जय श्री राम से जय मां काली: क्या पश्चिम बंगाल में बीजेपी बदल रही है अपनी चुनावी रणनीति?

PM मोदी ने प. बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले 'जय मां काली' और 'जय मां दुर्गा' का नारा दिया है. क्या यह सिर्फ नारा बदलने की बात है या सांस्कृतिक जुड़ाव की नई कोशिश? महिला वोटर्स, स्थानीय पहचान, राष्ट्रवाद के बीच BJP की इस रीब्रांडिंग का क्या असर होगा?

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  • जय श्री राम से जय मां काली का रुख कर बीजेपी बंगाल की स्थानीय आस्था और संस्कृति से जुड़ने की कोशिश कर रही है.
  • काली और दुर्गा के प्रतीक के जरिए पार्टी महिला सशक्तिकरण और सुरक्षा के मुद्दों को चुनावी विमर्श में ला रही है.
  • भारत माता की जय और वंदे मातरम से स्थानीय और राष्ट्रीय प्रतीकों को जोड़कर नई राजनीतिक पहचान गढ़ने की कोशिश.
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भारतीय राजनीति में सांस्कृतिक प्रतीकों की अपनी अलग ताकत है, और अक्सर इन्हीं नारों और प्रतीकों के जरिए चुनावी संदेश गढ़े जाते हैं. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के अभियान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जय मां काली का उद्घोष इसी बदलाव का संकेत है. यह बदलाव सिर्फ एक नारे का नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति के नए अध्याय का इशारा है. पहले जय श्री राम का नारा बीजेपी की पहचान बन चुका था, खासकर उत्तर और पश्चिम भारत में. लेकिन बंगाल की जमीन पर यह नारा कई बार पार्टी को बाहरी बताने के आरोपों के साथ जुड़ गया. ऐसे में जय मां काली और जय मां दुर्गा का इस्तेमाल एक सोची-समझी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है, ताकि पार्टी खुद को बंगाल की संस्कृति और भावनाओं से जोड़े और यह लंबे समय से छाए बाहरी के टैग को हटाने की एक बड़ी स्ट्रैटेजी को भी दिखाता है.

बंगाल की सांस्कृतिक धड़कन से जुड़ने की कोशिश

मां काली और मां दुर्गा बंगाल की पहचान का अहम हिस्सा हैं. दुर्गा पूजा यहां सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव है. काली पूजा भी गहरे धार्मिक और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक है. ऐसे में इन नारों के जरिए बीजेपी यह संदेश देना चाहती है कि वह बंगाल की मिट्टी और परंपरा का सम्मान करती है. प्रधानमंत्री मोदी ने बंगाल के मतदाताओं को लिखे पत्रों और भाषणों में जय मां काली का इस्तेमाल किया. इसका मकसद यह दिखाना है कि पार्टी सिर्फ राष्ट्रीय मुद्दों की बात नहीं कर रही, बल्कि स्थानीय आस्था और संस्कृति को भी अपनाने की कोशिश कर रही है.

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राष्ट्रवाद और ‘मां' की अवधारणा

प्रख्यात राजनीतिक विचारक आशीष नंदी ने अपने विश्लेषण में कहा है कि भारत को मां के रूप में देखने की अवधारणा 19वीं और 20वीं सदी के शुरुआती दौर में खासकर बंगाल में मजबूत हुई. उनके मुताबिक राष्ट्रवाद ने हिंदू शक्ति परंपरा, यानी देवी की पूजा, को आधुनिक राजनीतिक मकसद से जोड़ा. इस नजरिए से देखें तो जय मां काली का नारा सिर्फ धार्मिक उद्घोष नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और सांस्कृतिक संकेत भी है. यह उस परंपरा की याद दिलाता है जिसमें राष्ट्र, धर्म और सांस्कृतिक पहचान आपस में जुड़ जाते हैं.

राजनीति, संस्कृति और चुनौती

बीजेपी का जय श्री राम से जय मां काली और जय मां दुर्गा पर शिफ्ट करने की राजनीति केवल विचारधारा का खेल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक समझ और स्थानीय भावनाओं की पहचान का भी मामला है. जय श्री राम से जय मां काली की ओर बढ़ना यह दिखाता है कि पार्टी बंगाल की जमीन पर अलग रणनीति अपनाने को तैयार है. ताकि लोगों से जमीनी स्तर पर जुड़ा जा सके. लेकिन असली चुनौती सिर्फ नारे बदलने की नहीं बल्कि इस ताकतवर सिंबल को ऐसे एक्शन में बदलने की है जो सच में उन लोगों की जिंदगी को बेहतर बनाए जिन्हें ये ऊपर उठाने के लिए गढ़े गए हैं. विशेष रूप से बंगाल की महिलाओं को, जो तेजी से बदलती दुनिया में पहचान, तहजीब और सम्मान की मुश्किलों से जूझ रही हैं. 

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आखिर में सवाल ये है कि क्या ये प्रतीक जमीनी तब्दीली भी लाएंगे? क्या महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और सशक्तिकरण पर ठोस कदम उठेंगे? क्या सांस्कृतिक जुड़ाव सामाजिक न्याय में तब्दील होगा? बेशक यह सांस्कृतिक रीब्रांडिंग एक बड़ा राजनीतिक प्रयोग है. और अगर इसे ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ाया गया, तो यह बंगाल की राजनीति में नई दिशा दे सकता है. यह पॉलिटिकल और कल्चरल दोनों तरह से एक गहरी जागृति में बदल सकता है, जहां मां काली और मां दुर्गा की गूंज सशक्तिकरण के एक नए दौर की शुरुआत कर सकती है.

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