- ममता बनर्जी ने 1996 में कांग्रेस से बगावत कर TMC का गठन कर बंगाल की राजनीति में नया अध्याय शुरू किया
- ममता की संसद और सड़क दोनों जगह सक्रियता ने उन्हें 'स्ट्रीट फाइटर' का खिताब दिलाया और विरोध में तीव्रता बनी रही
- 2011 में ममता बनर्जी ने लेफ्ट फ्रंट की 34 साल पुरानी सरकार को हराकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री पद हासिल किया
ममता बनर्जी, भारतीय राजनीति में करीब छह दशक से सुपर एक्टिव नेता. ममता की राजनीति में संसद और सड़क का अंतर मिट जाता है. वो सदन के भीतर और बाहर दोनो जगह एक जैसी आक्रामक रहती हैं. इसी लिए उनको राजनीति में स्ट्रीट फाइटर के नाम से जानते हैं. ऐसा नेता जो मुद्दे के लिए सड़क पर जितनी तल्खी से लड़ता है,संसद के भीतर भी उतनी ही शिद्दत और मेहनत से सक्रिय रहता है.भारत की राजनीति में रूचि रखने वालों की याद में ममता बनर्जी के ऐसे कई चित्र जरूर होंगे.29 की उम्र में सांसद.36 की उम्र में केन्द्र में राज्यमंत्री.42 की उम्र में अपनी खुद की पोलिटिकल पार्टी बना ली. 44 की उम्र में केन्द्र में कैबिनेट मिनिस्टर बनी.56 की उम्र में मुख्यमंत्री बन गयीं. 27 साल में फर्श से अर्श पर पहुंच गयीं.कार्यकर्ता से नेता बन गयीं. लेकिन 15 साल के बाद ही उन्हें अपनी सत्ता गंवानी पड़ी. ममता के करिश्मे में ही उनकी पराजय के निशान हैं.
ममता के आगाज का चैप्टर 1996
1996 दिल्ली में देवगौड़ा प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे. और पश्चिम बंगाल में ममता के उदय का फूल खिल रहा था. 1996 के लोकसभा चुनाव हुए. किसी दल को बहुमत नहीं मिला. सबसे बड़ा दल बीजेपी था.अटल बिहारी वाजयपेयी ने पीएम पद की शपथ ली लेकिन बहुमत साबित नहीं कर सके. उसके बाद संयुक्त मोर्चा ने सरकार बनाने का दावा किया. देवगौड़ा उसके नेता बने. इस संयुक्त मोर्चा में लेफ्ट दल भी शामिल थे. कांग्रेस ने ऐसे गठबंधन को बाहर से समर्थन का ऐलान कर दिया. ममता बनर्जी तब दक्षिण कोलकाता से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा सांसद चुनी गयीं थीं. वो लेफ्ट फ्रंट से लड़कर ही संसद मे पहुंची थी. ममता की पूरी पॉलिटिक्स एंटी लेफ्ट थी.
बगावत की ओर बढ़ती ममता
1996-जून-जुलाई- में पेट्रोलियम के दाम बढ़े तो ममता बनर्जी ने विरोध किया और लोकसभा के वेल में जा कर धऱने पर बैठ गयीं.ध्यान देने वाली बात है कि ममता जिस सरकार का विरोध कर रही थीं उसे उनकी पार्टी का समर्थन था. 1997-फरवरी- रेल बजट आया. राम विलास पासवान रेलमंत्री थे. ममता बजट से असंतुष्ट थीं.विरोध किया और अपना शॉल उतार कर रेलमंत्री रामविलास पासवान के ऊपर फेंक दिया.कांग्रेस के समर्थन से चल रही सरकार का ऐसा मुखर विरोध पोलिटिकल प्रोटोकॉल के खिलाफ माना जाता है.लेकिन ममता बनर्जी ने इसे ही अपनी पॉलिटिक्स बना लिया. संसद के भीतर सड़क की शैली ममता की पहचान बनती जा रही थी. ममता स्ट्रीट फाइटर की तरह ही अपने विरोधियों से लड़ रही थीं.
तृणमूल की ओर बढ़ती दीदी
वामपंथियों के खिलाफ खड़े होने की जिद ममता बनर्जी को कांग्रेस से दूर कर रही थी. केन्द्र में देवगौड़ा की सरकार गिर गयी. आईके गुजराल प्रधानमंत्री बने. इनको भी कांग्रेस का समर्थन था. लेकिन बाद में कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गयी. वजह बनी जैन कमीशन की रिपोर्ट. जो कि 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद जांच के लिए बना था. कमीशन की रिपोर्ट मे राजीव गांधी की हत्या में DMK की भूमिका को संदिग्ध बताया. कांग्रेस ने गुजराल से कहा कि सरकार में शामिल DMK को बाहर करो. प्रधानमंत्री गुजराल ने मना कर दिया. कांग्रेस ने समर्थन वापस लिया. देश नए चुनाव के लिए तैयार हो गया. हाईकमान राष्ट्रीय राजनीति में फंसा हुआ था. लेकिन ममता बनर्जी पूरी तरह से पश्चिम बंगाल तक सीमित थीं. ममता बनर्जी चाहती थीं कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस लेफ्टफ्रंट के खिलाफ मुखर होकर स्ट्रीट पॉलिटिक्स करे. लेकिन कांग्रेस हाई कमान की सोच कुछ और ही थी.
गठबंधन की राजनीति और ममता का तलाक?
