्तार करने का दबाव डाला गया था. जब सबूतों के अभाव में उन्होंने गिरफ्तार करने से मना कर दिया तो उन्हें ATS प्रमुख के पद से हटा दिया गया.

मालेगांव ब्लास्ट मामला (2006 और 2008) देश के चर्चित आतंकी मामलों में से एक रहा है, जिसकी जांच महाराष्ट्र एटीएस द्वारा की गई थी. उस समय एटीएस प्रमुख रहे के.पी. रघुवंशी ने अपनी किताब में दावा किया है कि जांच के दौरान उन्हें कुछ विशेष व्यक्तियों को आरोपी बनाने के लिए राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ा. रघुवंशी के अनुसार, पर्याप्त सबूत न होने के कारण उन्होंने कथित तौर पर गिरफ्तारी से इनकार कर दिया, जिसके बाद उन्हें पद से हटा दिया गया.

इस पूरे विवाद पर आरएसएस की ओर से प्रतिक्रिया देते हुए Vithalrao Kamble, कोंकण प्रांत ने कहा, “संघ का काम व्यक्ति निर्माण करना है. ताकि समाज देश, धर्म और संस्कृति के प्रति जागरूक रहे. उस समय उन पर दबाव था या सरकार ने क्या किया, इस पर अब वे खुलकर बोल पा रहे हैं. उन्होंने अपनी किताब में भी इसका जिक्र किया है. लेकिन जो कुछ उस समय हुआ, वह दुर्भाग्यपूर्ण था… इस विषय पर अभी ज्यादा टिप्पणी नहीं करना चाहता.”

RSS ने सीधे तौर पर आरोपों पर विस्तृत टिप्पणी करने से बचते हुए इसे “दुर्भाग्यपूर्ण घटना” बताया. मालेगांव में हुए बम धमाकों की जांच कई चरणों में हुई. शुरुआत में जांच एजेंसियों ने अलग-अलग एंगल से जांच की, जिसमें कथित “हिंदू आतंकवाद” का मुद्दा भी सामने आया. बाद में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने भी इस मामले की जांच की और कई आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की.

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इस केस में कई बार जांच की दिशा और आरोपों को लेकर विवाद हुआ, जिसमें राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप भी समय-समय पर उठते रहे. मुंबई की एक विशेष National Investigation Agency (NIA) अदालत ने 31 जुलाई 2025 को 2008 के Malegaon बम विस्फोट मामले में सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया. अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष के मामले में पर्याप्त सबूतों की कमी और कई असंगतियां थीं.

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इन आरोपियों में Pragya Singh Thakur और Lt Col Prasad Purohit भी शामिल थे, जिन्हें UAPA, IPC और आर्म्स एक्ट के तहत लगाए गए सभी आरोपों से बरी कर दिया गया. पूर्व आईपीएस अधिकारी के इस दावे ने एक बार फिर से यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आतंकवाद जैसे संवेदनशील मामलों की जांच पूरी तरह निष्पक्ष रहती है या उस पर राजनीतिक प्रभाव पड़ता है.

“Trouble Shooter” में किए गए खुलासों ने पुराने घावों को फिर से हरा कर दिया है. हालांकि इन दावों की सत्यता की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन इसने एक बार फिर मालेगांव ब्लास्ट केस, ATS की भूमिका और राजनीतिक दबाव जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है.

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