Explainer: नवी मुंबई, पानीपत और मंगोलपुरी- तीन शहर कैसे बदल रहे लाखों टन कपड़े के कचरे की सूरत?

भारत जिस 78 लाख टन टेक्सटाइल कचरे का प्रबंधन करता है उसके तीन सबसे अहम सेंटर के रूप में उभरे हैं- नवी मुंबई, पानीपत और दिल्ली का मंगोलपुर इलाका. यहां ये पुराने कपड़े इकोनॉमी, जॉब्स और सर्कुलर इकोनॉमी की नींव बन रहे हैं.

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तीन शहर, अलग-अलग भूमिका पर लक्ष्य एक
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  • नवी मुंबई में देश की पहली म्युनिसिपल टेक्स्टाइल रिकवरी फैसिलिटी बनाई गई है.
  • पानीपत आज भारत का सबसे बड़ा टेक्स्टाइल रीसाइक्लिंग हब बनकर उभरा है.
  • मंगोलपुरी का 'कतरन बाजार' रोज टनों कपड़ा रीसाइक्लिंग के लिए भेज रहा है.

देश के तीन शहर आज ये दिखा रहे हैं कि अगर सही व्यवस्था बनाई जाए तो कपड़े का कचरा भी करोड़ों रुपये की अर्थव्यवस्था और हजारों लोगों की आजीविका का आधार बन सकता है. ये तीन शहर मुंबई, पानीपत और दिल्ली है. मुंबई में नवी मुंबई, हरियाणा में पानीपत और दिल्ली में मंगोलपुरी अपनी अलग-अलग भूमिकाओं से कपड़े के कचरे को वापस वैल्यू चेन में लौटा रहे हैं और इस तरह भारतीय अर्थव्यवस्था में एक बहुत बड़ी भूमिका निभा रहे हैं. तीनों की भूमिका अलग है, लेकिन लक्ष्य एक है. कपड़ा कचरे को लैंडफिल में जाने से रोकना और उसे दोबारा उपयोग के लायक बनाना.

नवी मुंबईः जहां कचरे को मिला नया जीवन

अगर भारत में टेक्स्टाइल सर्कुलर इकोनॉमी का सबसे आधुनिक मॉडल देखना हो तो नवी मुंबई इसका सबसे अच्छा उदाहरण है. बेलापुर में देश की पहली म्युनिसिपल टेक्स्टाइल रिकवरी फैसिलिटी बनाई गई है. यहां कपड़े के कचरे को इकट्ठा करने के बाद पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया के साथ उसकी पहचान, छंटाई, अपसाइक्लिंग और दोबारा उपयोग के लिए तैयार किया जाता है.

इस मॉडल की खास बात यह है कि इसमें केवल मशीनें ही नहीं, बल्कि स्थानीय समुदाय और महिला कारीगर भी बराबर की भागीदारी निभा रहे हैं.

अब तक इस केंद्र ने लगभग 30 मीट्रिक टन इस्तेमाल किए जा चुके कपड़ों का कलेक्शन किया, 25.5 मीट्रिक टन कपड़ों की वैज्ञानिक छंटाई की, 41 हजार से ज्यादा वस्तुओं को प्रोसेस किया और 400 से अधिक अपसाइक्लिंग किए गए प्रॉडक्ट विकसित किए हैं. यह पहल 1.14 लाख से ज्यादा परिवारों तक भी पहुंच चुकी है. 

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पानीपतः जहां कपड़े का कचरा बन जाता है नया कच्चा माल

अगर नवी मुंबई कचरा कलेक्शन का मॉडल बन गया है, तो पानीपत रीसाइक्लिंग की राजधानी बन चुका है.

सरकार के अनुसार, देश के अलग-अलग टेक्सटाइल क्लस्टरों की फैक्ट्रियों से निकलने वाला कपड़े का कचरा पानीपत पहुंचता है. यहां उसकी छंटाई, प्रोसेसिंग, बुनाई और रीसाइक्लिंग की जाती है. यह क्लस्टर रोज करीब 3,500 से 5,250 टन कपड़े का प्रबंधन करता है.

यही वजह है कि पानीपत को अब डाउनस्ट्रीम टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग हब कहा जा रहा है. यहां महीन छंटाई के जरिए कपड़े से फिर कपड़ा बनाने यानी टेक्स्टाइल-टू-टेक्स्टाइल रीसाइक्लिंग की बड़ी संभावनाएं भी विकसित हो रही हैं. 

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मंगोलपुरीः यहां सड़क किनारे शुरू होती है रीसाइक्लिंग की कहानी

दिल्ली का मंगोलपुरी पहली नजर में किसी आधुनिक रीसाइक्लिंग सेंटर के जैसा नहीं दिखता. लेकिन यहीं का कतरन बाजार भारत की टेक्स्टाइल रीसाइक्लिंग चेन की सबसे अहम कड़ी माना जा रहा है.

यहां नोएडा, गुरुग्राम, मानेसर, जयपुर और दिल्ली की फैक्ट्रियों से आने वाले ट्रकों से कपड़े की कतरन उतारी जाती है. इसके बाद मजदूर इन कपड़ों को रंग, गुणवत्ता और प्रकार के हिसाब से अलग-अलग करते हैं. यही प्रक्रिया बाद में रीसाइक्लिंग को आसान और ज्यादा अहम बनाती है.

सरकार के अनुसार, यह बाजार रोज 10 टन से ज्यादा छांटी हुई कपड़े की कतरन पानीपत के औपचारिक रीसाइक्लिंग केंद्रों तक पहुंचाता है.

यानी मंगोलपुरी स्थानीय कलेक्शन और बड़े उद्योगों के बीच एक महत्वपूर्ण पुल का काम करता है.

तीन शहर, लक्ष्य एक

बेशक इन तीनों शहरों के मॉडल अलग-अलग हैं. नवी मुंबई दिखाता है कि नगर निगम किस तरह वैज्ञानिक तरीके से कपड़ा कचरे का प्रबंधन कर सकते हैं. तो पानीपत बताता है कि बड़े पैमाने पर रीसाइक्लिंग उद्योग कैसे विकसित हो सकता है. वहीं, मंगोलपुरी यह साबित करता है कि असंगठित क्षेत्र भी सर्कुलर इकोनॉमी का मजबूत हिस्सा बन सकता है. ये तीनों मिलकर एक ऐसी वैल्यू चेन तैयार करते हैं. जिसमें कपड़े का कचरा पहले इकट्ठा होता है, फिर उसकी छंटाई होती है और अंत में वह नए उत्पाद के रूप में बाजार में लौट आता है.

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दुनिया भर में अब सस्टेनेबल फैशन और सर्कुलर इकोनॉमी पर जोर बढ़ रहा है. ऐसे में पुराने कपड़ों का प्रबंधन कर रहे ये तीन मॉडल यह बताते हैं कि अगर सरकारें, उद्योग और समुदाय मिलकर काम करें तो कपड़े के कचरे भी आर्थिक संसाधन का रूप ले सकते हैं. यही वजह है कि केंद्र सरकार अब ऐसे मॉडलों को भविष्य की टेक्सटाइल नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मान रही है.

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