ममता बनर्जी शायद ये महसूस कर रही थीं कि 35 साल से पश्चिम बंगाल पर काबिज वामपंथ के अंतिम दिन करीब हैं. ममता की पोलेटिकल ट्रेनिंग लेफ्ट फ्रंट के विरोध में हुई थी.वो उसके सिस्टम को जड़ से पहचानती थीं. ममता परिवर्तन का मुंह कांग्रेस के लिए मोड़ना चाहती थीं. लेकिन इसके लिए ऐसा सिस्टम जरूरी था जो ममता के मुताबिक चले. लेकिन केन्द्र में इसी दौरान नए तरह की राजनीति जमीन पकड़ रही थी. 1996 में बीजेपी सबसे बड़ा दल थी लेकिन सरकार नहीं बना पायी तो सबको लगा कि लाइक माइंडेड पार्टियों को साथ रखना चाहिए ताकि अकेलेदम पर बहुमत न मिले तो भी सिंगल लार्जेस्ट पार्टी साथियों के साथ सरकार बना ले. इसलिए कांग्रेस आलाकमान लेफ्ट के खिलाफ खुल कर नहीं आ रहा था.क्योंकि तब क्षेत्रीय दल और बीजेपी कांग्रेस के कट्टर दुश्मन थे.
एकला चलो रे!
21 दिसंबर 1997 में सीताराम केसरी ने ममता बनर्जी को कथित अनुशासनहीनता का दंड दे दिया. उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया गया. इधर कांग्रेस ने निकाला उधर ममता ने नयी पार्टी का दावा ठोक दिया. ममता बनर्जी ने पूरे बंगाल में अपना दम दिखाना शुरू कर दिया था, जिसका आगाज ममता बनर्जी ने कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन के समानान्तर अधिवेशन करके कर दिया था.ममता बनर्जी के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि जैसे ही ममता ने कांग्रेस को छोड़ा वैसे ही 23 दिसंबर 1997 को पश्चिम बंगाल बीजेपी ने बड़ी बैठक कर ममता की ओर अपना हाथ बढ़ाया. समता पार्टी ने भी ममता के साथ गठजोड़ की पहल की.लेकिन ममता बनर्जी ने सबसे पर्याप्त दूरी बना कर रखीं.
तृणमूल की सार्वजनिक घोषणा
29 दिसंबर 1997-ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में एक बड़ी रैली की. जिसमें 50 हजार से ज्यादा लोगों के पहुंचने का दावा किया गया. जिसमें ममता को कांग्रेस के अजित पांजा,कृष्ण बोस ने ज्वाइन किया और रैली में मणिशंकर अय्यर भी शामिल हुए थे. 1 जनवरी 1998 को ममता बनर्जी को उनकी नयी पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस का चुनाव चिन्ह मिल गया था.
पहला चुनाव ममता की धुरंधर बैटिंग
1998 में संसदीय चुनावों का ऐलान हो गया. टीएन शेषन,एमएस गिल ने देश को नए चुनावों की तारीख बता दीं. 16, 22 और 28 फरवरी को नयी लोकसभा के लिए मतदान होने थे.नतीजे आए तो बीजेपी सबसे बड़ा पार्टी थी. गठबंधन की सरकार बनी. ममता बनर्जी की TMC के 7 सांसद जीते थे. उन्हें भी NDA में शामिल करने की कोशिश हुई लेकिन ममता ने अपनी अलग पहचान पर जोर दिया. संसद में उनका तेवर स्ट्रीट फाइटर वाला ही रहा.
9 जून, 1998 को लोकसभा में देश ने ममता का आक्रामक चेहरा देखा. पश्चिम बंगाल में लेफ्ट की सरकार थी. ममता ने लेफ्ट के अधीन महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचार का मुद्दा उठाया. सबूत के लिए पेपर औऱ वीडियो टेप लेकर आयी.ममता ने समूचे विपक्ष से समर्थन की अपील की. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर,लालू प्रसाद यादव सहित कांग्रेस के बड़े नेता सदन में मौजूद थे.उन्होंने सबके सामने कहा की लेफ्ट के शासन में महिला प्रत्याशियों की नग्न परेड करवा दी जाती है.जब उन्हें लगा कि उनकी बात नहीं सुनी जा रही है तो वो जोर जोर से चिल्लाने लगीं.
