पहले मुलायम और अब बेटे अखिलेश ने किया महिला आरक्षण का विरोध, समझिए कैसे फंस गई सपा की 'साइकिल'

पिता मुलायम सिंह यादव की विरासत और अपने नए PDA फॉर्मूले के बीच फंसे अखिलेश यादव के लिए महिला आरक्षण का मुद्दा 'राजनीतिक चक्रव्यूह' बन गया है.

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  • लोकसभा में दो दिन की बहस के बाद महिला आरक्षण बिल शुक्रवार को सदन में गिर गया और इस पर जोरदार बहस हुई
  • समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने महिला आरक्षण के खिलाफ वोट दिया लेकिन कहा कि वे बिल के खिलाफ नहीं हैं
  • अखिलेश यादव ने कोटा के भीतर जातिगत कोटा की मांग की जिससे पिछड़ी, दलित और अल्पसंख्यक महिलाओं को आरक्षण मिले
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लोकसभा में दो दिन की बहस के बाद शुक्रवार को महिला आरक्षण बिल गिर गया. इस बिल पर सदन में खूब गरमागरमी देखने को मिली. सरकार की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर गृहमंत्री अमित शाह तक ने अपनी बात रखी और सांसदों का समर्थन जुटाने की कोशिश की. वहीं कांग्रेस समेत विपक्षी पार्टियों ने इस बिल के खिलाफ सदन में हंगामा किया. इस पूरी चर्चा के दौरान समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव पर सबकी निगाहें थीं. अखिलेश और उनकी पार्टी के सांसदों ने इस बिल पर मिला-जुला रुख अपनाया. अखिलेश ने कहा कि हम महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है लेकिन उन्होंने इस बिल के विरोध में वोट किया. अखिलेश के लिए यह बिल उनके नए राजनीतिक फॉर्मूले 'PDA' की अग्निपरीक्षा है. उन्होंने बिल का विरोध करके कहीं न कहीं अपने लिए थोड़ी मुसीबत मोल ले ली है. अब बीजेपी उन्हें 'महिला विरोधी' और 'पिछड़ा विरोधी' साबित करने का नैरेटिव सेट कर सकती है. ऐसा ही कभी अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव के समय भी हुआ था, जब उनकी वजह से महिला आरक्षण बिल गिर गया था.

महिला आरक्षण बिल पर क्या है अखिलेश का रुख?

अखिलेश यादव पिछले कुछ सालों से PDA दांव खेल रहे हैं. अगर इस बिल की बात करें तो उन्होंने यहां संतुलित रुख अपनाया. सपा सांसदों ने सदन में कहा कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है, लेकिन जिस 'जल्दबाजी' और 'तरीके' से इसे लाया गया है, उस पर उनके गंभीर सवाल हैं. अखिलेश ने 'कोटा के भीतर कोटा' की भी मांग की. अखिलेश का सबसे बड़ा तर्क यह है कि आरक्षण का लाभ देश की 95% आबादी वाली पिछड़ी (OBC), दलित और अल्पसंख्यक (मुस्लिम) महिलाओं तक पहुंचना चाहिए. उनका मानना है कि इनके लिए अलग से कोटा सुनिश्चित किए बिना यह बिल अधूरा और दिखावा है.

उन्होंने मांग की है कि सरकार पहले जातिगत जनगणना कराए ताकि जनसंख्या के सही आंकड़ों के आधार पर आरक्षण दिया जा सके. उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि सरकार जातिगत जनगणना से बचने के लिए ही इस बिल को जनगणना और परिसीमन के नाम पर टाल रही है.

कभी मुलायम सिंह की वजह से गिरा था महिला आरक्षण बिल

महिला आरक्षण बिल का कभी अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव ने भी विरोध किया था. उन्होंने हमेशा यह कहकर इसका विरोध किया कि इसमें  OBC और मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से कोटा नहीं है. उनका मानना था कि इससे पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व खत्म हो जाएगा. मुलायम सिंह यादव ने 2010 में इस बिल का तीखा विरोध किया था, जिससे सपा पर 'महिला विरोधी' होने का ठप्पा लगा.

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कैसे अखिलेश बिल का विरोध करके फंस गए?

मुलायम सिंह यादव के बाद अब अखिलेश यादव ने भी महिला आरक्षण बिल का विरोध किया है. अब बीजेपी उन्हें 'महिला विरोधी' कहकर घेरेगी.  भाजपा उन्हें प्रगति का दुश्मन करार देकर महिला साइलेंट वोटर्स को अपनी ओर खींचने की कोशिश करेगी. अगले साल यूपी में विधानसभा चुनाव भी है, ऐसे में इस बिल के विरोध करने का मुद्दा बीजेपी चुनाव अभियान में जरूर उठाएगी.

बिल का विरोध करने का एक कारण यह भी

महिला आरक्षण बिल के विरोध का एक कारण परिसीमन भी है. अगर परिसीमन के चलते यूपी में सीटों की संख्या बढ़ती है, तो राजीनितिक समीकरण भी बदल जाएंगे. अखिलेश को डर है कि कहीं इससे भाजपा को मनोवैज्ञानिक बढ़त न मिल जाए. इसके अलावा यूपी में महिला वोटर्स का झुकाव पिछले कुछ चुनावों में भाजपा की ओर रहा है. अखिलेश के लिए आज का फैसला इस वोट बैंक को उनसे और भी दूर लेकर जा सकता है.

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