जवान बेटे की हत्या, लाखों का कर्ज और ब्लड कैंसर... नक्सलियों के अत्याचार और परिवार के तबाह होने की कहानी

झीरम आज भी वहीं है… जंगल भी… रास्ते भी… लेकिन एक मां की जिंदगी… वहीं रुक गई है… मनोज मंझला बेटा था ... बड़ी बिटिया ब्याह कर अपने ससुराल चली गई, छोटा बेटा अब घर संभालता है ... वो खुद कैंसर से जूझ रही हैं .... लेकिन उन्हें अब भी लगता है ... दरवाज़ा खुलेगा… और एक आवाज आएगी ... “मम्मी… खाना दे दो…”

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नक्सल मुक्त भारत की मुहिम के बीच पढ़ें- झीरम घाटी नरसंहार की सबसे दर्दनाक कहानी.
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  • 25 मई 2013 को झीरम घाटी में नक्सलियों ने कांग्रेस नेताओं के काफिले पर हमला कर 32 लोगों की हत्या की थी.
  • मनोज जोशी, जो उस हमले में मारे गए, की मां रंभा देवी आज भी बेटे की आखिरी बातचीत को याद करती हैं.
  • मनोज की लाल बोलेरो आज भी झीरम घाटी में मलबे में पड़ी है, जो उस दिन की याद दिलाती है.
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सुकमा:

कभी-कभी खबर सिर्फ खबर नहीं होती… वो एक अधूरी पुकार होती है… जो सालों बाद भी जंगलों में गूंजती रहती है… छत्तीसगढ़ के सुकमा की झीरम घाटी… जहां 25 मई 2013 को गोलियों की आवाज थम गई… लेकिन एक मां की प्रतीक्षा आज भी खत्म नहीं हुई.

रंभा देवी जोशी… जिनका बेटा मनोज जोशी उस हमले में मारा गया… वो आज भी उसी आखिरी बातचीत में अटकी हुई हैं… “मम्मी, मैं जगदलपुर जा रहा हूं…” और फिर… सन्नाटा…

झीरम घाटी हत्याकांड में अपनी जान गंवाने वाले मनोज जोशी.

13 साल बीत गए… लेकिन एक मां आज भी दरवाज़े की ओर देखती है… जैसे अभी वो आएगा… और कहेगा ... “मम्मी, जल्दी से खाना दे दो…”
झीरम के उसी जंगल में… जहां कभी उसका बेटा जिंदा था… आज भी उसकी लाल बोलेरो मलबे में खड़ी है… जैसे वक्त वहीं रुक गया हो…
लेकिन ये कहानी सिर्फ शहादत की नहीं है… ये कहानी उस अकेलेपन की भी है… जो शहादत के बाद घर में उतर आता है… मुआवजा चला गया… नौकरी चली गई…

और मां के हिस्से बची सिर्फ यादें… और इंतज़ार…

NDTV ने झीरम घाटी में पहुंचकर रंभा देवी जोशी से बात की… सुना उस मां को… जो आज भी अपने बेटे को वर्तमान में जीती है… अतीत में नहीं…

झीरम घाटी… जहां आज भी हवा में एक अजीब सा सन्नाटा तैरता है… जैसे जंगल ने सब कुछ देख लिया हो… लेकिन कुछ भी कहा न हो.
25 मई 2013 की उस दोपहर को गोलियों की आवाज थम गई थी… लेकिन एक मां की दुनिया वहीं थम गई… उसी क्षण में…

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रंभा देवी जोशी… एक मां… जो आज भी अपने बेटे मनोज को वर्तमान में जीती हैं… अतीत में नहीं. “मेरा बेटा सुबह उठा था… मुझसे कहा ... मम्मी, जगदलपुर जा रहा हूं… बस यही आखिरी बात थी…”

झीरम घाटी हत्याकांड में जवान बेटे मनोज को खोने वाली मां रंभा देवी जोशी से बात करते NDTV पत्रकार अनुराग द्वारी.

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वह रुकती हैं… सांस संभालती हैं… “मैं उसका चेहरा भी आखिरी बार नहीं देख पाई… आज भी लगता है… वो आएगा… और कहेगा ... मम्मी, जल्दी से खाना दे दो…”

मनोज… जिसकी शादी को उस दिन सिर्फ 24 दिन हुए थे… 1 मई को शादी हुई… और 25 मई को झीरम ने उसे छीन लिया.

रंभा देवी बताती हैं, “वो जगदलपुर जा रहा था… लेकिन दरभा के कुछ लोग उसे जबरन सुकमा की जनसभा में ले गए… जाते समय उसकी गाड़ी में बैठे… और लौटते वक्त उतर गए… मेरे बेटे से कहा तुम गाड़ी लेकर सबसे आगे चलो…”

और फिर… वही हुआ जो आज भी इस जंगल की मिट्टी में दर्ज है…

झीरम में सबसे पहले उनके बेटे की गाड़ी को उड़ाया गया… उसका शरीर बांस के सहारे ऊपर लटक रहा था… वो जिंदा था…  पानी पास ही था… लेकिन कोई उसे पानी नहीं दे सका… फिर नक्सलियों ने उसे गोलियों से छलनी कर दिया…

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यह कहते-कहते उनकी आवाज टूट जाती है… “मैं तीन दिन तक होश में नहीं थी… मैं कुछ नहीं कर पाई…”

यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती… असल दर्द तो उसके बाद शुरू हुआ…