बदलती राजनीति और ममता की चुनौतियां
वक्त के साथ ममता बनर्जी की राजनीति का तेवर और कलेवर बदल रहा था. राज्य में उनकी टक्कर लेफ्ट और कांग्रेस दोनो से थी. साथ देने वाला कोई नहीं था.ममता लगातार यही सोच रही थीं कि लेफ्ट को जमीन से मिटाने का समीकरण क्या हो सकता है? केन्द्र में बीजेपी की अगुवाई में NDA की सरकार थी. अब ममता को भी समझ में आ रहा था कि बिना किसी बड़े दल को साथ लिए लेफ्ट और कांग्रेस से लड़ना मुश्किल है. ताकतवर दलों की लीग में बीजेपी ही ऐसी पार्टी थी जो कांग्रेस और लेफ्ट की कट्टर दुश्मन थी. ममता के लिए अच्छी बात ये थी कि NDA अपने सहयोगियों की संख्या बढ़ाने में जी जान से लगा था लेकिन भारतीय राजनीति में बीजेपी को अछूत का दर्जा मिला हुआ था. कोई उसके साथ आने को तैयार नहीं था.अब ममता ने अपनी रणनीति को बदलना शुरू कर दिया
बदलाव के दरवाजे पर देश,कांग्रेस में सोनिया,तृणमूल में ममता
मार्च 1998 में कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी ने संभाल ली थी.ममता को कांग्रेस से निकालने वाले सीताराम केसरी नेपथ्य में जा चुके थे. 1999 में सोनिया गांधी के मुद्दे पर कांग्रेस के बड़े नेता शरद पवार,पीए सांगमा ने किनारा कर राष्ट्रवादी कांग्रेस बना ली थी. बीजेपी मजबूत हो रही थी.कांग्रेस पहले की अपेक्षा कमजोर.इसी बीच देश में बड़ी घटनाएं घटना शुरू हो गयीं. 17अप्रैल 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिर गई. 13 महीने बाद . एक बार फिर विवाद की वजह सरकार में DMK बना. जयललिता की AIADMK ने शर्त रख दी की मंत्रिमंडल से DMK के मंत्री हटाओ. बात नहीं बनी तो जयललिता ने समर्थन खींच लिया. सदन में अटल बिहारी वाजपेयी की NDA सरकार केवल एक वोट से हार गयी. मई से जुलाई के बीच करगिल युद्ध हुआ. सितंबर-अक्टूबर 1999 में फिर लोकसभा चुनाव हुए.
ममता बनर्जी का बोल्ड फैसला
ममता बनर्जी ने बोल्ड फैसला किया. अपने परंपरागत वोटर की पसंद से पलट उन्होंने nda में शामिल होने का फैसला कर लिया. पश्चिम बंगाल में बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ीं. पहली बार सीमित लोकसभा क्षेत्रों में EVM से वोटिंग शुरू हुई थी.ममता की लोकसभा उनमें से एक थी.लोकसभा के नतीजे आए. देश में NDA को बहुमत मिला. ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में 8 लोकसभा सीट जीत लीं. उन्हें 26% वोट मिला.बीजेपी को वोट 11% मिला लेकिन सीट केवल 2 मिली थीं. कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट को क्लियर कट नुकसान हुआ था. ममता की सोलो पॉलिटिक्स के शुरूआती रुझान ही बहुत तीखे थे. परिणाम ममता बनर्जी केन्द्र में कैबिनेट मंत्री बनी. देश की पहली महिला रेलमंत्री का दर्जा मिला.
नयी पार्टी और कैबिनेट मिनिस्ट्री
ममता बनर्जी 13 अक्टूबर 1999 से 15 मार्च 2001 तक रेलमंत्री रहीं. इस बीच उन्होंने दो बार रेल बजट पेश किया. मंत्रालय में भी उनका स्टाइल स्ट्रीट फाइटर वाला ही रहा. उनकी योजनाओं, ट्रेन और लाइन एलोकेशन में भी ममता की स्ट्रीट फाइटर शैली दिखी. ममता ने संसद में ऐसे सांसदों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया जो कम टिकट पर ज्यादा समर्थकों के साथ चलते थे. आम यात्रियों को कष्ट देते थे. रेलवे बोर्ड के अधिकारियों से अक्सर भिड़ंत की खबरें भी आती रहीं. लेकिन 2001 में मंत्रिमंडल संतुलन में ममता का मंत्रालय बिहार के नीतीश कुमार को दे दिया गया. नतीजा ममता ने मंत्रीपद छोड़ दिया.
ममता बनर्जी की सरप्राइज़ पॉलिटिक्स?
ममता की पॉलिटिक्स में UNPREDICTABLITY और SURPRISE की मात्रा बहुत ज्यादा है. उनके बहुत करीबी भी नहीं बता सकते कि किसी खास सिचुएशन पर ममता क्या फैसला ले लेंगी. ममता का यही व्यक्तित्व उनकी ताकत है और उनके विरोधियों के लिए चुनौती. ममता वोटर के दिल में तो आती हैं लेकिन विरोधियों की समझ में नहीं आती हैं. 1998 में पार्टी बनाते ही पहले लोकसभा चुनाव में 7 सांसद जीते.लेकिन सरकार से दूर रहीं 1999 में पाला बदल लिया लेफ्ट की भीड़ में राइट का दामन थामा NDA में आयीं और 8 सांसद जीते. 2001 में NDA सरकार का मंत्रिमंडल छोड़ा तो गठबंधन में रहीं लेकिन सरकार के खिलाफ अपोजीशन बन गयीं. आमतौर पर माना जाता है कि अगर आप गठबंधन में हैं तो सार्वजनिक विरोध से बचेंगे.लेकिन ममता ने हर परिभाषा को बदल दिया. ममता दिल्ली से हटीं तो पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव उनका इंतजार कर रहे थे.
मां-माटी-मानुष,म्युनिसिपैलिटी और ममता का यू-टर्न अवतार
वर्ष 2000 में ममता बनर्जी ने एक बड़ा धमाका किया था. कोलकाता म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में लेफ्ट को हरा दिया. ये शहरों में लेफ्ट के पैर तले जमीन खिसकने का ऐलान था. इसके बाद उन्होंने राज्यस्तर पर गठबंधन के साथी जोड़ना शुरू किया. तृणमूल कांग्रेस की युवा छात्र शाखाओं को डेवलप किया.अर्बन,सेमी अर्बन और रूर्बन इलाके में दक्षिण बंगाल में विशेष प्रभाव बनाया. लेकिन तीन साल खत्म होते होते ममता बनर्जी के सामने असली अग्नि-परीक्षा आ गयी. 2001 में वेस्टबंगाल विधानसभा के चुनाव होने थे. अब ममता बनर्जी के सामने 294 सीट की चुनौती थी.
