- अखिलेश यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में सियासी गठबंधन बनने, फिर टूटने और फिर से बनने की बात कही है
- अखिलेश यादव के बयान को लेकर माना जा रहा है कि उन्होंन मायावती को एक संदेश देने की कोशिश हैं
- मायावती ने पिछले महीने अपने जन्मदिन पर प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान गठबंधन को लेकर बड़ा बयान दिया था
कहते हैं राजनीति में सबकुछ सीधा या उल्टा ही नहीं होता, कुछ आड़ा तिरछा भी होता है. इसको ऐसे भी कह सकते हैं कि राजनीति में सफेद या काले की जगह ग्रे हिस्सा ज़्यादा होता है. कुछ ऐसा ही इस वक़्त यूपी की सियासत में दिख रहा है. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में सियासी गठबंधन बनने, फिर टूटने और फिर से बनने की जो बात कही है, उसे लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है. कहा जा रहा है कि कहीं ये बसपा सुप्रीमो मायावती को इशारा तो नहीं, क्योंकि पिछले महीने मायावती भी गठबंधन को लेकर बड़ा बयान दे चुकी हैं.
अखिलेश यादव ने क्या कहा है?
दरअसल सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने गठबंधन को लेकर कहा कि गठबंधन बने और बाद में टूट भी गए. हालांकि अब हम अपने पुराने गठबंधन को वापस मज़बूत करने की कोशिश कर रहे हैं. इससे पहले उन्होंने बाबा साहब भीमराव आंबेडकर और लोकनायक जयप्रकाश नारायण को लेकर भी बड़ी बात कही. उन्होंने कहा कि कभी आंबेडकर और लोहिया ने मिलकर साथ काम करने की कोशिश की थी, लेकिन समय और परिस्थितियों ने ऐसा करने नहीं दिया.
मायावती को संदेश देने की कोशिश?
अखिलेश के इन दोनों बयानों को लेकर माना जा रहा है कि ये मायावती को एक संदेश देने की कोशिश हैं. एक तरफ पुराने गठबंधन बनने और टूटने के बावजूद फिर से जुड़ने की उम्मीद और दूसरी तरफ आंबेडकर और लोहिया के साथ काम ना कर पाने की कसक. ये कयास इसलिए लगाए जा रहे हैं, क्योंकि 2027 में होने वाले यूपी विधानसभा चुनाव में गठबंधन को लेकर अखिलेश भी दिल बड़ा रखने की बात कहते रहे हैं, और मायावती ने भी अकेले चुनाव लड़ने की अपनी ज़िद में कुछ नरमी दिखाई है.
मायावती ने गठबंधन पर क्या कहा था?
बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने पिछले महीने अपने जन्मदिन के मौके पर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में गठबंधन को लेकर बड़ा बयान दिया था. मायावती ने कहा था कि फ़िलहाल वो अकेली चुनाव में उतरने की राह पर आगे बढ़ रही हैं, लेकिन भविष्य में अगर कोई उन्हें सवर्ण वोट ट्रांसफर कराने की गारंटी दे तो वो गठबंधन पर विचार करेंगी. मायावती के इस बयान को लेकर माना गया था कि मायावती ने बीजेपी को इशारा दिया था.
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अखिलेश को किस बात का डर है?
बीएसपी सुप्रीमो मायावती के सवर्ण वोट दिलाने के नाम पर गठबंधन करने के संकेत को लेकर कहा गया कि ये ऑफर बीजेपी को दिया गया है क्योंकि पिछले एक दशक की राजनीति में सवर्ण वोट का सबसे बड़ा हिस्सा बीजेपी के पास दिखाई देता है. ऐसे में अखिलेश यादव पीडीए की लड़ाई को एजेंडा बनाकर रणनीति पर काम कर रहे हैं. ऐसे में अगर बीएसपी और बीजेपी साथ आ गए, तो कहीं ना कहीं सपा को बड़ा झटका लग सकता है. शायद इसी वजह से अखिलेश यादव ने मायावती को इशारा दिया है.
सपा-बसपा गठबंधन का इतिहास
साल 1993 में सपा और बसपा साथ आए थे. हालांकि ये गठबंधन लंबा नहीं चला. इस गठबंधन के लगभग दो साल बाद 1995 में लखनऊ का चर्चित “गेस्ट हाउस कांड” हो गया. इस कांड के बाद यूपी की राजनीति में सपा और बसपा के साथ आने की संभावना को लगभग खत्म मान लिया गया था. हालांकि इस असंभव से दिख रहे गठबंधन को 'बुआ' और 'बबुआ' यानी मायावती और अखिलेश ने साल 2019 के लोकसभा चुनाव में संभव कर दिखाया. 2014 में सपा को पांच और बसपा को शून्य सीटें मिलीं थीं, लेकिन दोनों के साथ आने से बसपा के दस सांसद चुनाव जीते, वहीं सपा पांच पर ही अटकी रही.
क्या दोनों फिर साथ आएंगे?
समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी साथ आएंगे या नहीं, ये कहना फ़िलहाल जल्दबाजी होगी. दोनों ही लंबे समय से सत्ता से दूर हैं. बीएसपी 2007 से 2012 तक सत्ता में थी, वहीं सपा 2012 से 2017 तक सरकार चलाती रही. साल 2027 में सपा को सत्ता से दूर हुए दस साल और बसपा को 15 साल हो जाएंगे. दोनों को पता है कि अगर 2027 में भी विपक्ष में रहना पड़ा, तो यूपी में दोनों के लिए अस्तित्व का संकट खड़ा हो सकता है. अब ये आने वाला वक्त ही बताएगा कि दोनों के साथ आने की कितनी संभावना है.
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