निकोबार द्वीप पर भारत बसाएगा बेहद आधुनिक शहर ! सरकारी फैक्टशीट में चीन को घेरने का पूरा ब्लूप्रिंट आया सामने

Nicobar Port Project: ग्रेट निकोबार परियोजना भारत के लिए सामरिक और आर्थिक रूप से गेम-चेंजर साबित होने वाली है. 2047 तक पूरे होने वाले इस प्रोजेक्ट में नया बंदरगाह, एयरपोर्ट और शहर शामिल हैं. जानें क्यों इसकी हरियाली की भरपाई हरियाणा में की जा रही है और कैसे यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के खिलाफ भारत की सबसे बड़ी ढाल बनेगा.

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  • ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट हिंद महासागर में रणनीतिक स्थिति मजबूत करने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल है
  • इस परियोजना में इंटरनेशनल कंटेनर टर्मिनल, ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट, आधुनिक टाउनशिप तथा पावर प्लांट शामिल है
  • पर्यावरण संरक्षण के तहत निकोबार में काटे गए पेड़ों की भरपाई हरियाणा में नए जंगल लगाकर की जाएगी
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Great Nicobar Project: भारत सरकार ने हिंद महासागर के सुदूर छोर पर एक ऐसा दांव चला है, जो आने वाले दशकों में वैश्विक राजनीति और सुरक्षा की दिशा बदल सकता है. इसे 'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट' का नाम दिया गया है, लेकिन हकीकत में यह भारत का एक ऐसा सामरिक किला है, जो समंदर के बेहद अहम रास्ते पर पहरेदारी करेगा. सरकार द्वारा जारी की गई ताज़ा फैक्टशीट से साफ है कि यह महज ईंट-पत्थर का निर्माण नहीं, बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की शक्ति का सबसे बड़ा प्रदर्शन है. अहम ये भी है इस प्रोजेक्ट के लिए जितने पेड़ काटे जाएंगे उतने पौधे निकोबार द्वीप समूह से 2000 किलोमीटर दूर हरियाणा में लगाए जाएंगे...तो इस रिपोर्ट में जानिए इस प्रोजेक्ट की हर बारीकी को.

बंदरगाह, एयरपोर्ट और एक आधुनिक शहर का ब्लूप्रिंट

इस परियोजना के तहत सरकार चार बड़े मोर्चों पर काम कर रही है, जो इस द्वीप की पूरी शक्ल बदल देंगे. सबसे पहले यहां एक 'इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल' (ICTT) बनाया जाएगा. इसका मतलब एक ऐसा बंदरगाह है जहां दुनिया भर के विशाल जहाज रुक सकेंगे और सामान का आदान-प्रदान करेंगे. अभी तक ऐसे जहाजों को कोलंबो या सिंगापुर जाना पड़ता था, लेकिन अब भारत खुद इस कमाई का हिस्सा बनेगा.

इसके साथ ही, यहां एक 'ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट' बनेगा जो न केवल पर्यटकों के काम आएगा बल्कि वायुसेना की ताकत को भी कई गुना बढ़ा देगा. द्वीप पर एक आधुनिक टाउनशिप और उसे ऊर्जा देने के लिए एक विशाल पावर प्लांट भी लगाया जाएगा, जिससे यह पूरा इलाका आत्मनिर्भर बनेगा.

निकोबार में विकास और हरियाणा में हरियाली का अनोखा फॉर्मूला

इस प्रोजेक्ट की सबसे ज्यादा चर्चा इसकी 'ग्रीन प्लानिंग' को लेकर हो रही है. पर्यावरण के नियमों के मुताबिक, जब कहीं जंगल काटकर विकास किया जाता है, तो उसके बदले उतनी ही हरियाली कहीं और उगानी पड़ती है. ग्रेट निकोबार में पहले से ही 75 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा घने जंगलों से ढका है, इसलिए वहां नया जंगल उगाने के लिए खाली जमीन नहीं थी. इसी वजह से सरकार ने एक अनोखा रास्ता निकाला है—निकोबार में काटे जाने वाले पेड़ों की भरपाई के लिए हरियाणा में लगभग 97 वर्ग किलोमीटर जमीन पर जंगल उगाया जाएगा. यह एक तरह का भौगोलिक संतुलन है, जहां समंदर की सुरक्षा के लिए होने वाले विकास का 'ऑक्सीजन' उत्तर भारत के मैदानों में तैयार होगा.
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प्रकृति और जनजातीय हितों की सुरक्षा का संकल्प

विकास की इस अंधी दौड़ में पर्यावरण और वहां रहने वाले मूल समुदायों को नजरअंदाज नहीं किया गया है. फैक्टशीट के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट के लिए निकोबार के कुल वन क्षेत्र का मात्र 1.82 प्रतिशत हिस्सा ही उपयोग में लाया जाएगा. सरकार ने यह भी साफ किया है कि करीब 66 वर्ग किलोमीटर के इलाके को 'ग्रीन जोन' और 'नो-गो जोन' के रूप में सुरक्षित रखा जाएगा, जहां निर्माण की एक ईंट भी नहीं रखी जाएगी. इसके अलावा, वहां रहने वाली स्थानीय जनजातियों के अधिकारों और उनकी संस्कृति के संरक्षण के लिए भी कड़े नियम बनाए गए हैं. सरकार के मुताबिक यह प्रोजेक्ट इस बात का उदाहरण बनेगा कि कैसे हम अपनी सुरक्षा और तरक्की के लिए प्रकृति के साथ समझौता किए बिना आगे बढ़ सकते हैं.

तीन चरणों में 2047 तक का 'विज़न'

यह कोई रातों-रात पूरा होने वाला काम नहीं है, बल्कि सरकार ने आजादी के 100 साल यानी 2047 तक का लक्ष्य तय किया है. इस महा-मिशन को तीन चरणों में बांटा गया है. पहला चरण 2025 से 2035 तक चलेगा, जिसमें शुरुआती बुनियादी ढांचा तैयार होगा. इसके बाद 2036 से 2041 और फिर 2042 से 2047 तक इसके विस्तार का काम चलेगा. इस चरणबद्ध तरीके का सबसे बड़ा फायदा यह है कि हर कदम पर पर्यावरण और स्थानीय समुदायों पर होने वाले असर की जांच की जा सकेगी. सरकार का मानना है कि इस तरह से विकास न केवल टिकाऊ होगा, बल्कि पूरी तरह से राष्ट्रहित के हित में भी रहेगा.

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सामरिक महाशक्ति बनने का रास्ता और चीन की घेराबंदी

ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रास्तों के बिल्कुल मुहाने पर है. इसे 'मलक्का जलडमरूमध्य' (Strait of Malacca) का द्वार कहा जाता है, जहां से दुनिया का करीब आधा समुद्री व्यापार और चीन की तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है. इस जगह पर भारत का एक मजबूत बेस होने का मतलब है कि संकट के समय भारत समंदर की इस नस पर अपना हाथ रख सकता है. यह प्रोजेक्ट भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति का सबसे अहम हिस्सा है, जो दक्षिण-पूर्व एशिया में हमारी मौजूदगी को काफी मजबूत कर देगा. जिससे चीन जैसे देशों की विस्तारवादी सोच पर काफी हद तक लगाम लग सकेगी.
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(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
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