बीजेपी-कांग्रेस का डबल इंजिन और ममता की पोलेटिकल ग्रोथ
2001 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी तीन पहचान के साथ वोटर के सामने आयीं. तृणमूल कांग्रेस ने ऑल इंडिया कांग्रेस के साथ करार किया. इसे बांग्ला बचाओ फ्रंट नाम दिया. इसमें 226 सीट पर TMC, 60 सीट पर कांग्रेस, 5 सीट पर JMM और 5 पर GNLF चुनाव लड़ी. वाममोर्चा 294 सीट पर उतरा. ममता बनर्जी को 30% वोट और 60 सीट पर जीत मिली. कांग्रेस को 8% वोट, 26 सीट मिली. बीजेपी को 11% वोट और 4 सीट मिली. वाममोर्चा ने 49% वोट और 199 सीट के साथ सरकार बनाई. 25 साल से पश्चिम बंगाल में काबिज वाममोर्चे को ममता बनर्जी ने कड़ी टक्कर दी थी.अभी भी किसी को अहसास नहीं था कि 10 साल बाद ममता बनर्जी लेफ्ट फ्रंट के सत्ता का अंत कर देंगी. ममता बनर्जी ने इस चुनाव में महीन चालाकी की.1999 का लोकसभा चुनाव बीजेपी के साथ लड़ी थीं.
एक्ट लोकल, थिंक ग्लोबल
ममता बनर्जी अभी भी सांसद थीं. उन्होंने अपना प्रोजेक्शन राष्ट्रीय स्तर पर बनाए रखा. वो पश्चिम बंगाल में लेफ्ट सरकार के खिलाफ सड़क पर लड़ती और दिल्ली पहुंचते ही राइट विंग सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल देती थीं. इस तरह से ममता बनर्जी लगातार सुर्खियों में बनी रहती थीं. 2002 में गुजरात में दंगे हए. ममता बनर्जी ने इन्हें आधार बना कर बीजेपी का जमकर विरोध किया. क्योंकि ममता चाहती थीं कि पश्चिम बंगाल में लेफ्ट फ्रंट से जुड़े बंगाली भाषी मुस्लिम मतदाता को अपने साथ जोड़ सकें इसके लिए वो हमेशा सतर्क थीं. कोलकाता में ममता के ऑफिस में उनकी एक तस्वीर लगी थी. जिसमें उनके सिर पर हिजाब की तरह साड़ी का पल्लू दिखता है. ममता की राजनीति में सिंबॉलिज्म का बहुत महत्व था. ममता कभी भी भद्रलोक वॉले मैनेरिज्म में नहीं दिखाती थीं. वो सावधान रहती थीं कि उनका चेहरा मोहरा. कपड़ा लत्ता, घर, गाड़ी ऐसी न हो जो उन्हें सड़क से चलने वाले आम आदमी से अलग कर दे. ममता बनर्जी हमेशा वो हर काम करती थीं जो आम बंगाली अच्छा समझता है. जैसे पढ़ना, लिखना, पेंटिंग बनाना. यहां तक की संगीत सुनना.इसीलिए जब आप ममता बनर्जी की जर्नी में घुसते हैं तो वहां आपको हर वो चित्र मिलता है जो आम बंगाली के जीवन का हिस्सा है.
राजनीतिक संघर्ष और ममता का बड़ा रहस्य
1990 में ममता लेफ्ट सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रही थीं. उनके ऊपर हमला हुआ.इसी हमले से ममता बनर्जी के जीवन का एक बड़ा रहस्य जुड़ा है. वो ये कि वो 34 घंटे लगातार जगती हैं. मतलब उनका दिन चौबीस घंटे में खत्म नहीं होता है. ममता का एक दिन 48 घंटे का होता है.ममता ने ये जानकारी खुद NDTV इंडिया को दी है.“ मेरी समस्या ये है कि 1990 में मेरा सिर बहुत घायल हो गया था.कई सर्जरी हुई थीं. मेरे पूरे सिर की प्लास्टिक सर्जरी हुई है.उसके बाद से मैं रात को सो नहीं सकती हूं. कुछ लोग पन्द्रह से सोलह घंटे बाद सोते हैं लेकिन मैं 36 घंटे बाद ही सो पाती हूं.मेरी ये समस्या है.” ममता के जीवन का बहुत विचित्र सच है. वो रात में जागती हैं तो स्केच बनाती हैं.किताब लिखती हैं. अबतक उनकी एक दर्जन से ज्यादा किताबें पब्लिश हो चुकी हैं.उनकी पेटिंग की आदत तो ऐसी है कि जब 2009 में वो दोबारा रेलमंत्री बनीं तो दुरंतो नाम की ट्रेन को उनकी पेटिंग की शक्ल में रंगा गया था.
2004 की थी तैयारी
ममता बनर्जी ने 2001 के बाद 2004 के लोकसभा चुनाव की तैयार शुरू कर दी थी. इसके लिए उन्होंने बंगाल के पावर स्ट्रक्चर को पंचायत के लेवल से स्कैन करना शुरू किया था. मार्क्सवादी पार्टी ने जब 2001 के विधानसभा चुनाव की समीक्षा की तो उन्होंने बताया कि कैसे ममता बनर्जी पंचायत के हर स्तर पर कब्जा कर रही हैं. वो क्रमबद्ध तरीके से बंगाल के हर गांव में लेफ्ट फ्रंट का पोलेटिकल स्ट्रक्चर इरेज कर रही हैं.पार्टी ने दावा किया कि इस संघर्ष में 100 से ज्यादा लोग शहीद हुए हैं. हजारों घर और प्रॉपर्टी को नुकसान पहुंचाया गया है.