मनोज ने सपने देखे थे… “मैं कुछ भी करके कमा लूंगा… टैक्सी चला लूंगा… इसी जिद में उसने एक लाल बोलेरो खरीदी थी…

लेकिन लोन अधूरा रह गया… और फिर… एक मां ने वो कर्ज भी चुकाया…

“लगभग 10 साल तक मैंने उसकी किस्त भरी… बहुत मुश्किल से… धीरे-धीरे करके… मैं हर दफ्तर गई कलेक्टर, मंत्री लेकिन वहां बाबुओं ने भगा दिया बोली मदद पत्नी को मिलेगी”

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हर किस्त… एक मां के टूटते हुए दिल की कीमत थी…

लेकिन जिंदगी ने यहां भी राहत नहीं दी… “13 लाख रुपए मिले थे… सब बहू ले गई… नौकरी भी उसी को मिल गई… मेरे खाते में पांच हजार आए… वो भी उसने निकाल लिए…”

रंभा देवी की आंखें भर आती हैं, “वो मेरे घर सिर्फ 25 दिन रही थी… एक मां के हिस्से सिर्फ दर्द रह गया…”

वह पूछती हैं, “अब भी वहां मेरी लाल बोलेरो है क्या…?”

जैसे वो गाड़ी नहीं… उनका बेटा वहीं खड़ा हो… उनका इंतज़ार करता हुआ…

झीरम घाटी हत्याकांड वाले जगह पर आज भी मनोज जोशी के लाल बोलेरो का मलबा पड़ा है.

आज… रंभा देवी खुद एक और लड़ाई लड़ रही हैं, ब्लड कैंसर से. “दो साल से हर महीने खून चढ़ता है… बेटे के जाने के बाद से मैं कभी ठीक नहीं रही…”

उनकी आवाज में थकान है… लेकिन यादों में नहीं… हर त्योहार… हर रात… हर सुबह…
मनोज उनके साथ है… वो कहती हैं, राखी, होली, दीपावली हर त्योहार में उसकी याद आती है फिर उनकी आंखों से आंसू बह निकले ... एक मां का कलेजा जैसे आंखों से उतर आया ....

झीरम घाटी के उसी इलाके में… दुर्गा मंदिर है… जहां शाम ढल रही है… मां दुर्गा की प्रतिमा के सामने एक मां चुपचाप बैठी हैं… मंदिर में कुछ श्रद्धालु आते हैं ... वो बस नम आंखों से सबको देखती हैं ...

झीरम घाटी इलाके में स्थित वो मंदिर, जहां अक्सर मनोज की मां बैठकर रोती हैं.

इसी मंदिर के पास बना शहीद स्मारक … जहां अंदर जाने के लिए हिम्मत जुटानी पड़ती है… हर तस्वीर… एक कहानी कहती है… और उन्हीं तस्वीरों के बीच… मनोज जोशी की तस्वीर भी टंगी है…

हमने पूछा “नक्सली खत्म हो रहे हैं, आप कुछ कहना चाहती हैं … उन्होंने कहा ... न्याय मुझे व्यक्तिगत तौर पर कुछ नहीं मिला… सरकार की तरफ से अभी भी कोई मुआवजा मुझे नहीं मिला… अगर कुछ भरण-पोषण के लिए मिलता… या मेरे छोटे बेटे को नौकरी मिलती… तो मुझे सहारा मिलता…

लेकिन अगर नक्सलवाद खत्म हो रहा है… तो ये अच्छा है… जो भी सरकार कर रही है, ठीक कर रही है… ताकि मेरी तरह किसी और मां को रोना न पड़े…

बस यही चाहती हूं… जो जवानों के मां-बाप, बच्चे, पत्नी अनाथ हो रहे हैं… उन्हें राहत मिले… इसलिए मुझे इसमें खुशी है…”

रंभा देवी उसी मंदिर में बैठकर बात कर रही थीं… धीरे-धीरे… दीवार से टिककर हाथ जोड़े हुए ... “मुझे रातभर नींद नहीं आती… आंखों के सामने वही दृश्य घूमता रहता है…”

झीरम आज भी वहीं है… जंगल भी… रास्ते भी… लेकिन एक मां की जिंदगी… वहीं रुक गई है… मनोज मंझला बेटा था ... बड़ी बिटिया ब्याह कर अपने ससुराल चली गई, छोटा बेटा अब घर संभालता है ... वो खुद कैंसर से जूझ रही हैं .... लेकिन उन्हें अब भी लगता है ... दरवाज़ा खुलेगा… और एक आवाज आएगी ... “मम्मी… खाना दे दो…”

झीरम घाटी हत्याकांड के शहीदों की याद में बना शहीद स्मारक.

झीरम घाटी में कांग्रेस नेताओं के काफिल पर हुए हमले पर गई थी 36 लोगों की जान

मालूम हो कि 25 मई 2013 को झीरम घाटी का इलाका एक कत्लेआम का मैदान बन गया था. नक्सलियों ने कांग्रेस की ‘परिवर्तन यात्रा' से लौट रहे नेताओं के काफिले पर घात लगाकर हमला किया था और अंधाधुंध फायरिंग में 32 लोगों की जान चली गई थी. इनमें महेंद्र कर्मा, नंद कुमार पटेल और विद्याचरण शुक्ल जैसे बड़े नेता शामिल थे. यह हमला सिर्फ एक नरसंहार नहीं था, बल्कि उस दौर में बस्तर पर नक्सलियों की पकड़ और ताकत का खुला प्रदर्शन भी था.

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