दिल्ली महिला आयोग ने पुलिस को नोटिस जारी कर छावला गैंगरेप पीड़िता के परिजनों के लिए मांगी सुरक्षा

2012 में 19 साल की एक लड़की के अपहरण के तीन दिन बाद हरियाणा में उसका क्षत-विक्षत शव पाया गया था. बेरहमी से हत्या करने से पहले लड़की के साथ काफी बर्बरता की गई थी.

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दिल्ली महिला आयोग ने पुलिस से पीड़ित के परिवार के सदस्यों को मुहैया कराई गई सुरक्षा का स्तर बताने को कहा है.
नई दिल्ली:

दिल्ली महिला आयोग ने पुलिस से छावला सामूहिक दुष्कर्म पीड़िता के परिजनों के लिए सुरक्षा की मांग की है. दिल्ली पुलिस को जारी नोटिस में आयोग ने कहा कि मामला बेहद संवेदनशील है और इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि अपराधी खुले घूम रहे हैं, मृतक लड़की के परिवार के सदस्यों को तुरंत उच्च स्तरीय सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए. आयोग ने पुलिस से मामले में की गई कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी है और पुलिस से पीड़ित के परिवार के सदस्यों को मुहैया कराई गई सुरक्षा का स्तर बताने को कहा है.

दिल्ली पुलिस को 48 घंटों में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए अन्य कदमों के बारे में आयोग को सूचित करने के लिए भी कहा गया है.

दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने कहा, "मैं उस जघन्य अपराध और मामले की गति से बहुत दुखी हूं, जिसके कारण अंततः मृतक और उसके परिवार को न्याय से वंचित होना पड़ा. यह कई स्तरों पर अंदर से परेशान करने वाला है और हमारे सिस्टम पर कई सवाल उठाता है. आयोग मामले में कानूनी राय ले रहा है. हालांकि, इस बीच, परिवार की सुरक्षा चिंता का विषय है और इसलिए हमने इसे सुनिश्चित करने के लिए दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है."

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गौरतलब है कि 2012 में 19 साल की एक लड़की के अपहरण के तीन दिन बाद हरियाणा में उसका क्षत-विक्षत शव पाया गया था. लड़की दिल्ली के छावला की रहने वाली थी और कुतुब विहार से उसका अपहरण कर लिया गया था. बेरहमी से हत्या करने से पहले लड़की के साथ काफी बर्बरता की गई थी.

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रिपोर्ट्स के मुताबिक, बच्ची के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया, उसकी आंखों पर तेजाब डाला गया, उसके गुप्तांगों में कांच की बोतल डाली गई, उसे सिगरेट और लोहे की रॉड से जलाया गया और अंत में उसकी हत्या कर दी गई. 2014 में, निचली अदालत ने आरोपी व्यक्तियों को दोषी ठहराया और उन्हें मौत की सजा दी. दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इस मामले को दुर्लभतम से दुर्लभ मामला मानते हुए फैसले को बरकरार रखा.

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वहीं सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से जांच और परीक्षण किया गया था, उस पर अपनी नाराजगी व्यक्त की और कुछ अन्य चूकों के साथ अपर्याप्त सबूत और अनुचित जांच का हवाला देते हुए सभी तीन अभियुक्तों को बरी कर दिया.

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