'ज्ञान कहीं से भी आए, व्हॉट्सएप यूनिवर्सिटी से नहीं', सबरीमाला मामले में जस्टिस नागरत्ना ने ऐसा क्यों कहा

सबरीमला मामले में 9 जजों की संविधान पीठ में आठवें दिन सुनवाई के दौरान ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ का जिक्र हुआ. जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी जैसे स्रोतों से मिली जानकारी स्वीकार्य नहीं.

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नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला समेत धार्मिक प्रथाओं से जुड़े मामलों पर गठित 9 जजों की संविधान पीठ में लगातार आठवें दिन सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान गुरुवार को बहस के बीच एक हल्का‑फुल्का लेकिन अहम पल भी आया, जब 'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' का जिक्र अदालत में हुआ.

'ज्ञान कहीं से भी आए, उसे खारिज नहीं किया जाना चाहिए'

दरअसल, दाऊदी बोहरा समुदाय में बहिष्कार की प्रथा को चुनौती देने वाले मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल अपनी दलीलें रख रहे थे. बहस के दौरान कौल ने कहा कि ज्ञान और समझ किसी भी स्रोत से आए, उसे खारिज नहीं किया जाना चाहिए. उनका तर्क था कि विचारों और सूचनाओं का मूल्य उनके स्रोत से नहीं, बल्कि उनकी उपयोगिता से तय होना चाहिए.

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'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की जानकारी को स्वीकार नहीं किया जा सकता'

इस पर जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने मुस्कुराते हुए टिप्पणी की कि 'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' से मिलने वाली जानकारी को स्वीकार नहीं किया जा सकता. अदालत में इस टिप्पणी पर हल्की हंसी भी सुनाई दी.

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शशि थरूर के लेख का जिक्र

नीरज किशन कौल ने अपनी दलीलों के समर्थन में कांग्रेस सांसद शशि थरूर द्वारा लिखे गए एक लेख का भी हवाला दिया, जिसमें धार्मिक मामलों में न्यायिक संयम बरतने पर जोर दिया गया था. इस पर भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अदालत सभी विद्वानों और लेखकों का सम्मान करती है, लेकिन कोई भी लेख अंततः व्यक्तिगत राय होता है और वह न्यायालय पर बाध्यकारी नहीं हो सकता.

मुख्य न्यायाधीश की इस टिप्पणी के जवाब में कौल ने कहा कि ज्ञान किसी भी देश, विश्वविद्यालय या स्रोत से आए, उसे स्वीकार किया जाना चाहिए. उन्होंने दलील दी कि भारतीय सभ्यता इतनी प्राचीन और समृद्ध है कि उसने हमेशा हर तरह के ज्ञान और विचारों को आत्मसात किया है.

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कोर्ट में 'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' पर नोंकझोक

इस पर जस्टिस नागरत्ना ने फिर हस्तक्षेप करते हुए कहा, 'लेकिन व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से नहीं.' इसके जवाब में कौल ने स्पष्ट किया कि वह किसी खास स्रोत की गुणवत्ता पर सवाल नहीं उठा रहे, बल्कि सिर्फ यह कहना चाहते हैं कि सूचना और ज्ञान जहां से भी मिले, उस पर खुले मन से विचार किया जाना चाहिए.

गौरतलब है कि नौ जजों की यह संविधान पीठ धर्म, आस्था, धार्मिक स्वतंत्रता और समानता से जुड़े कई अहम संवैधानिक सवालों पर सुनवाई कर रही है, जिनमें सबरीमाला मंदिर, दाऊदी बोहरा समुदाय की बहिष्कार प्रथा और अन्य धार्मिक परंपराएं शामिल हैं. 

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