ममता के लिए नई चुनौती? हुमायूं कबीर खड़े कर रहे हैं मुश्किलें, क्या मुस्लिम वोट बैंक में दरार पड़ने वाली है?

मुर्शिदाबाद उन जिलों में है जहां मुस्लिम आबादी 70% से अधिक है. यहां का मुस्लिम वोट बैंक तय करता है कि कौन विधायक बनेगा. हुमायूं कबीर खुद को मुस्लिमों के कट्टर नेता के रूप में पेश कर रहे हैं.

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  • मुर्शिदाबाद विधायक हुमायूं कबीर तृणमूल कांग्रेस से निकाले जाने के बाद नई राजनीतिक दल का गठन कर सकते हैं
  • हुमायूं कबीर बाबरी मस्जिद निर्माण की योजना पर काम कर रहे हैं लेकिन प्रशासन ने उन्हें अनुमति नहीं दी है
  • बाबरी मस्जिद के नाम पर विवाद से तृणमूल कांग्रेस को राजनीतिक नुकसान की आशंका है
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नई दिल्ली:

“धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय…” संत कबीर का यह दोहा आज पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नए मोड़ पर खड़ा है. मुर्शिदाबाद के विधायक हुमायूं कबीर, जिनकी तस्वीर अब सुर्खियों में है, कबीर की इस सीख को अपने अंदाज़ में जीते दिख रहे हैं. तृणमूल कांग्रेस से बाहर होने के बाद हुमायूं कबीर अब अपनी राजनीतिक जमीन खुद तैयार कर रहे हैं. बाबरी मस्जिद के नाम पर उठी बहस ने बंगाल की सियासत में हलचल मचा दी है. सवाल यह है कि क्या हुमायूं का यह कदम ममता बनर्जी की जीत की रणनीति को प्रभावित करेगा?

हुमायूं कबीर का नया दांव

तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित होने के बाद हुमायूं कबीर ने ऐलान किया है कि वह दिसंबर में अपना नया दल बनाएंगे और 2026 के विधानसभा चुनाव में 135 सीटों पर उम्मीदवार उतारेंगे. यह घोषणा ऐसे समय आई है जब वह पिछले एक महीने से मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनाने की कवायद कर रहे थे. दिलचस्प बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस की सरकार में रहते हुए भी उन्हें मस्जिद के लिए जमीन नहीं मिल सकी.

हुमायूं बार-बार कहते रहे कि 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद की स्थापना करेंगे. लेकिन प्रशासन की अनुमति न मिलने और पार्टी की चुप्पी ने उनके राजनीतिक समीकरण बदल दिए. 4 दिसंबर को तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया.

क्या है विवाद की जड़?

हुमायूं कबीर का बयान कि मस्जिद का नाम ‘बाबरी' होगा, विवाद का केंद्र बन गया. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस हमेशा से तुष्टीकरण के आरोपों से घिरी रही है. पार्टी जानती है कि उसके वोटर सिर्फ मुस्लिम नहीं, बल्कि लाखों हिंदू भी हैं, जिनकी आस्था राम मंदिर, काली और दुर्गा पूजा से जुड़ी है. ऐसे में बाबरी नाम का इस्तेमाल हिंदू वोटरों को नाराज़ कर सकता है.

मुर्शिदाबाद का समीकरण

मुर्शिदाबाद उन जिलों में है जहां मुस्लिम आबादी 70% से अधिक है. यहां का मुस्लिम वोट बैंक तय करता है कि कौन विधायक बनेगा. हुमायूं कबीर खुद को मुस्लिमों के कट्टर नेता के रूप में पेश कर रहे हैं. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कई मुस्लिम संगठन बाबरी मस्जिद मुद्दे पर उनका समर्थन कर रहे हैं और उन्हें आर्थिक मदद भी मिल रही है. लेकिन जमीन प्रशासन की अनुमति के बिना नहीं मिल सकती.

हुमायूं कबीर का कैसा रहा है राजनीतिक सफर

हुमायूं का इतिहास उतार-चढ़ाव से भरा है.

  • 2011: कांग्रेस टिकट पर जीत, फिर तृणमूल में शामिल होकर मंत्री बने.
  • 2019: तृणमूल छोड़कर बीजेपी में गए, लोकसभा चुनाव में हार.
  • 2021: फिर तृणमूल में वापसी, भरतपुर से विधायक बने.
  • उनकी पहचान विवादित बयानों से जुड़ी रही है. कभी हिंदुओं को 30% कहकर नदी में बहाने की बात, तो कभी बाबरी मस्जिद का मुद्दा.


क्या असर पड़ेगा तृणमूल पर?

ममता बनर्जी की जीत में मुस्लिम वोटरों की बड़ी भूमिका रही है. लेकिन बाबरी मस्जिद का मुद्दा मुस्लिम वोटों को बांट सकता है. हुमायूं का नया दल तृणमूल के लिए चुनौती बन सकता है, खासकर उन जिलों में जहां मुस्लिम आबादी ज्यादा है.हुमायूं कबीर का यह कदम बंगाल की राजनीति में नया समीकरण पैदा कर सकता है. बाबरी मस्जिद का नाम और नया दल दोनों ही मुद्दे तृणमूल कांग्रेस के लिए सिरदर्द बन सकते हैं. सवाल यह है कि क्या हुमायूं का यह दांव उन्हें बंगाल की सियासत में बड़ा खिलाड़ी बनाएगा या यह सिर्फ एक शोर साबित होगा?
 

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