ऑनर क्राइम्स पर सख्ती! कर्नाटक सरकार का नया विधेयक, वयस्कों को पसंद की शादी में सुरक्षा की गारंटी

Eva Nammava Eva Nammava Bill 2026 Karnataka: कर्नाटक सरकार ने वयस्कों की शादी की पसंद की रक्षा के लिए नया विधेयक पेश किया. ऑनर क्राइम को सार्वजनिक अपराध घोषित किया गया.

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Karnataka News: ऑनर क्राइम्स पर सख्ती! कर्नाटक सरकार का नया विधेयक, वयस्कों को पसंद की शादी में सुरक्षा की गारंटी

Eva Nammava Eva Nammava Bill 2026: कर्नाटक सरकार (Karnataka Government ) ने वयस्कों की शादी की स्वतंत्रता की रक्षा और तथाकथित ‘ऑनर क्राइम' पर रोक लगाने के लिए एक अहम कदम उठाया है. राज्य सरकार ने विधानसभा में “कर्नाटक फ्रीडम ऑफ चॉइस इन मैरिज एंड प्रिवेंशन एंड प्रोहीबिशन ऑफ क्राइम्स इन द नेम ऑफ ऑनर एंड ट्रेडिशन (The Karnataka Freedom of Choice in Marriage and Prevention and Prohibition of Crimes in the Name of Honour and Tradition Bill 2026) (ईवा नम्मवा ईवा नम्मवा) विधेयक, 2026” पेश किया है. यह विधेयक वयस्कों के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के साथ‑साथ ऑनर क्राइम्स, उत्पीड़न और सामाजिक बहिष्कार जैसी घटनाओं पर सख्त कानूनी कार्रवाई का रास्ता खोलता है.

Eva Nammava Eva Nammava Bill 2026: कर्नाटक सरकार के नए बिल में क्या है?

संविधान के अधिकारों पर आधारित कानून

इस प्रस्तावित कानून में संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के साथ‑साथ मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 का हवाला दिया गया है. विधेयक स्पष्ट करता है कि हर वयस्क को अपनी पसंद से विवाह करने का पूर्ण अधिकार है और इसमें परिवार, जाति, समुदाय या किसी भी सामाजिक समूह का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं होगा. सरकार का कहना है कि यह कानून उन लगातार सामने आ रही घटनाओं की पृष्ठभूमि में लाया गया है, जिनमें अंतर‑जातीय विवाह करने वाले जोड़ों खासकर महिलाएं और हाशिए के समुदाय को हिंसा, धमकी और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है.

‘ऑनर क्राइम' को सार्वजनिक अपराध घोषित करने का प्रावधान

विधेयक की सबसे अहम बात यह है कि ऑनर के नाम पर होने वाले अपराधों को निजी पारिवारिक मामला नहीं बल्कि सार्वजनिक अपराध माना जाएगा. इन अपराधों में शारीरिक हिंसा, हत्या और अपहरण, सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार, धमकी, उत्पीड़न और बंधक बनाना, संपत्ति से बेदखली या विरासत से इंकार और जबरन गर्भपात या दोबारा शादी के लिए दबाव शामिल होंगे. इसके अलावा, किसी विवाह को जाति या परंपरा के खिलाफ बताकर उसके विरोध में पांच या उससे अधिक लोगों की अवैध सभा को भी अपराध की श्रेणी में रखा गया है.

वयस्क जोड़ों को कानूनी सुरक्षा

विधेयक की धारा 3 के तहत यह सुनिश्चित किया गया है कि वयस्क जोड़े अपनी शादी का फैसला खुद ले सकते हैं. कानून में कहा गया है कि इस फैसले में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप दंडनीय अपराध माना जाएगा. जोड़े चाहें तो जिला मजिस्ट्रेट को विवाह की मंशा से जुड़ा एक घोषणा‑पत्र दे सकते हैं, जिससे उन्हें पुलिस सुरक्षा मिल सके और किसी तीसरे पक्ष की शिकायत से सुरक्षा मिल सके.

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कोर्ट से तुरंत सुरक्षा आदेश का प्रावधान

प्रस्तावित कानून के तहत अदालतों को यह अधिकार होगा कि वे तत्काल सुरक्षा आदेश जारी करें. इन आदेशों के उल्लंघन पर दो साल तक की जेल और एक लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है.

सेफ हाउस, हेल्पलाइन और सख्त टाइमलाइन

विधेयक में राज्य की जिम्मेदारियों को भी स्पष्ट किया गया है. इसके तहत हर जिले में सुरक्षित सेफ हाउस बनाए जाएंगे. 24×7 हेल्पलाइन और विशेष पुलिस सेल गठित होंगे. पुलिस को 6 घंटे के भीतर कार्रवाई करनी होगी. मामलों की जांच 60 दिनों में पूरी करनी अनिवार्य होगी. यदि कोई सरकारी अधिकारी ऐसे अपराधों की सूचना मिलने के बावजूद कार्रवाई नहीं करता, तो उसके खिलाफ विभागीय व कानूनी कार्रवाई का प्रावधान भी मौजूद है.

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फास्ट‑ट्रैक कोर्ट से मिलेगी त्वरित न्याय

त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए विधेयक में विशेष फास्ट‑ट्रैक अदालतों की स्थापना का प्रस्ताव है. इन अदालतों में मामलों की दो महीने के भीतर सुनवाई और फैसला करने का लक्ष्य रखा गया है. हाईकोर्ट में अपील 90 दिन के भीतर दाखिल की जा सकेगी, जिसे तीन महीने के अंदर निपटाने की समयसीमा तय की गई है.

‘ईवा नम्मवा' मॉडल से सामाजिक समावेशन पर जोर

इस कानून में “ईवा नम्मवा” यानी “हमारे लोग” की अवधारणा पेश की गई है, जिसका उद्देश्य सामाजिक समरसता और भाईचारे को बढ़ावा देना है.
इसके तहत “ईवा नम्मवा वेदिके” नाम से जिला‑स्तरीय समितियां बनाई जाएंगी, जिनमें अधिकारी और विशेषज्ञ शामिल होंगे. ये समितियां अंतर‑जातीय विवाह में सहायता, काउंसलिंग सपोर्ट, जोखिम वाले इलाकों की पहचान जागरूकता अभियान और NGOs के साथ समन्वय जैसे कार्य करेंगी.

सामाजिक बदलाव की दिशा में अहम पहल

सरकार का मानना है कि यह विधेयक सिर्फ कानून नहीं, बल्कि समानता, स्वतंत्रता और गरिमा के संवैधानिक मूल्यों को सामाजिक स्तर पर मजबूत करने की कोशिश है. बिल पर आने वाले दिनों में सदन में चर्चा होना तय है, लेकिन इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.

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