कैबिनेट में रीएंट्री
2004 लोकसभा चुनाव आ गए. ममता ने चुनाव से ऐन पहले 9 जनवरी 2004 से 22 मई 2004 के लिए करीब 5 महीने के लिए केन्द्र की वाजपेयी सरकार को फिर ज्वाइन किया . इसबार वो केन्द्रीय कोयला मंत्री बनीं. इसमें भी वेस्टबंगाल के बड़े वोटर्स को अपने साथ मिलाने की राजनीतिक सोच थी क्योंकि पश्चिम बंगाल में देश की जरूरत का 4% कोयला पैदा होता है.
2004 के चुनाव में जोर का झटका
2004 लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी NDA के साथ उतरीं. इस बार केवल वही जीत पायीं. संसद में तृणमूल की अकेली सांसद. NDA हार गया. UPA जीत गया. मनमोहन सिंह नए प्रधानमंत्री बने. सोनिया गांधी बहुत पॉवरफुल बन कर आयीं. लोकसभा में स्पीकर बने सोमनाथ चटर्जी. जिनकी पार्टी से ममता लड़ती आयी थीं.ममता ने संसद में अपना स्ट्रीट फाइटर वाला अवतार फिर लिया.
4 अगस्त, 2005, क्यों था खास
लोकसभा में ममता बनर्जी का एक नया रूप दिखा. जिसमें ममता भयंकर गुस्सा दिखीं और निराश हो कर रोती हुई भी देखी गयीं. ममता बनर्जी बंगाल में बांग्लादेश से आने वाले अवैध वोटर्स का मुद्दा उठा रही थीं. लेकिन उन्हें इजाजत नहीं मिलीं. वो गुस्सा गयीं. सारे कागज उठाकर पीठ पर बैठे डिप्टी स्पीकर पर फेंक दिए. और फिर अपनी सीट पर आकर रोने लगीं. 2004 से 2009 के बीच में ममता बनर्जी की राजनीति पश्चिम बंगाल और दिल्ली के बीच में फंसी रही.लेकिन इस बीच उन्होंने तीन बडे आंदोलनों का नेतृत्व किया. जिन्होंने ममता का चाल,चरित्र,चेहरा बदल दिया. ममता की पहुंच बंगाल के प्रसिद्ध भद्रलोक से लेकर गांव के मजदूर किसान तक हो गयी. जो मध्यवर्ग ममता को गुस्सैल नाट्यकर्मी मानता था उसने भी दीदी के राजनीतिक वजूद को स्वीकार कर लिया. अब तृणमूल पार्टी मां-माटी और मानुष की पहचान को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही थी. 2011 उनका इंतजार कर रहा था.
पश्चिम बंगाल के चुनाव में नयी सीख
2006 पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव आए.ममता बनर्जी ने गठबंधन के नाम पर वोटर को भ्रम में रखने की रणनीति को दोहरा दिया. इतना ही नहीं वो कुछ आगे बढ़ीं. कुछ सीट पर बीजेपी के साथ स्ट्रेटजिक अलायंस भी दिखा. .नतीजे आए तो ममता को 30 विधायक मिले.करीब 27 फीसदी वोट. भारी घाटा हुआ. 2001 से 50% विधायक घट गए और वोट शेयर में करीब 4% की कमी हो गयी. जबकि लेफ्ट फ्रंट ने जीत के रिकॉर्ड तोड़ दिए .सातवीं बार सरकार बना ली. 50% से ज्यादा वोट पर कब्जा कर लिया.माना गया कि ग्रामीण बंगाल पूरी तरह से लेफ्ट फ्रंट के साथ इंटैक्ट है. ममता की राजनीति के लिए ये बहुत ही निर्णायक पल थे.माना गया ऊंची छलांग से पहले ममता कुछ कदम पीछे गयी हैं. वो कमबैक करेंगी. ममता ने इसे सच साबित कर दिया. 2011 के नतीजे सबूत हैं.2006 के ठीक तीन साल बाद लोकसभा के चुनाव थे. और उसके दो साल बाद विधानसभा के. 2006 से 2009 के बीच ममता ने टारेगट लॉक कर लिया. ट्रिगर पर उंगली थी. उनका पहला पोलेटिकल बम गिरा सिंगूर पर.
