झारखंड हाई कोर्ट ने पति-पत्नी के संबंधों पर अपने फैसले में धार्मिक ग्रंथों को दिया हवाला

न्यायमूर्ति सुभाष चंद ने 25 पन्नों के आदेश में उच्चतम न्यायालय के फैसलों को उद्धृत करते हुए इस बारे में विचार व्यक्त किया कि भारत में महिलाएं किस तरह शादी के बाद पति के परिवार में रहने आती हैं.

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न्यायमूर्ति चंद ने अपने आदेश में ऋग्वेद, यजुर्वेद, मनुस्मृति के उद्धरणों का भी वर्णन किया.
रांची:

झारखंड उच्च न्यायालय ने एक महिला के अपने पति से गुजारा-भत्ता मांगने से जुड़े मामले में आदेश सुनाते हुए धार्मिक ग्रंथों का उल्लेख किया है. फैसले में न केवल पति और पत्नी के वैयक्तिक संबंधों की बात की गई है, बल्कि विवाहित दंपतियों के अधिकारों तथा कर्तव्यों का भी उल्लेख किया गया है.

न्यायमूर्ति सुभाष चंद ने 25 पन्नों के आदेश में उच्चतम न्यायालय के फैसलों को उद्धृत करते हुए इस बारे में विचार व्यक्त किया कि भारत में महिलाएं किस तरह शादी के बाद पति के परिवार में रहने आती हैं. न्यायमूर्ति चंद ने अपने आदेश में ऋग्वेद, यजुर्वेद, मनुस्मृति के उद्धरणों का भी वर्णन किया और टेरेसा चाको की पुस्तक ‘इंट्रोडक्शन ऑफ फेमिली लाइफ एजुकेशन' का भी हवाला दिया.

उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों में बेटा शादी के बाद अपने परिवार से अलग हो जाता है, लेकिन भारत में ऐसा नहीं है. शीर्ष अदालत के एक फैसले का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति चंद ने कहा कि पत्नी को विवाह के बाद अपने पति के परिवार के साथ रहना होता है, जब तक उनके अलग होने का कोई मजबूत न्यायोचित कारण नहीं हो.

मामला रुद्र नारायण राय द्वारा हाल में दायर याचिका से जुड़ा है जिसमें उनकी पत्नी और नाबालिग बेटे को गुजारा भत्ता दिए जाने के दुमका की एक कुटुम्ब अदालत के आदेश को चुनौती दी गई थी.

न्यायमूर्ति चंद ने 22 जनवरी को फैसला सुनाया और आदेश में बदलाव करते हुए कहा कि राय की पत्नी को गुजारा भत्ता देने के आदेश को रद्द किया जाता है, वहीं उनके नाबालिग बेटे को मिलने वाले गुजारा भत्ता को 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये किया जाता है.

(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
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