चौमासी-सोनप्रयाग के बीच जल्द ही फर्राटे भरेगी गाड़ियां, सुरंग को मंजूरी, भीमवाली के लिए भी खुशखबरी

हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता और उत्तराखंड के भूकंपीय ज़ोन 5 (रिपोर्टों में ज़ोन 6 की गंभीरता के समान) में होने के कारण, इन सभी परियोजनाओं के लिए भू-वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की सलाह को अनिवार्य बनाया गया है.

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  • केदारनाथ धाम की यात्रा को सुगम बनाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार बुनियादी ढांचे में बदलाव कर रही है.
  • सोनप्रयाग से केदारनाथ तक 12.9 किलोमीटर लंबा रोपवे बन रहा है, जो प्रति घंटे 1800 यात्रियों को पहुंचाएगा.
  • दिल्ली में हुई बैठक में एनएच चौमासी से सोनप्रयाग तक 7 किलोमीटर लंबी सुरंग बनाने का प्रस्ताव स्वीकृत हुआ है.
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केदारनाथ धाम की यात्रा को सुगम और सुरक्षित बनाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार बड़े स्तर पर बुनियादी ढांचे में बदलाव कर रही है. श्रद्धालुओं की लगातार बढ़ती संख्या और 2013 की त्रासदी के कड़वे अनुभवों को देखते हुए, अब केवल एक मार्ग पर निर्भर रहने के बजाय वैकल्पिक रास्तों और आधुनिक तकनीकों पर जोर दिया जा रहा है. इसी क्रम में सोनप्रयाग से केदारनाथ तक 12.9 किलोमीटर लंबे रोपवे का निर्माण किया जा रहा है, जिसकी क्षमता प्रति घंटे 1800 यात्रियों को धाम पहुंचाने की होगी. यह रोपवे न केवल यात्रा का समय कम करेगा, बल्कि पैदल चलने में असमर्थ श्रद्धालुओं के लिए एक सुरक्षित विकल्प भी बनेगा.

7 किलोमीटर लंबी सुरंग बनाने के प्रस्ताव पर मुहर

सुरक्षा के दृष्टिकोण से सबसे महत्वपूर्ण कदम सुरंग निर्माण और वैकल्पिक पैदल मार्गों का विकास है. हाल ही में 29 दिसंबर 2025 को दिल्ली में हुई उच्च स्तरीय बैठक में एनएच चौमासी से सोनप्रयाग तक करीब 7 किलोमीटर लंबी सुरंग बनाने के प्रस्ताव पर मुहर लग गई है. हालांकि, रोपवे के निर्माण को देखते हुए सीतापुर से गौरीकुंड तक टू-लेन सड़क के प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया है.

इसके अतिरिक्त, भूस्खलन और पहाड़ों से गिरते पत्थरों (शूटिंग स्टोन्स) से यात्रियों को बचाने के लिए पैदल मार्ग पर 5 मीटर की एक छोटी सुरंग बनाने की योजना भी तैयार की गई है. प्रशासन का उद्देश्य नदी के किनारों से दूर एक ऐसा सुरक्षित पैदल रास्ता (चौमासी-भीमबली-लिनचोली) विकसित करना है, जिसे आपदा की स्थिति में या ट्रैकिंग के शौकीनों के लिए उपयोग में लाया जा सके.

हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता और उत्तराखंड के भूकंपीय ज़ोन 5 (रिपोर्टों में ज़ोन 6 की गंभीरता के समान) में होने के कारण, इन सभी परियोजनाओं के लिए भू-वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की सलाह को अनिवार्य बनाया गया है. गौरतलब है कि 2013 की आपदा से पहले केदारनाथ का पैदल मार्ग 14 किलोमीटर का था, जो आपदा के बाद बढ़कर 21 किलोमीटर (गौरीकुंड-लिनचोली होकर) हो गया था.

हालांकि, 2025 में रामबाड़ा से गरुड़चट्टी वाले पुराने मार्ग को भी बहाल कर दिया गया है. इन नई सुरंगों और वैकल्पिक मार्गों के बन जाने से केदारनाथ यात्रा न केवल सुगम होगी, बल्कि किसी भी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में राहत और बचाव कार्यों के लिए एक मजबूत 'बैकअप प्लान' भी तैयार रहेगा.

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