सिंगूर 2006-2008
बुद्धदेब की वामपंथी सरकार ने सिंगूर में टाटा कंपनी को नैनो कार का कारखाना लगाने के लिए 1000 एकड़ जमीन दे दी. दावा था कि ये उपजाऊ जमीन है.किसान इस अधिग्रहण से खुश नहीं है. ममता बनर्जी ने किसानों के हित में बड़ा आंदोलन चलाया. धरने पर बैठ गयीं.अमरण अनशन किया. केन्द्र के नेता. पूर्व पीएम ममता बनर्जी से मिलने पहुंचे. सिंगूर आंदोलन से जुड़ी तापसी मलिक की हत्या और रेप ने आंदोलन को इमोशनली ममता के पक्ष में खड़ा कर दिया. लेफ्ट सरकार का क्राइसिस मैनेजमेंट उनपर बहुत भारी पड़ा.2008 में नैनो का कारखाना पश्चिम बंगाल छोड़ कर गुजरात के साणंद चला गया. तब नरेन्द्र मोदी गुजरात के सीएम थे. उन्होंने टाटा को सम्मान के साथ गुजरात में आसरा दिया. मिडिल क्लास की लखटकिया कार का सपना बंगाल से सिमट गया. इस आंदोलन ने ग्रामीण पश्चिम बंगाल, बुद्धिजीवी, रंगकर्मी, कलाकारों, एक्टिविस्ट के बीच में ममता बनर्जी की पहचान और पहुंच को बहुत ज्यादा मजबूत कर दिया था.
नंदीग्राम 2007
बुद्धदेब दास की वामपंथी सरकार ने नंदीग्राम की 14000 एकड़ जमीन एक कंपनी को दे दी. कंपनी इसमें एक केमिकल हब बनाना चाहती थी. सरकार की स्टाइल किसानों को समझ में नहीं आयी.किसानों को लगा कि उनकी रोजी रोटी चली जाएगी.इलाके में वामदलों का स्ट्रांगहोल्ड था.आरोप है कि सरकार के लिए स्थानीय लेफ्ट कार्यकर्ताओं ने किसानों के साथ ज्यादती की. सुभेन्दु अधिकारी जो अब बीजेपी के नेता हैं
तब तृणमूल पार्टी में थे और नंदीग्राम आंदोलन का प्रमुख चेहरा थे.
14 मार्च, 2007
पुलिस फायरिंग में 14 प्रदर्शनकारियों की मौत हो गयी.इसके बाद आंदोलन भीषण हो गया. ममता बनर्जी तमाम रोक और विरोध के बावजूद पीड़ितों के पास पहुंची. सीपीआईएम इस पूरे विरोध में विलेन बनता चला गया और ममता हीरोइन. नंदीग्राम की जमीन भी वापस हुई.
2008-लालगढ़ आंदोलन
पश्चिम बंगाल के जंगलमहाल क्षेत्र में आदिवासी विरोध था. पुलिस दमन, विकस की कमी, सुरक्षा बलों की ज्यादती निशाने पर थी. सालबोनी के पास तत्कालीन सीएम बुद्धदेब दास की गाड़ी पर लैंडमाइन हमला हुआ. 2009 में ऑपरेशन लालगढ़ शुरू हुआ. 2011 में माओवादी नेता किशन जी की मौत के साथ खत्म हुआ. किशन जी का आरोप है कि ममता बनर्जी ने इस आंदोलन का इस्तेमाल अपने राजनीतिक फायदे के लिए किया था. बंगाल से लेफ्ट फ्रंट को खत्म करने के लिए किया था. लेकिन ममता कहती हैं कि किशन जी कौन है...लेफ्ट फ्रंट का साथी. तो उनके आरोप को कितना सच माना जाए.
सबका साथ अपना विकास
ममता बनर्जी की राजनीति की सबसे खास बात ये है कि न तो कोई उनका दोस्त है और न ही कोई उनका दुश्मन.राजनीतिक बढ़त के लिए सबका साथ-अपना विकास उनका मूल मंत्र रहा है. सिंगूर-नंदीग्राम और लालगढ़ ने ममता बनर्जी के बदला नहीं बदल.परिवर्तन जैसे नारों का टोन सेट कर दिया. ममता बनर्जी की स्वीकार्यता को बहुत ज्यादा बढ़ा दिया. ममता के साथ ग्रासरूट कैडर को जोड़ दिया. लेफ्ट फ्रंट के पोलिटिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर को ममता बनर्जी ने ओवरटेक कर लिया. जहां लाल झंडा था वहां पर ममता को जोड़ा फूल और घास वाले झंडे फहराने लगे. राजनीति ने अपने चक्र पूरा कर लिया. पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में सत्ता लेफ्ट से सेंट्रल हो गयी.
सत्ता की दुरंतो पर ममता
2009 लोकसभा चुनाव हुए. एक बार फिर UPA की सरकार बनी. इसबार ममता ने पश्चिम बंगाल में 19 लोकसभा सीट जीत लीं. केन्द्र सरकार में मंत्रिमंडल बना तो ममता बनर्जी कैबिनेट मंत्री बनीं.एक बार फिर रेलवे मंत्रालय मिला.अब ममता बैठी दिल्ली में थीं लेकिन ध्यान था प्रदेश में.चूंकि लेफ्ट फ्रंट यूपीए से बाहर था इसलिए ममता और कांग्रेस ने पक्की दोस्ती कर ली. सोनिया गांधी ने अपनी वेस्ट बंगाल यूनिट को साफ आदेश दिया कि ममता बनर्जी की मदद तन मन धन से की जाए. पश्चिम बंगाल के नगर निकाय और पंचायत चुनाव में ममता की पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन किया.
चुपचाप फूलछाप
2009 से जो चुनाव का दौर शुरू हुआ उसमें ममता की पार्टी ने नारा दिया चुपचाप फूलछाप ममता के सिंबल में भी जुड़वा फूल हैं. ये नारा लेफ्ट फ्रंट के अक्रामक चुनावी मैनेजमेंट से अपने वोटर को और कार्यकर्ता को बचाने के लिए अपनाया गया था. इस दौरान ममता ने ऐसे ऐसे दलों से गठबंधन किया जो नेचर में पूरी तरह से वामपंथी थे. जैसे Socialist Unity Centre of India (Communist) यानि SCUI जिसका एक सांसद चुनाव भी जीता था. संसद में ममता ने बतौर रेलमंत्री बंगाल के लिए हर मुमकिन कदम उठाया.
