फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने को हरी झंडी, 2016 से भी सस्ता होगा सौदा! ये शर्त भी रहेगी

114 लडाकू विमानों के इस सौदे में राफेल जेट के चयन करने की सबसे बड़ी वजह ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उसका शानदार प्रदर्शन रहा. इस मिशन के दौरान राफेल ने पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था.

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  • फ्रांस की डसॉल्ट कंपनी से 114 राफेल लड़ाकू जेट खरीदने के प्रस्ताव को रक्षा खरीद बोर्ड ने मंजूरी दी है
  • प्रस्ताव को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल की बैठक में रखा जाएगा
  • इस विमान सौदे पर प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी अंतिम मुहर लगाएगी
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भारत की रक्षा क्षमताओं को मजबूती देने वाले एक अहम कदम के तहत फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद को भारतीय रक्षा खरीद बोर्ड ने मंजूरी दे दी है. अब यह प्रस्ताव अब डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल और कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्युरिटी में स्वीकृति के लिए जाएगा, तब जाकर इसको लेकर अंतिम फैसला होगा. हालांकि इसे लेकर कोई अधिकारी ऑन रिकॉर्ड बोलने को तैयार नहीं है लेकिन सूत्रों का कहना है कि यह खबर सही है.

अब आगे क्या होगा?

  • रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की अध्यक्षता वाले डिफेंस प्रोक्योरमेंट बोर्ड (DPB) ने फ्रांस की कंपनी डसॉल्ट एविएशन से 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने के प्रस्ताव को शुरुआती मंजूरी दे दी है. जानकारी के मुताबिक, इस प्रस्ताव में राफेल विमान का सोर्स कोड देने की शर्त भी शामिल है.
  • अब यह प्रस्ताव रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) के सामने रखा जाएगा, जहां इसे आवश्यकता की स्वीकृति (AoN) मिलनी है. यह खरीद प्रक्रिया का पहला औपचारिक कदम होता है.
  • इसके बाद सौदे को कास्ट नेगोशिएशन कमेटी यानी लागत वार्ता समिति से मंजूरी लेनी होगी. फिर अंतिम फैसले के लिए इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) के पास भेजा जाएगा.

राफेल के साथ सोर्स कोड देने की शर्त

रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, किसी भी भविष्य के सौदे में राफेल विमान का सोर्स कोड ट्रांसफर करना अनिवार्य शर्त होगी. सूत्रों के अनुसार  रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और हथियारों का इंटीग्रेशन भारतीय इंजीनियर खुद करेंगे. इसके लिए फ्रांस की मदद की जरूरत नहीं होगी.

सूत्रों के अनुसार, सोर्स कोड तक पहुंच इसलिए जरूरी है क्योंकि इससे भारत अपने हथियार, सेंसर, सुरक्षित डेटा लिंक और मिशन सॉफ्टवेयर को विमान में खुद जोड़ सकता है और इसके लिये मूल निर्माता पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा.

सूत्रों ने यह भी साफ किया कि 114 राफेल विमानों की खरीद से भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रमों जैसे एलसीए मार्क 2 और एएमसीए (AMCA)पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

2016 के सौदे से भी सस्ता पड़ेगा राफेल 

सूत्रों का यह भी कहना है कि इस बार हरेक राफेल विमान की कीमत 2016 के सौदे की तुलना में काफी कम होने की उम्मीद है. यह तुर्किये, जर्मनी और इटली जैसे देशों द्वारा खरीदे गए लड़ाकू विमानों से भी सस्ती होगी.

हाल के वर्षों में जर्मनी, तुर्किये और इटली ने यूरोफाइटर टाइफून लड़ाकू विमान खरीदे हैं. तुर्किये ने 20 यूरोफाइटर विमान लगभग 7 अरब यूरो में खरीदे, जबकि जर्मनी ने 20 विमान 3.75 अरब यूरो में लिए. इटली ने भी 20 यूरोफाइटर विमान 7.5 अरब यूरो में खरीदे हैं.

सूत्रों के अनुसार, औसतन एक यूरोफाइटर की कीमत 120 से 150 मिलियन यूरो होती है. हथियार और अन्य उपकरण जोड़ने पर यह लागत बढ़कर लगभग 250 मिलियन यूरो प्रति विमान हो जाती है.

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पीएम मोदी की मैक्रों संग बैठक में लग सकती है मुहर

इस राफेल सौदे की शुरुआती लागत 18 अरब डॉलर आंकी गई थी, लेकिन अब यह बढ़कर 35.84 अरब डॉलर होने की संभावना है. भारत और फ्रांस को उम्मीद है कि फरवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की प्रस्तावित बैठक के दौरान इस सौदे को अंतिम रूप दिया जा सकता है .

ऑपरेशन सिंदूर में किया शानदार प्रदर्शन

114 लडाकू विमानों के इस सौदे में राफेल जेट के चयन करने की सबसे बड़ी वजह ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उसका शानदार प्रदर्शन रहा. इस मिशन के दौरान राफेल ने पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था. दूसरी बड़ी वजह ये रही कि वायुसेवा पहले से ही 36 राफेल लड़ाकू विमान उड़ा रही है जबकि नौसेना ने भी 36 राफेल के समुद्री संस्करण का आर्डर दिया है.

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