मोची नहीं जूते बनाने वाले कारीगर, कुम्‍हार सिरेमिक एंड क्ले उत्‍पाद निर्माता... संसदीय समिति के अहम सुझाव

उद्योग संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने पीएम विश्‍वकर्मा योजना को लेकर सिफारिश की है कि पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत व्यापार के नामों को तुरंत तर्कसंगत बनाया जाए, जिसमें जाति या क्षेत्र से जुड़े शब्दों को कार्य आधारित नामों से बदला जाए.

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समिति ने सिफारिश की है कि पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत व्यापार के नामों को तुरंत तर्कसंगत बनाया जाए. (AI इमेज)
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  • उद्योग संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने PM विश्‍वकर्मा योजना को लेकर पेशों से जुड़े नामों को बदलाव की सिफारिश की.
  • समिति ने कहा है मोची, जूता बनाने वाले और नाई की पहचान उनके कौशल के आधार पर होनी चाहिए, न कि जाति के आधार पर.
  • पीएम विश्वकर्मा योजना के बजट में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारी कटौती को लेकर समिति ने गंभीर चिंता जताई है.
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उद्योग संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने पीएम विश्‍वकर्मा योजना को लेकर विभिन्‍न पेशों से जुड़े नामों को लेकर बदलाव की सिफारिश की है. समिति ने कहा है कि मोची, जूता बनाने वाले और नाई की पहचान उनके कौशल के आधार पर होनी चाहिए, न कि जाति के आधार पर. साथ ही समिति ने पीएम विश्‍वकर्मा योजना के बजट में कमी को लेकर भी अपनी चिंता जताई है. 

समिति ने सिफारिश की है कि पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत व्यापार के नामों को तुरंत तर्कसंगत बनाया जाए, जिसमें जाति या क्षेत्र से जुड़े शब्दों को कार्य आधारित नामों से बदला जाए. उदाहरण के तौर पर ‘मोची' की जगह ‘जूते बनाने वाला कारीगर', ‘कुम्हार' की जगह ‘सिरेमिक एंड क्ले उत्‍पाद निर्माता' और ‘नाई' की जगह ‘व्यक्तिगत ग्रूमिंग सेवा प्रदाता' जैसे नाम इस्तेमाल किए जाएं. यह प्रक्रिया राज्यों और सामाजिक विशेषज्ञों से परामर्श के बाद हो और पूरे देश में एक समान संशोधित ट्रेड लिस्ट लागू की जाए.

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पीएम विश्‍वकर्मा योजना का बजट घटाने पर जताई चिंता 

समिति ने बजट को लेकर भी चिंता जताई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2026-27 में पीएम विश्वकर्मा योजना के लिए बजटीय आवंटन घटाकर 3,860.89 करोड़ रुपये कर दिया गया है, जबकि 2025-26 में यह 25,100 करोड़ रुपये था.

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समिति के मुताबिक, रजिस्ट्रेशन कैप का पूरा उपयोग हो चुका है और प्रशिक्षण, टूलकिट वितरण और ब्याज सब्सिडी से जुड़ी देनदारियां अब भी लंबित हैं. ऐसे में बजट में की गई यह कटौती गंभीर चिंता का विषय है और इसे लेकर तुरंत समीक्षा की जरूरत है.

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समिति का मानना है कि अगर योजना को वास्तव में समावेशी और अखिल भारतीय स्वरूप देना है, तो नामकरण में बदलाव और पर्याप्त वित्तीय समर्थन दोनों ही जरूरी हैं. 
 

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