पश्चिम बंगाल में युग बदला, ममता भी बदलीं
2011 पश्चिम बंगाल की राजनीति में वो हो गया जो देश के आम आदमी को एक सपने जैसा लग रहा था. ममता बनर्जी ने लेफ्ट के किले को जीत लिया. सीट, वोट हर तरह से वामपंथी पार्टियों का पत्ता साफ कर दिया. ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बन गयीं. लेकिन केन्द्र का रेलमंत्री पद उनकी पार्टी के पास ही रहा था. लेकिन रिटेल FDI के मुद्दे पर वो सरकार के खिलाफ थीं. ममता ने अपनी राजनीति का रंग ढंग बदल दिया. सड़कों पर चल चल कर विरोध प्रदर्शन करना. बड़े और विशाल मंच बना कर उनपर घूम घूम कर भाषण देना. ऐसी नीतियों पर जोर दिया जिसमें महिला,किसान और गरीब का कल्याण हो. लेकिन धीरे धीरे देश में माहौल बदलने लगा. यूपीए सरकार पर फैसला न लेने, भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे. प्रधानमंत्री ने गठबंधन के साथियों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया. करप्शन के खिलाफ और लोकपाल की मांग को लेकर अन्ना आंदोलन शुरू हुआ. यूपीए की छवि को गंभीर धक्का लगा.
मोदी-ममता की सीधी लड़ाई का दौर
2014 लोकसभा चुनाव हुए तो यूपीए हार गयी. NDA जीत गयी. बीजेपी का चेहरा बने नरेन्द्र मोदी. ममता ने NDA और UPA दोनो से सामान दूरी बना ली थी. बीजेपी ने राज्यों में विजय को अपना एजेंडा बनाया. पूर्वोत्तर पर विशेष जोर दिया गया. ममता ने भी सत्ता के बाद राज्य में विस्तार पर जोर दिया. BJP के खिलाफ बाहरी पार्टी का नारा दिया. ममता के दल तृणमूल को 2016 में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिल गया. 2016 में ही ममता ने अपना दूसरा असेंबली चुनाव जीत लिया. 45% वोट मिले. 2018 पंचायती चुनाव में BJP बड़ी ताकत बन कर उभरी तो पश्चिम बंगाल में TMC vs BJP का पोलेटिकल परिदृश्य बन गया. अब बंगाल की राजनीतिक लड़ाई से लेफ्ट और कांग्रेस आउट थे. लड़ाई BJP और TMC के बीच होने लगी.
बीजेपी की चुप्पैचाप लड़ाई
2019 का साल ममता बनर्जी के लिए दो चुनौती लेकर आया. लोकसभा चुनाव में BJP ने वेस्ट बंगाल में 2 से आगे बढ़ कर 18 सांसद बना लिए. बंगाल में राज्यपाल के पद पर जगदीप धनखड़ की नियुक्ति हो गयी. अब ममता और मोदी की लड़ाई खुल कर सामने आ गयी.
TMC की गलती,BJP की चढ़ाई
कोलकाता में पुल गिरा तो ममता को मोदी ने घेरा उनके विकास के मॉडल पर सवाल खड़े किए. ममता की सरकार से जुड़े सारदा चिट फंड घोटाला , रोज़ वैली चिट फंड घोटाला, नारदा स्टिंग ऑपरेशन, शिक्षक भर्ती (SSC) घोटाला, पशु तस्करी घोटाला, कोयला तस्करी, पार्क स्ट्रीट बलात्कार केस पर बार बार ममता बनर्जी और बीजेपी के बीच टक्कर हुई. सुवेन्दु अधिकारी, मुकुल राय जैसे TMC के नेता BJP में चले गए. बाबुल सुप्रियो BJP से TMC आए. दोनो दलों के बीच हिंसक विरोध और प्रतिरोध का दौर शुरू हो गया. सियासत की चालें सड़क पर चली जाने लगीं.
विवादों की राजनीति और ममता का डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर
2021 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव हुए. ममता बनर्जी ने लक्ष्मी भंडार योजना शुरू की. 25 से 60 वर्ष की महिलाओं को हर महीने 1500 से 1700 का डायरेक्ट ट्रांसफर शुरू किया गया. चुनाव प्रचार के दौरान ममता को चोट लगी. इसे उन्होंने मुद्दा बना दिया. पैर पर प्लास्टर चढ़ा कर व्हील चेयर में बैठ गयीं. प्रचार किया.अपनी स्ट्रीट फाइटर इमेज को एक बार फिर मजबूत किया. चुनाव के नतीजे आए तो ममता बनर्जी को 48% वोट मिले और 215 MLA जीते. लेकिन ममता बनर्जी सुवेन्दु अधिकारी से विधानसभा का चुनाव हार गयीं.इतना ही नहीं, चिंता की बात ये भी रही कि BJP को 38% वोट मिला और 77 MLA जीत गए. अब ममता बनर्जी का राजनीतिक मुकाबला बढ़ने लगा. हिंसा की वारदात बढ़ने लगीं. बंगाल में बीजेपी को बाहरी दल बताने वाली राजनीति पर जोर दिया गया. बीजेपी ने जवाब में ममता के प्रो मुस्लिम चेहरे को निशाना बनाया.
