अमेरिका-ईरान युद्ध का असर: बेंगलुरु में बेजुबानों पर टूटा LPG का संकट, लकड़ियों पर पक रहा 600 कुत्तों का खाना

America Iran War Impact:अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते बेंगलुरु में एलपीजी का बड़ा संकट खड़ा हो गया है. गैस की किल्लत के कारण '777 चार्ली' फिल्म वाले शेल्टर सहित कई सेंटर्स में 600 से अधिक कुत्तों का खाना अब लकड़ियों पर पकाया जा रहा है. बेजुबानों की डाइट और स्वास्थ्य पर पड़ रहे इस असर की पूरी रिपोर्ट पढ़ें.

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  • अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच युद्ध के कारण बेंगलुरु में LPG संकट , जिससे एनिमल शेल्टर्स प्रभावित
  • चार्ली एनिमल रेस्क्यू सेंटर में गैस की कमी से भोजन पकाने का समय डेढ़ घंटे से बढ़कर तीन घंटे हो गया है
  • सेंटर में रोजाना साढ़े छह सौ से अधिक कुत्तों के लिए बड़ी मात्रा में चावल, चिकन और चिकन लीवर पकाना पड़ता है
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Bengaluru LPG Crisis:अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच छिड़े युद्ध का असर अब बेंगलुरु की गलियों और वहां के बेजुबान जानवरों पर भी दिखने लगा है. दरअसल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपजे एलपीजी संकट के कारण शहर के एनिमल शेल्टर्स में रसोई गैस की भारी किल्लत हो गई है,जिससे रेस्क्यू किए गए सैकड़ों कुत्तों को अपने दैनिक भोजन के लिए घंटों इंतजार करना पड़ रहा है. बेंगलुरु के मशहूर 'चार्ली एनिमल रेस्क्यू सेंटर' (CARE), जहाँ सुपरहिट '777 चार्ली' की शूटिंग हुई थी, वहां हालात इतने चुनौतीपूर्ण हो गए हैं कि गैस सिलेंडर न मिलने के कारण अब लकड़ियों के चूल्हे पर भोजन पकाया जा रहा है, जिससे फीडिंग शेड्यूल पूरी तरह प्रभावित हो गया है.

डेढ़ घंटे का काम अब तीन घंटों में, स्टाफ पर बढ़ा बोझ

एनिमल शेल्टर्स में बड़ी मात्रा में भोजन तैयार करने के लिए एलपीजी सिलेंडरों पर निर्भरता रहती है, लेकिन सप्लाई चेन टूटने से अब भारी मशक्कत करनी पड़ रही है. शेल्टर की मैनेजर कीर्तना के अनुसार, पहले जिस भोजन को तैयार करने में महज डेढ़ घंटा लगता था, अब लकड़ी के चूल्हे पर उसे पकाने में ढाई से तीन घंटे लग रहे हैं. चूल्हे में लगातार लकड़ियां झोंकने और आग जलाए रखने के लिए स्टाफ को सुबह 5 बजे से ही काम शुरू करना पड़ता है जो शाम 4 बजे तक चलता रहता है. इस अतिरिक्त मेहनत के लिए शेल्टर को कर्मचारियों को एक्स्ट्रा भुगतान भी करना पड़ रहा है.

600 से ज्यादा बेजुबानों की भूख का सवाल

चार्ली एनिमल रेस्क्यू सेंटर में रोजाना की डाइट का पैमाना बहुत बड़ा है. यहाँ प्रतिदिन लगभग 150 किलो चावल, 100 किलो चिकन और 90 किलो चिकन लीवर पकाया जाता है ताकि 600 से अधिक कुत्तों का पेट भरा जा सके. यहां मौजूद कई जानवर घायल, गंभीर संक्रमण से जूझ रहे या सड़क पर छोड़ दिए गए हैं, जिन्हें समय पर सटीक पोषण की जरूरत होती है. कीर्तना बताती हैं कि एलपीजी संकट की वजह से आसपास के कई होटल बंद हो गए हैं, जिससे वहां मिलने वाले खाने पर निर्भर रहने वाले आवारा कुत्तों की जिम्मेदारी भी अब इसी सेंटर पर आ गई है.
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यूनिवर्सिटी कैंपस से लेकर एयरपोर्ट तक सेवा का विस्तार

इस संकट के बावजूद सेवा का दायरा कम नहीं हुआ है. शेल्टर की टीम रेवा यूनिवर्सिटी, बीआईएएल (BIAL), बॉश अडूगोडी, केम्पेगौड़ा इंटरनेशनल एयरपोर्ट और एचपी जैसे इलाकों में रहने वाले कुत्तों तक भोजन पहुंचा रही है. कीर्तना का कहना है कि "कुत्ते युद्ध या एलपीजी संकट की जटिलताओं को नहीं समझते. उन्हें सिर्फ समय पर अपना भोजन चाहिए, और हमारी कोशिश यही है कि युद्ध की वजह से वे भूखे न रहें."

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लकड़ियों के लिए सोशल मीडिया पर अभियान  

गैस के साथ-साथ अब बाजार में ईंधन वाली लकड़ियों की मांग भी बढ़ गई है, जिससे उनका मिलना भी मुश्किल होता जा रहा है. सेंटर ने हाल ही में अपने इंस्टाग्राम पेज पर एक अभियान चलाकर लोगों से लकड़ियां दान करने की अपील की थी. इस अपील पर लोगों ने ठीक-ठाक प्रतिक्रिया दी, जिससे अगले 15 से 20 दिनों का स्टॉक तो जमा हो गया है, लेकिन भविष्य को लेकर अनिश्चितता बरकरार है. बेंगलुरु के ये शेल्टर्स अब इस उम्मीद में हैं कि यह वैश्विक संकट जल्द थमेगा ताकि बेजुबानों की जिंदगी फिर से सामान्य पटरी पर लौट सके.
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