- भारतीय सेना के लिए 30 उन्नत लो-लेवल लाइटवेट रडार और दो क्लासरूम वैरिएंट रडार खरीदने का प्रस्ताव रखा गया है
- इन रडारों की अनुमानित लागत लगभग 725 करोड़ रुपये है और खरीद आपातकालीन फास्ट ट्रैक प्रक्रिया से होगी
- रडार सिस्टम आकाशतीर कमांड एंड रिपोर्टिंग सिस्टम से जुड़े होंगे और आर्मी साइबर ग्रुप के मानकों पर खरे उतरेंगे
भारतीय सेना में जल्द ही 30 उन्नत लो-लेवल लाइटवेट रडार और दो क्लासरूम वैरिएंट रडार शामिल होंगे. जिसके बाद देश में हवाई घुसपैठ पर कड़ा पहरा रहेगा. दुश्मन तो क्या परिंदा भी हमारे हवाई क्षेत्र में पर नहीं मार सकेगा. रक्षा मंत्रालय ने 6 फरवरी को भारतीय सेना के लिए 30 उन्नत लो-लेवल लाइटवेट रडार (LLLR-I) और दो क्लासरूम वैरिएंट रडार (CRV) खरीदने के लिए प्रस्ताव अनुरोध यानी रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) जारी किया है.
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एडवांस रडार इन क्षेत्रों में होंगे तैनात
किसी भी रक्षा खरीद में RFP, मंत्रालय द्वारा जारी किया गया एक औपचारिक दस्तावेज है. इसका मकसद रक्षा उपकरण या सेवाओं की खरीद के लिए विक्रेताओं से बोलियां आमंत्रित करना है. LLLR-I और CRV की इस खरीद की अनुमानित लागत करीब 725 करोड़ रुपये है. इन रडारों की खरीद आपातकालीन प्रक्रिया यानी फास्ट ट्रैक प्रोक्योरमेंट के तहत की जाएगी. ये रडार पहाड़ी इलाकों, ऊंचाई वाले क्षेत्रों, मैदानी इलाकों, अर्ध-रेगिस्तान, रेगिस्तान और तटीय क्षेत्र जैसे अलग-अलग इलाकों में तैनात किए जाएंगे. इनकी तैनाती से भारत की हवाई सुरक्षा और भी पुख्ता हो जाएगी.
मंत्रालय ने क्या शर्त रखी है?
रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी RFP को देखें तो इसमें LLLR-I के लिए कई एलिजिबिलिटी फैक्टर्स को शामिल किया गया है. शर्त ये है कि सिस्टम को आकाशतीर कमांड एंड रिपोर्टिंग (C&R) सिस्टम से जोड़े जाने योग्य होना चाहिए. इसमें जरूरी हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर पहले से मौजूद होना चाहिए. साथ ही यह आर्मी के डेटा नेटवर्क से जुड़ने के लिए आर्मी साइबर ग्रुप के मानकों पर खरा उतरना चाहिए. क्योंकि ऐसे सिस्टम में गोपनीयता काफी अहम है, जिससे दुश्मन की साइबर टीम इसे हैक आदि न कर सके.
कुल मिलाकर यह एक हवाई निगरानी प्रणाली है, जो आसमान में उड़ने वाले टारगेट को ट्रैक करने और उनकी प्राथमिकता तय करेगी. ये सिस्टम तय करेगा कि आसमान में आ रहा कौन सा टारगेट किसी नेचर या प्रवृत्ति का है. इससे उस टारगेट को तबाह करने के लिए सेना उस हिसाब से हथियार इस्तेमाल करेगी.
रडार में 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री होने की शर्त
RFP के अनुसार यह सिस्टम एक साथ सैकड़ों हवाई लक्ष्यों को ट्रैक करने में सक्षम होना चाहिए. इसका रडार इतना सक्षम होना चाहिए कि यह कम से कम से कम 20 लक्ष्यों की जानकारी एक साथ 10 कमांड पोस्ट या 10 हथियार प्रणालियों को भेज सके. ये सिस्टम रडार से 20 किलोमीटर तक की दूरी पर हो सकते हैं. सिस्टम और रडार की कनेक्टिविटी तार, रेडियो या रेडियो रिले के जरिए होनी चाहिए. भविष्य में इसे 20 टारगेट डेटा रिसीवर (TDR) तक बढ़ाया जा सके, ऐसी सुविधा भी इसमें होनी चाहिए.
दिलचस्प बात ये है कि रक्षा मंत्रालय ने RFP में 'आत्मनिर्भर भारत' से जुड़ी एक शर्त भी शामिल की है. इसके मुताबिक इस रडार में कम से कम 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री होने की शर्त रखी गई है. सेनाओं को ये सिस्टम समय पर मिले, इसका ध्यान भी रखा गया है. इसके तहत पहले चरण में 15 LLLR-I सिस्टम और 1 CRV को एडवांस भुगतान की तारीख से 12 महीने के भीतर डिलीवर करना होगा. बाकी सिस्टम अगले 6 महीनों में सप्लाई किए जाएंगे.
ऑपरेटरों, ट्रेनरों और मेंटेनेंस के लिए ट्रेनिंग की जरूरत
इन उपकरणों की सेवा अवधि कम से कम 10 साल होनी चाहिए. कंपनी को सिस्टम की विश्वसनीयता से जुड़ी जानकारी भी देनी होगी ताकि पूरी सर्विस के दौरान सही प्रदर्शन सुनिश्चित किया जा सके. अब सिस्टम आएंगे तो उन्हें ऑपरेट करने के लिए ट्रेनिंग भी चाहिए होगी. लिहाजा इसे बनाने वाली कंपनी को ऑपरेटरों, ट्रेनरों और इसके मेंटेनेंस यानी रखरखाव से जुड़े कर्मियों के लिए एक ट्रेनिंग पैकेज देना होगा. रखरखाव का प्रशिक्षण पहले बैच की वारंटी खत्म होने से 3 से 6 महीने पहले कराया जाएगा.
LLLR-I सिस्टम में सर्च रडार, कमांडर डिस्प्ले यूनिट (CDU), टारगेट डिज़ाइनेशन सिस्टम (TDS) और पावर सप्लाई यूनिट शामिल होंगी. यह सिस्टम संवेदनशील इलाकों और महत्वपूर्ण ठिकानों की रक्षा में जरूरत के अनुसार तैनात किया जा सके, ऐसी फ्लेक्सीबिलिटी भी इस सिस्टम में होनी चाहिए.