ध्रुवीकरण में धंस गया पश्चिम बंगाल
पश्चिम बंगाल की लड़ाई हिन्दू मुस्लिम की बाइनरी में आ कर सिमट गयी. CAA का मुद्दा हो, NRC का मुद्दा हो, बांग्लादेशी घुसपैठ हो, प्रतिमा विसर्जन का विवाद हो. रामनवमी की छुट्टी हो, SIR की लिस्ट हो..हर मुद्दा कम्यूनल पोलराइजेशन की राह पकड़ने लगा. राज्यपालों के साथ ममता और सरकार के विवाद अलग लेवल पर चलने लगे. जयश्रीराम का नारा सुनकर ममता बनर्जी के भड़कने वाले वीडियो वायरल होने लगे. पश्चिम बंगाल, सेक्यूलर और कम्यूनल लाइन पर डिवाइड होने का दावा होने लगा.
मंदिर-मस्जिद ट्रैप में ममता?
ममता बनर्जी ने बंगाल के दीघा में ही पुरी के जगन्नाथ मंदिर का हमशक्ल बना दिया. एक्सपर्ट मानते हैं कि ऐसा करके उन्होंने अपने हिन्दू और सनातन वीर होने का सबूत दिया.लेकिन जानकार मानते हैं कि यहीं से ममता को अपनी आने वाली हार का मुंह भी दिखना शुरू हो गया था. इसके बाद जब उनकी अपनी पार्टी के हुमांयू कबीर ने TMC छोड़ कर बाबरी मस्जिद निर्माण का आंदोलन शुरू कर दिया. राजनीति पूरी तरह से धार्मिक ध्रुवीकरण के रास्ते पर आ गयी.
राजनीति में राजभवन
2022 में सीवी आनंद बोस पश्चिम बंगाल के राज्यपाल बने. इसके बाद राज्यसरकार और राज्यपाल के बीच भीषण संग्राम छिड़ा. राज्यपाल के खिलाफ पुलिस FIR से लेकर राजभवन में पुलिस घुसने तक के विवाद हुए. बीजेपी ने इसे ममता के खिलाफ और ममता ने इसे बीजेपी के खिलाफ इस्तेमाल किया.
ममता के नए प्रयोग और बढ़ती मुश्किल
2024 लोकसभा चुनाव हुए. ममता बनर्जी ने NDA के खिलाफ INIDIA एलायंस के प्रयोग में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया. लेकिन प्रयोग सफल नहीं हो पाया.नीतीश कुमार के हटने के बाद विपक्षी एकता के प्रयास की हवा निकल गयी.बीजेपी को नुकसान हुआ लेकिन सरकार फिर NDA की बनी. 2024 में ममता के सांसद 2019 के 22 से 29 सांसद जिता लिए. वोट भी 3% बढ़ा लिया. बीजेपी के सांसद घटकर 18 से 12 रह गए.वोट भी करीब 1% कम हो गए. इसके बाद से पश्चिम बंगाल की राजनीति पूरी तरह से 2026 के विधानसभा चुनाव की ओर मुड़ गयी. RG Kar रेप केस ममता बनर्जी के खिलाफ बड़ा मुद्दा बनाया गया. 2025 में लॉ कॉलेज रेप केस को बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाया गया जिसमें ममता बनर्जी अपने बयानों की वजह से काफी डिफेंसिव पोजिशन पर देखी गयीं. SIR और घुसपैठ को हिन्दू मुस्लिम की लाइन पर सेट कर दिया गया. अब सबकुछ कम्यूनल बाइनरी के इर्द-गिर्द ही चलने लगा. वहीं दूसरी ओर पश्चिम बंगाल से बाहर दिल्ली मे ममता बनर्जी के सांसदों ने संसद में बार बार हर बार बीजेपी और मोदी सरकार को जमकर घेरा. ममता की पार्टी ने अपनी मौजूदगी मजबूती से दर्ज करवायी.
SIR की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट आयी
देश की आंखो में दस्तक देना भी ममता की राजनीति का हिस्सा है.सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी का वकील बनकर आना इसी का परिचय है.ममता बनर्जी मुद्दे के इमोशन को पहचानती हैं और उसे प्ले करती हैं. फिर खुद उसके किरदार में आ जाती हैं. हर आंदोलन और विरोध ममता बनर्जी का एक किरदार और चित्र तैयार करता है जिससे उन्हें याद रखा जाता है.जैसे SIR का विरोध करने के लिए वो खुद वकील की भूमिका में आ गयीं थीं. यही ममता का पोलेटिकल फ्लेवर है- स्ट्रीट फाइटर
ममता का भविष्य?
ममता नें सड़क से संसद तक जो राजनीतिक मानचित्र तैयार किया है अब उसके सामने दो बड़े सवाल हैं?
पहला -अब ममता का भविष्य क्या है?
दूसरा - ममता का उत्तराधिकारी कौन है?
ममता को वक्त के साथ दोनों सवालों का जवाब देना होगा. महिला वोटर की ताकत उनके साथ है जो उन्हें केन्द्र की राजनीति के लिए मजबूत बनाती है. लेकिन उनके बाद पश्चिम बंगाल में क्या उनके उत्तराधिकारी को वही विश्वास मिलेगा जिसके दम पर ममता ने तृण के मूल से पार्टी का बड़ा पेड़ तैयार किया है?
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